नहीं तय कर सकता कर्मचारी का हक, हाईकोर्ट ने SC आयोग की सिफारिश पर लगाई रोक
बिलासपुर : छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने अनुसूचित जाति आयोग के अधिकार क्षेत्र को लेकर एक अहम फैसला सुनाते हुए साफ कर दिया है कि आयोग सेवा संबंधी मामलों में न्यायिक फैसला सुनाने वाली संस्था नहीं है। राज्य अनुसूचित जाति आयोग केवल सिफारिश और सलाह दे सकता है, लेकिन किसी कर्मचारी के सेवा अधिकार तय करने या विभाग पर बाध्यकारी आदेश थोपने का अधिकार आयोग के पास नहीं है। जस्टिस ए के प्रसाद की सिंगल बेंच ने नागरिक आपूर्ति निगम की याचिका स्वीकार करते हुए आयोग की ओर से 12 अगस्त 2021 को कर्मचारी प्रमोद कुमार जांगड़े को सेवा संबंधी लाभ देने के लिए जारी सिफारिश को रद्द कर दिया।
मामले में नागरिक आपूर्ति निगम की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता वी आर तिवारी और अतुल कुमार केशरवानी ने पैरवी की। निगम ने हाईकोर्ट में तर्क दिया कि अनुसूचित जाति आयोग ने अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर कर्मचारी को सेवा लाभ देने की सिफारिश की है। निगम के मुताबिक आयोग का यह कदम महज सलाह देने तक सीमित नहीं था, बल्कि न्यायिक निर्णय की तरह अधिकार तय करने का प्रयास था।
आयोग की सिफारिश केवल सलाहकारी
कर्मचारी प्रमोद कुमार जांगड़े की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मनोज परांजपे ने पक्ष रखते हुए कहा कि आयोग की सिफारिश केवल सलाहकारी प्रकृति की थी। उन्होंने कोर्ट को यह भी बताया कि कर्मचारी की बहाली का आदेश पहले ही हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच से पारित हो चुका है और सुप्रीम कोर्ट भी इसकी पुष्टि कर चुका है। मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले मुंबई पोर्ट अथॉरिटी बनाम राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग (2026) का भी हवाला दिया। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया है कि अनुसूचित जाति आयोग की भूमिका मुख्य रूप से सलाहकारी और सिफारिशी है। आयोग को सेवा मामलों में न्यायनिर्णयन करने अथवा बाध्यकारी आदेश जारी करने की शक्ति प्राप्त नहीं है।
हाईकोर्ट: आयोग ने लांघी अपनी सीमा
जस्टिस ए के प्रसाद की सिंगल बेंच ने पाया कि मौजूदा मामले में आयोग ने कर्मचारी को सेवा लाभ देने की सिफारिश करते हुए अपनी निर्धारित वैधानिक सीमा से आगे कदम बढ़ाया। अदालत ने माना कि आयोग के पास इस तरह से कर्मचारी के सेवा अधिकार तय करने का क्षेत्राधिकार नहीं था। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने 12 अगस्त 2021 की विवादित सिफारिश को रद्द कर दिया।
सिफारिश रद्द का असर विभागीय कार्रवाई पर नहीं
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में यह भी स्पष्ट कर दिया कि आयोग की सिफारिश रद्द होने के बाद कर्मचारी उस आदेश के आधार पर किसी अलग सेवा लाभ का दावा नहीं कर सकेगा। हालांकि, अदालत ने यह भी साफ किया कि इस आदेश का कर्मचारी के खिलाफ नियमों के तहत की जाने वाली किसी विभागीय कार्रवाई या कानूनी प्रक्रिया पर कोई असर नहीं पड़ेगा। सक्षम प्राधिकारी कानून और नियमों के अनुसार स्वतंत्र रूप से निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र होंगे। इस फैसले से हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण कानूनी सीमा रेखा खींच दी है कि सिफारिश करने वाले आयोग और न्यायिक निर्णय देने वाली संस्था की शक्तियां अलग-अलग हैं। आयोग की सिफारिश को अदालत का बाध्यकारी आदेश नहीं माना जा सकता।
