सीएजी रिपोर्ट में बड़ा खुलासा: 700 करोड़ की 76 सिंचाई योजनाएं बदहाल; 29 करोड़ के प्रोजेक्ट में 103 करोड़ बहाए, फिर भी खेत प्यासे
सिंचाई घोटाला • एनीकट में पानी की जगह रेत और मलबा, 27 करोड़ का डैम तीन साल में ध्वस्त
रायपुर। छत्तीसगढ़ के सरगुजा संभाग में जल संसाधन विभाग की कार्यप्रणाली पर भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) की रिपोर्ट ने बड़े वित्तीय और तकनीकी भ्रष्टाचार की पोल खोल दी है। वर्ष 2020 से शुरू हुई सीएजी की जांच में खुलासा हुआ है कि संभाग के पांच जिलों में लगभग 700 करोड़ रुपए की लागत वाली 76 सिंचाई योजनाएं पूरी तरह बदहाली का शिकार हैं। सबसे चौंकाने वाला आंकड़ा बलरामपुर जिले की खुटपाली सिंचाई योजना का है। वर्ष 2007 में 29 करोड़ रुपए के मूल प्रोजेक्ट पर करीब दो दशक में 103 करोड़ रुपए खर्च किए जा चुके हैं, इसके बावजूद किसानों को पानी नहीं मिला। एनीकट में पानी की जगह रेत और मलबा भरा हुआ है। जांच में साफ हुआ है कि अधिकारियों ने बिना जमीन अधिग्रहण और वन विभाग की मंजूरी (एनओसी) के टेंडर निकाल दिए और लागत बढ़ने पर बिना पुनरीक्षित मंजूरी के ठेकेदारों को नियम विरुद्ध करोड़ों का भुगतान कर दिया। नतीजा, भारी भरकम खर्च के बाद भी योजनाएं आधी-अधूरी हैं।
पहली ही बारिश में ढही नहर, मरम्मत के नाम पर 1.25 करोड़ का नया खर्च
दस्तावेजों के अनुसार, बलरामपुर की खुटपाली योजना से 30 गांवों के खेतों तक पानी पहुंचाना था। इसके लिए महराजगंज से झलपी तक 85 किलोमीटर लंबी मुख्य नहर का निर्माण होना था। लेकिन निर्माण में इतनी बड़ी तकनीकी खामियां थीं कि पहली ही बारिश में नहर ढह गई। ऑडिट में नहर टूटने से 14 लाख रुपए के नुकसान का आकलन किया गया, लेकिन मरम्मत के नाम पर विभाग ने 1.25 करोड़ रुपए का नया बिल पास कर दिया। हद तो तब हो गई जब जांच में एक जैसे कामों पर करीब 7 करोड़ रुपए के दोहरे खर्च का मामला भी पकड़ में आया। आज जमीनी हकीकत यह है कि एनीकट के गेट से पानी रिस रहा है और 103 करोड़ फूंकने के बाद भी 30 गांव सिंचाई के पानी से वंचित हैं।
रेहर नदी पर बना 27 करोड़ का डेडरी एनीकट 3 साल में ध्वस्त
सूरजपुर जिले में रेहर नदी पर बना डेडरी एनीकट निर्माण की गुणवत्ता पर सीधा सवाल खड़े करता है। इस प्रोजेक्ट को 27 करोड़ रुपए की लागत से बनाया गया था, जिसका उद्देश्य 18 गांवों को पानी उपलब्ध कराना था। स्थानीय उपसरपंच यादव प्रसाद के मुताबिक, निर्माण के शुरुआती कुछ दिनों तक नलों में पानी आया, लेकिन महज तीन साल के भीतर ही पूरा एनीकट ध्वस्त हो गया और पानी की आपूर्ति पूरी तरह ठप पड़ गई। वर्तमान में हालात यह हैं कि विभाग वहां बची हुई मशीनों को भी उखाड़कर वापस ले जाने की तैयारी कर रहा है।
50 साल से बन रही हल्दीमुड़ा योजना, 33 करोड़ खर्च फिर भी नहर अधूरी
जशपुर जिले की हल्दीमुड़ा योजना विभागीय लेटलतीफी और सरकारी राशि के दुरुपयोग का सबसे बड़ा उदाहरण है। इस योजना को वर्ष 1976 में महज 1.83 करोड़ रुपए की लागत से मंजूर किया गया था। आज 50 साल बाद इस पर 33 करोड़ रुपए खर्च हो चुके हैं, लेकिन मुख्य नहर का 10 प्रतिशत काम अब भी अधूरा पड़ा है। सीएजी की जांच में सामने आया कि कई योजनाओं की विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (डीपीआर) बनाते समय नदी-नालों में उपलब्ध पानी का कोई सटीक आकलन ही नहीं किया गया, जिससे योजना का मूल उद्देश्य ही भटक गया।
सीएजी की मुख्य आपत्तियां: नियमों को ताक पर रखकर हुआ भुगतान
- बिना पुनरीक्षित मंजूरी भुगतान: नियमतः लागत में 10% से अधिक की वृद्धि होने पर शासन से पुनरीक्षित मंजूरी लेनी होती है। सीएजी ने पाया कि इसके बिना अतिरिक्त भुगतान किया गया जो कि सीधे तौर पर वित्तीय नियमों के खिलाफ है।
- हवा-हवाई डीपीआर: टेंडर जारी करने से पहले न तो जमीन अधिग्रहित हुई थी और न ही जरूरी मंजूरियां सुनिश्चित की गई थीं। दशकों की देरी को केवल इन कारणों से उचित नहीं ठहराया जा सकता।
- कागजी सिंचाई: विभाग ने सिर्फ स्ट्रक्चर (बांध या बैराज) खड़ा होने को ही सिंचाई का लाभ मान लिया। सीएजी ने स्पष्ट किया कि ढांचे बनने के बावजूद अंतिम छोर तक पानी न पहुंचना योजना की पूर्ण विफलता है।
कार्रवाई के नाम पर खेल: दोषी अफसर बहाल होकर हुए रिटायर
सिंचाई योजनाओं की इस बदहाली में शामिल अधिकारियों पर कार्रवाई केवल कागजों तक सीमित रही।
डेडरी एनीकट मामला: जांच में तत्कालीन कार्यपालन अभियंता (ईई) जीपी पांडेय, एसडीओ एसके तिवारी और उप अभियंता एसके चतुर्वेदी दोषी पाए गए थे। उन्हें निलंबित जरूर किया गया, लेकिन कुछ समय बाद ही विभाग ने उन्हें बहाल कर दिया और वे बिना किसी ठोस सजा के सेवानिवृत्त भी हो गए। इसी मामले से जुड़े तत्कालीन मुख्य अभियंता को एंटी करप्शन ब्यूरो (एसीबी) ने रिश्वत लेते हुए रंगे हाथों पकड़ा था।
खुटपाली मामला: विभागीय जांच में तत्कालीन ईई यूएस राम, एसडीओ एसके दुबे, उप अभियंता जेके साहू, आरसी जैन, एनसी सिंह तथा एसडीओ विनोद भगत व राजेंद्र भगत को सीधे तौर पर जिम्मेदार ठहराया गया था। इसके बावजूद विभाग ने इन अधिकारियों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की।
क्या कहते हैं विभागीय अधिकारी...
देरी और लागत बढ़ने का कारण जमीन अधिग्रहण, वन विभाग की एनओसी और पुनर्वास में लगा समय है। निर्माण के दौरान कुछ नए और जरूरी काम सामने आए, इसलिए बिना मंजूरी अतिरिक्त खर्च बढ़ा। अफसर यह भी दावा कर रहे हैं कि बांध और बैराज बन चुके हैं और नहरों से पानी दिया जा रहा है।
सिंचाई विभाग के मुख्य अभियंता अनिल खलखो का कहना है कि सीएजी की आपत्ति वाली पुरानी व अधूरी योजनाओं का रिवाइज्ड एस्टीमेट तैयार किया जा रहा है। फंड मिलने पर अधूरे काम पूरे कराए जाएंगे। हालांकि, सीएजी रिपोर्ट में वित्तीय गड़बड़ियों की जवाबदेही तय करने की मांग के बाद, अब शासन स्तर पर एक उच्च स्तरीय जांच कमेटी के गठन की सुगबुगाहट तेज हो गई है।
