अरण्य भवन के डेटा से खुलासा: 6 साल में बंटा 120.96 करोड़ का मुआवजा; वन्यजीवों के हमले में 541 की मौत, 1492 हुए अपाहिज
कागजों पर दौड़ रहीं हाथी मित्र दल और रेडियो कॉलर जैसी करोड़ों की योजनाएं; 88 हजार मामलों में 28 हजार हेक्टेयर फसल तबाह, किसान दफ्तरों के चक्कर काटने को मजबूर
रायपुर। छत्तीसगढ़ के ग्रामीण और वनांचल क्षेत्रों में वन्यजीवों की दस्तक और मानव-वन्यजीव द्वंद्व अब एक स्थायी आर्थिक-सामाजिक संकट का रूप ले चुका है। आरटीआई कार्यकर्ता राकेश चौबे द्वारा अरण्य भवन से हासिल दस्तावेजों में इस संकट की भयावह तस्वीर सामने आई है। प्राप्त आंकड़ों के मुताबिक, राज्य सरकार और वन विभाग ने बीते छह वित्तीय वर्षों (2020-21 से 2025-26) में कुल 1,12,240 प्रकरणों का निपटारा किया है और 120.96 करोड़ रुपए का मुआवजा बांटे जाने का दावा किया है। इन आधिकारिक आंकड़ों के विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि इस अवधि के दौरान वन्यजीवों के सीधे हमलों में 541 लोगों की जान गई है, जबकि 1,492 लोग गंभीर रूप से घायल या स्थायी तौर पर अपाहिज हो चुके हैं। विभाग की पूरी कार्यप्रणाली हादसों के बाद केवल राहत राशि का चेक थमाने तक सीमित है, जबकि जमीनी स्तर पर पूर्व सुरक्षा मुहैया कराने का पूरा सिस्टम फेल साबित हो रहा है।
28 हजार हेक्टेयर फसल तबाह, कागजी प्रक्रियाओं में उलझे किसान
मुआवजा वितरण के दस्तावेजों की पड़ताल से पता चलता है कि वन्यजीवों (मुख्यतः हाथियों के दल) ने इस अवधि में 28,036.98 हेक्टेयर खेतों की खड़ी फसल को पूरी तरह चौपट कर दिया है। फसल नुकसान के इन 88 हजार से ज्यादा मामलों में वन विभाग द्वारा 56.48 करोड़ रुपए का मुआवजा जारी किया गया है। लेकिन जमीनी हकीकत इन करोड़ों के आंकड़ों से जुदा है। प्रभावित किसानों को इस राशि को प्राप्त करने के लिए पटवारी के मुआयने से लेकर वन रेंजर की रिपोर्ट तक की लंबी कागजी प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ रहा है। कई मामलों में तकनीकी त्रुटियों का हवाला देकर आवेदन निरस्त किए जा रहे हैं, जिससे किसानों में व्यवस्था के खिलाफ भारी असंतोष व्याप्त है।
सुरक्षा पर खर्च हो रहे करोड़ों रुपए, फिर भी रिस्पॉन्स टाइम धीमा
आरटीआई रिपोर्ट यह भी स्पष्ट करती है कि मानव-वन्यजीव संघर्ष रोकने के लिए विभाग द्वारा संचालित किए जा रहे तकनीकी और मैदानी प्रोजेक्ट्स का कोई सीधा असर प्रभावित क्षेत्रों में नहीं दिख रहा है। वन विभाग द्वारा रेडियो कॉलर ट्रैकिंग सिस्टम, गजराज ऐप का संचालन, हाथी मित्र दल की तैनाती और सोलर फेंसिंग जैसी योजनाओं के नाम पर हर साल करोड़ों रुपए का बजट जारी किया जा रहा है। इसके बावजूद मौत और फसल तबाही के ग्राफ में कोई कमी नहीं आई है। बजट खर्च और नतीजों की तुलना करें तो विभाग की मैदानी टीमों का रिस्पॉन्स टाइम अभी भी बेहद धीमा है।
बदल रहे हैं संघर्ष के हॉटस्पॉट, फसल कटाई के समय सबसे ज्यादा खतरा
वन विभाग की इंटरनल रिपोर्टिंग के अनुसार, राज्य में मानव-वन्यजीव संघर्ष के हॉटस्पॉट तेजी से बदल रहे हैं। वर्तमान में सरगुजा, रायगढ़, कोरबा, सूरजपुर और धमतरी-बालोद वन मंडल हाथियों व तेंदुओं के हमलों के लिहाज से सबसे अधिक संवेदनशील जोन के रूप में चिह्नित किए गए हैं। विशेषकर फसल कटाई के मौसम में इन इलाकों में वन्यजीवों की आवाजाही अचानक बढ़ जाती है, जिससे रात के समय गांवों में दहशत का माहौल रहता है।
मैदानी हकीकत: दावों और फाइलों के बीच उलझे दो बड़े केस
1. बालोद का कुंज कन्हार: फौरी राहत, पर जान का नुकसान
अगस्त 2023 में बालोद जिले के डौंडी वन परिक्षेत्र के कुंज कन्हार में सुबह घर से बाहर निकली 60 वर्षीय गीताबाई को दंतैल हाथी ने कुचल दिया था, जिससे मौके पर ही उनकी मौत हो गई थी। विभागीय रिकॉर्ड के मुताबिक, इस मामले में वन विभाग द्वारा समय पर मुआवजा प्रक्रिया पूरी कर ली गई, जिससे पीड़ित परिवार को फौरी आर्थिक राहत मिल सकी।
2. कांकेर का लारगांव: 18 लाख का दावा, परिवार के हाथ खाली
कांकेर के लारगांव में भालू के हमले में एक ही परिवार के तीन सदस्यों की दर्दनाक मौत का मामला सामने आया था। क्षेत्रीय डीएफओ के आधिकारिक बयान के अनुसार, नियमानुसार परिजनों को 6-6 लाख रुपए (कुल 18 लाख) का मुआवजा दिया जाना है। हालांकि, जमीनी स्थिति इसके उलट है। परिजनों ने आरोप लगाया है कि उन्हें अब तक न तो राहत राशि का भुगतान हुआ है और न ही मृतक खोरिन जुरीं की पोस्टमार्टम (पीएम) रिपोर्ट विभाग द्वारा उपलब्ध कराई गई है।
ठोस नीति का अभाव
विभागीय कार्यप्रणाली से साफ है कि मुआवजा व्यवस्था केवल तात्कालिक मरहम का काम कर रही है। जब तक वाइल्डलाइफ कॉरिडोर्स को अतिक्रमण से मुक्त कर जंगलों के भीतर ही भोजन-पानी की व्यवस्था नहीं की जाती और पारदर्शी डिजिटल मुआवजा ट्रैकिंग सिस्टम लागू नहीं होता, जान-माल का नुकसान नहीं रुकेगा।
