हे राम ! जल संसाधन विभाग में भ्रष्टाचार की बाढ़: करोड़ों के घोटालेबाजों को सत्ता का खुला संरक्षण, दागी अफसरों को मलाईदार कुर्सियों का 'इनाम'
जल संसाधन विभाग में सुशासन और भ्रष्टाचार मुक्त प्रशासन के सरकारी दावों की पोल खुल गई है। दबेना एनीकट (APS) सुरक्षा निधि मामले, 2549 करोड़ के सिकासेर कोडार टेंडर विवाद और 150 करोड़ के घोटाले में फंसे अधिकारियों पर निलंबन की गाज गिराने के बजाय, उन्हें पदोन्नति और महत्वपूर्ण विभागों का प्रभार सौंपकर सरकार ने पूरी प्रशासनिक व्यवस्था, अपनी ही नीयत और जीरो टॉलरेंस की नीति को कटघरे में खड़ा कर दिया है।
रायपुर। छत्तीसगढ़ के जल संसाधन विभाग में इन दिनों गजब का प्रशासनिक खेल चल रहा है। सत्ता के गलियारों का नया नियम यह बन गया है कि जो अफसर जितना बड़ा दागी है, उसे उतनी ही बड़ी मलाईदार कुर्सी इनाम में दी जा रही है। सरकार एक तरफ भ्रष्टाचार पर 'जीरो टॉलरेंस' का ढोल पीटकर जनता की वाहवाही लूटने का प्रयास करती है, तो दूसरी तरफ गंभीर आरोपों से घिरे अधिकारियों को महत्वपूर्ण प्रभार सौंपकर अपने ही दावों की धज्जियां उड़ा रही है।
हाल ही में 17 अक्टूबर 2026 को जारी एक विभागीय आदेश ने पूरी प्रशासनिक व्यवस्था की पारदर्शिता का जनाजा निकाल दिया है। इस आदेश ने साबित कर दिया है कि विभाग में ट्रांसफर और पोस्टिंग का एक बड़ा सिंडिकेट काम कर रहा है, जो भ्रष्ट अधिकारियों को सीधा राजनीतिक संरक्षण दे रहा है।
आई.ए. सिद्दीकी: फाइलों में घोटाले, हकीकत में प्रमोशन
विभाग के कृपापात्र अधिकारियों में सबसे पहला नाम आई.ए. सिद्दीकी का है। बिलासपुर के कोटा संभाग में 'दबेना एनीकट परियोजना' में काम पूरा होने से पहले ही चहेते ठेकेदार को 53 लाख रुपये की अतिरिक्त सुरक्षा निधि लौटा दी गई। मात्र 5.20 करोड़ की इस परियोजना में हुई इस खुली लूट का मुद्दा जब जनहितैषी और मुखर विपक्षी विधायक विद्यावती सिदार ने पूरी ताकत और तथ्यों के साथ विधानसभा में उठाया, तो सरकार के पसीने छूट गए थे।
घबराई सरकार ने कार्रवाई का प्रस्ताव तो भेजा, लेकिन भ्रष्ट तंत्र के गठजोड़ ने फाइलों को विभागीय गलियारों में ही दफना दिया। सजा के बजाय सिद्दीकी साहब को फरवरी 2026 में अधीक्षण अभियंता बना दिया गया। बची-खुची कसर 17 अक्टूबर के आदेश ने पूरी कर दी, जब उन्हें जल संसाधन एवं भू-जल सर्वेक्षण मंडल, रायपुर के साथ मुख्य अभियंता (प्लानिंग) का अत्यंत महत्वपूर्ण अतिरिक्त प्रभार भी दे दिया गया।
यही सिद्दीकी 2549 करोड़ के 'सिकासेर कोडार लिंक परियोजना' में भी संदिग्ध हैं, जहां चहेती कंपनियों को फायदा पहुंचाने के लिए टेंडर में औसत वार्षिक टर्नओवर की शर्त को बेतहाशा बढ़ाकर 5099 करोड़ रुपये कर दिया गया। क्या यही सरकार का सुशासन है?
शिवराम सिंघारे: आपत्तियों और वापसी का जादुई खेल
इसी टेंडर विवाद से जुड़ा दूसरा नाम शिवराम सिंघारे का है। सिंघारे ने टेंडर की मनमानी शर्तों पर आपत्ति दर्ज की, तो अगस्त में उन्हें आनन-फानन में हटाकर शिवनाथ भवन में अटैच कर दिया गया। लेकिन अक्टूबर आते-आते ऐसा क्या जादुई खेल हुआ कि उन्हें फिर से प्रमुख अभियंता कार्यालय, नवा रायपुर में अधीक्षण अभियंता के पद पर पूरे रुतबे के साथ बैठा दिया गया?
दिसंबर 2025 की शिकायतों के अनुसार, सिंघारे पर बिना अनुमति नियमित बीई सिविल की पढ़ाई करने और दंतेवाड़ा में भारी वित्तीय अनियमितताओं के आरोप हैं। क्या इन आरोपों की कोई जांच हुई? या सत्ता पक्ष ने इनकी फाइलें रद्दी की टोकरी के हवाले कर दी हैं?
वेद प्रकाश पांडे के 150 करोड़ के भ्रष्टाचार और 16 कमरों का अवैध 'महल' पर....
जल संसाधन विभाग में सबसे बड़ा अचरज तो वेद प्रकाश पांडे का मामला है। गोपनीय प्रतिवेदन (सीआर) बदलकर कार्यपालन अभियंता से अधीक्षण अभियंता बनने वाले पांडे जी ने जल संसाधन मण्डल, बस्तर में कब्जा जमा लिया है।
आरोप है कि पिछले दो वर्षों में इस अधिकारी ने 150 करोड़ से अधिक का भ्रष्टाचार किया है। विडंबना देखिए, इस भ्रष्टाचार की जांच के बजाय राज्य शासन ने उन्हें प्रमोशन का तोहफा दे दिया। सरकार की इस मेहरबानी को देखकर तो लगता है कि वेद प्रकाश पांडे को भ्रष्टाचार के लिए 'पद्म विभूषण' से सम्मानित कर देना चाहिए!
नियमतः इस अधिकारी को 3 कमरों (1800 वर्ग फीट) का बंगला मिल सकता है, लेकिन बिना तकनीकी और प्रशासकीय स्वीकृति के इन्होंने 16 कमरों का आलीशान भवन तान दिया है। जहां 8 चौकीदार और 24 घंटे एक गार्ड तैनात रहता है। इतना अमला तो शायद मुख्यमंत्री के बंगले में भी न हो ! दिन में 100 रुपये की बोतल का हिमालय का पानी पीने वाले इस अफसर का जलवा ऐसा है कि क्षेत्रीय विधायक और मंत्री भी इसके सामने नतमस्तक नजर आते हैं। हजारों शिकायतों के बाद भी सरकार का किंकर्तव्यविमूढ़ रहना कई गंभीर सवाल खड़े करता है। ऐसा लगता है कि कहीं अगला मुख्यमंत्री वेद प्रकाश पांडे ही न बन जाएं।
लोकतंत्र और जवाबदेही पर करारा तमाचा
जब विपक्ष इन भ्रष्ट नीतियों और अधिकारियों को बचाने की मुहिम पर तीखे सवाल उठाता है, तो सत्ता पक्ष के नेता बगलें झांकने लगते हैं। एक मजबूत और जीवंत लोकतंत्र में प्रशासन की जवाबदेही और पूर्ण पारदर्शिता सबसे अहम होती है। लेकिन छत्तीसगढ़ का जल संसाधन विभाग जिस बेशर्मी से काम कर रहा है, वह लोकतंत्र के मूल्यों के मुंह पर करारा तमाचा है।
सरकार को खुले मंच से यह बताना होगा कि आखिर इन दागी अधिकारियों को गोद में बिठाकर मलाई खिलाने की असली वजह क्या है? जब तक प्रशासन में बैठे इन दागी अधिकारियों के खिलाफ निष्पक्ष जांच नहीं होती और दोषियों को जेल की सलाखों के पीछे नहीं भेजा जाता, तब तक सरकार का 'सुशासन' और 'पारदर्शिता' का हर दावा महज एक खोखला धोखा ही साबित होगा।
