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                <title>प्रशासनिक  - National Jagat Vision</title>
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                            <item>
                <title>बिलासपुर में रेत माफिया का नया ठिकाना अब गांव बने डंपिंग यार्ड आखिर किसके संरक्षण में चल रहा अरपा नदी में अवैध खनन का खेल</title>
                                    <description><![CDATA[<p>बिलासपुर जिले में जीवनदायिनी अरपा नदी का अस्तित्व अब भारी खतरे में पड़ गया है। रेत माफिया पूरी तरह से बेखौफ होकर नदी का सीना चीर रहे हैं। प्रशासनिक कार्रवाई से बचने के लिए अब इन माफियाओं ने एक नई तरकीब निकाल ली है। इन्होंने शहर से दूरी बनाकर ग्रामीण इलाकों को अपना सुरक्षित ठिकाना बना लिया है। बेलतरा विधानसभा क्षेत्र के बैमा नगोई रोड पर इसका एक बड़ा उदाहरण देखने को मिला है। यहां के खेतों में सौ ट्रैक्टर से भी ज्यादा रेत डंप करके रखी गई है। इस पूरे अवैध कारोबार को देखकर अब सबसे बड़ा सवाल यही</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.nationaljagatvision.com/chhattisgarh/sand-mafias-new-base-in-bilaspur-now-village-has-become/article-9141"><img src="https://www.nationaljagatvision.com/media/400/2026-04/20260412_091609.jpg" alt=""></a><br /><p>बिलासपुर जिले में जीवनदायिनी अरपा नदी का अस्तित्व अब भारी खतरे में पड़ गया है। रेत माफिया पूरी तरह से बेखौफ होकर नदी का सीना चीर रहे हैं। प्रशासनिक कार्रवाई से बचने के लिए अब इन माफियाओं ने एक नई तरकीब निकाल ली है। इन्होंने शहर से दूरी बनाकर ग्रामीण इलाकों को अपना सुरक्षित ठिकाना बना लिया है। बेलतरा विधानसभा क्षेत्र के बैमा नगोई रोड पर इसका एक बड़ा उदाहरण देखने को मिला है। यहां के खेतों में सौ ट्रैक्टर से भी ज्यादा रेत डंप करके रखी गई है। इस पूरे अवैध कारोबार को देखकर अब सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि आखिर इन रेत माफियाओं को किसका राजनीतिक संरक्षण मिला हुआ है।</p>
<p>बिना किसी बड़े सफेदपोश नेता या रसूखदार अफसर की शह के इतने बड़े पैमाने पर अवैध काम होना बिल्कुल भी मुमकिन नहीं है। पहले ये माफिया शहर के आसपास ही रेत का स्टॉक करते थे। वहां आम लोगों की नजर आसानी से पड़ जाती थी जिससे शिकायत होने और कार्रवाई का डर हमेशा बना रहता था। अब इस डर को खत्म करने के लिए माफियाओं ने सुनसान ग्रामीण इलाकों का रुख कर लिया है। अब किसानों के खुले खेतों को अवैध डंपिंग यार्ड में बदल दिया गया है। गांवों में निगरानी न के बराबर होती है। बारिश के मौसम में जब नदियों से रेत निकालना बंद हो जाता है तब इसी स्टॉक की गई रेत को मनमाने और बहुत महंगे दामों पर बेचा जाता है।</p>
<p>कोनी से लेकर कोटा तक अवैध खनन का यह काला खेल पूरी रात बेरोकटोक चलता है। कोनी तुकांडीह लोखंडी निरतु और कोटा के पास अरपा नदी में रात के अंधेरे में दर्जनों मशीनें और ट्रैक्टर उतारे जाते हैं। पुलिस और खनिज विभाग की कार्रवाई से बचने के लिए खनन का काम रात में होता है और दिन के उजाले में इसे गांवों में डंप किया जाता है। रेत के परिवहन के लिए ऐसे ट्रैक्टर और बड़े हाइवा ट्रकों का इस्तेमाल किया जा रहा है जिन पर कोई नंबर प्लेट ही नहीं होती। मुख्य मार्गों से होते हुए धड़ल्ले से यह रेत मुंगेली जांजगीर चांपा और आसपास के अन्य कई जिलों में सप्लाई की जा रही है।</p>
<p>इस अवैध कारोबार से सरकार को हर दिन लाखों रुपये के राजस्व का सीधा नुकसान हो रहा है। नियमों की खुलेआम अनदेखी हो रही है लेकिन पूरा सिस्टम आंखें मूंदे बैठा है। खेतों में रेत डंप होने से किसानों की उपजाऊ जमीन बंजर हो रही है। लगातार हो रहे इस अंधाधुंध खनन से पर्यावरण को भी गहरी चोट पहुंच रही है। ग्रामीणों ने साफ आरोप लगाया है कि जब वे इस अवैध काम की शिकायत करने के लिए जिम्मेदार अधिकारियों को फोन लगाते हैं तो उनका फोन ही नहीं उठता। कोई अधिकारी मौके पर झांकने तक नहीं आता। यह साफ इशारा करता है कि इस सिंडिकेट में नीचे से लेकर ऊपर तक के लोग शामिल हैं।</p>
<p>आखिर रेत माफिया इतने ताकतवर कैसे हो गए कि वे सीधे किसानों के खेतों पर कब्जा करके वहां रेत का पहाड़ खड़ा कर रहे हैं। क्या पुलिस और प्रशासन का तंत्र इतना कमजोर हो गया है कि उन्हें रात में दौड़ते बिना नंबर वाले ट्रैक्टर नजर नहीं आते। प्रशासन की यह निष्क्रियता कई सवाल खड़े करती है। इस पूरे मामले पर बिलासपुर खनिज विभाग के उप निदेशक किशोर गोलघाटे ने कहा है कि एक टीम भेजकर मौके की जांच कराई जाएगी। अगर खेतों में अवैध रूप से रेत डंप किए जाने की बात सही पाई जाती है तो विभाग सख्त कार्रवाई करेगा। डंप की गई पूरी रेत को जब्त भी किया जाएगा। अब देखना यह है कि यह बयान सिर्फ कागजों तक सीमित रहता है या सच में रसूखदार माफियाओं पर कोई बड़ी कार्रवाई होती है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>बिलासपुर</category>
                                            <category>छत्तीसगढ़</category>
                                            <category>प्रशासनिक </category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 12 Apr 2026 09:16:45 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[मनीशंकर पांडेय]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>शिकायत सही मिली अब, ब्रिलियंट पब्लिक स्कूल की मान्यता खत्म करने की सिफारिश</title>
                                    <description><![CDATA[<p>बिलासपुर में शिक्षा के नाम पर एक बड़े फर्जीवाड़े का पर्दाफाश हुआ है। यहां के निजी स्कूलों ने अभिभावकों और मासूम बच्चों के साथ बहुत बड़ा धोखा किया है। स्कूलों ने पूरे साल बच्चों को सीबीएसई बोर्ड का छात्र बताकर पढ़ाया। सीबीएसई के नाम पर अभिभावकों से भारी भरकम फीस वसूली गई। लेकिन जब कक्षा पांचवीं और आठवीं की बोर्ड परीक्षा का वक्त आया तो स्कूलों ने असली रंग दिखा दिया। बच्चों पर अचानक छत्तीसगढ़ माध्यमिक शिक्षा मंडल की परीक्षा देने का दबाव बनाया गया।</p>
<p>इस गंभीर मामले में ब्रिलियंट पब्लिक स्कूल व्यापार विहार पर अब तक की सबसे बड़ी</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.nationaljagatvision.com/crime/big-fraud-in-the-name-of-cbse-in-bilaspur-recommendation/article-9140"><img src="https://www.nationaljagatvision.com/media/400/2026-04/image_search_1775964082759.jpg" alt=""></a><br /><p>बिलासपुर में शिक्षा के नाम पर एक बड़े फर्जीवाड़े का पर्दाफाश हुआ है। यहां के निजी स्कूलों ने अभिभावकों और मासूम बच्चों के साथ बहुत बड़ा धोखा किया है। स्कूलों ने पूरे साल बच्चों को सीबीएसई बोर्ड का छात्र बताकर पढ़ाया। सीबीएसई के नाम पर अभिभावकों से भारी भरकम फीस वसूली गई। लेकिन जब कक्षा पांचवीं और आठवीं की बोर्ड परीक्षा का वक्त आया तो स्कूलों ने असली रंग दिखा दिया। बच्चों पर अचानक छत्तीसगढ़ माध्यमिक शिक्षा मंडल की परीक्षा देने का दबाव बनाया गया।</p>
<p>इस गंभीर मामले में ब्रिलियंट पब्लिक स्कूल व्यापार विहार पर अब तक की सबसे बड़ी गाज गिरने वाली है। शिक्षा विभाग की जांच समिति ने मामले की बारीकी से जांच की है। जांच के बाद समिति ने इस स्कूल की मान्यता पूरी तरह समाप्त करने का प्रस्ताव जिला शिक्षा अधिकारी को भेज दिया है। इस बड़ी खबर के बाद शिक्षा के नाम पर दुकान चलाने वालों में हड़कंप मचा हुआ है।</p>
<p>यह फर्जीवाड़ा उस समय बेनकाब हुआ जब ठगे गए अभिभावकों ने केंद्रीय राज्यमंत्री तोखन साहू से मुलाकात की। अभिभावक इस मामले को लेकर सबसे पहले बिलासपुर कलेक्टर के पास गए थे। वहां से उन्हें कोई राहत नहीं मिली। मामले का हल नहीं निकलने पर अभिभावकों का गुस्सा और बढ़ गया। उन्होंने एकजुट होकर केंद्रीय राज्यमंत्री को स्कूलों की पूरी करतूत बताई। मंत्री तोखन साहू ने इस मामले को बेहद गंभीरता से लिया। उन्होंने तुरंत शिक्षा विभाग के आला अधिकारियों को उच्च स्तरीय जांच करने के सख्त निर्देश दिए।</p>
<p>मंत्री के निर्देश पर शिक्षा विभाग की टीम ने स्कूलों का रिकार्ड खंगाला। जांच में अभिभावकों की एक एक शिकायत बिल्कुल सच साबित हुई। जांच रिपोर्ट में यह बात सामने आई है कि मिशन अस्पताल रोड और व्यापार विहार स्थित ब्रिलियंट पब्लिक स्कूल के साथ ही अमेरी रोड स्थित नारायण ई टेक्नो स्कूल ने भी ऐसा ही धोखा किया है। इन स्कूलों ने बिना पूरी मान्यता के खुद को सीबीएसई का स्कूल बताया। पैरेंट्स को गुमराह करके एडमिशन लिए।</p>
<p>इस पूरे मामले का सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि स्कूलों ने बच्चों को परीक्षा से ठीक एक दिन पहले बोर्ड बदलने की जानकारी दी। बच्चों को अचानक बताया गया कि उन्हें सीबीएसई की नहीं बल्कि राज्य सरकार के पैटर्न पर सीजी बोर्ड की परीक्षा देनी है। परीक्षा से सिर्फ चौबीस घंटे पहले यह खबर सुनकर बच्चे बुरी तरह तनाव में आ गए। पूरे साल सीबीएसई की किताबें पढ़ने वाले बच्चों को दूसरे सिलेबस से परीक्षा देने के लिए मजबूर किया गया। बच्चों को नई परीक्षा की तैयारी करने के लिए थोड़ा सा भी समय नहीं दिया गया।</p>
<p>अभिभावकों का सीधा आरोप है कि स्कूलों की इस धोखाधड़ी से बच्चों का मानसिक संतुलन बिगड़ गया। यह केवल पैसों की लूट का मामला नहीं है बल्कि बच्चों के भविष्य के साथ भयानक खिलवाड़ है। जांच अधिकारियों ने भी अपनी रिपोर्ट में स्कूल प्रबंधन की इस हरकत को शिक्षा के नियमों का खुला उल्लंघन माना है।</p>
<p>जांच समिति की रिपोर्ट मिलने के बाद जिला शिक्षा अधिकारी कार्यालय में ब्रिलियंट पब्लिक स्कूल की मान्यता खत्म करने की फाइल आगे बढ़ गई है। शिक्षा विभाग के अधिकारी जल्द ही इस पर अंतिम आदेश जारी कर सकते हैं। इस सख्त कार्रवाई की भनक लगते ही शहर के बाकी स्कूल संचालक भी घबराए हुए हैं। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>अपराध</category>
                                            <category>बिलासपुर</category>
                                            <category>छत्तीसगढ़</category>
                                            <category>प्रशासनिक </category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 12 Apr 2026 08:52:12 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[मनीशंकर पांडेय]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>शिक्षा विभाग की घोर लापरवाही चौथी के पेपर में आपत्तिजनक सवाल पूछने वालों को बचा रहे अफसर फाइल दबाकर बैठे</title>
                                    <description><![CDATA[<p>रायपुर. स्कूल शिक्षा विभाग इन दिनों अपनी मनमर्जी और तानाशाही रवैये से चल रहा है। यहां नियम और कानून की खुलेआम धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। चौथी कक्षा की अंग्रेजी परीक्षा में एक बेहद आपत्तिजनक और विवादित सवाल पूछा गया था। इस मामले ने पूरे छत्तीसगढ़ में भारी बवाल मचाया था। शासन स्तर पर मामले की गंभीरता को देखते हुए अवर सचिव ने 20 मार्च तक जांच रिपोर्ट तलब की थी। लेकिन डीपीआई यानी लोक शिक्षण संचालनालय के अफसर दोषियों को खुलेआम बचाने में लगे हैं। उन्होंने इस बेहद अहम जांच रिपोर्ट को ही दबा दिया है। अब तक यह</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.nationaljagatvision.com/chhattisgarh/gross-negligence-of-education-department-officers-are-protecting-those-who/article-9118"><img src="https://www.nationaljagatvision.com/media/400/2026-04/image_search_1775879944681.jpg" alt=""></a><br /><p>रायपुर. स्कूल शिक्षा विभाग इन दिनों अपनी मनमर्जी और तानाशाही रवैये से चल रहा है। यहां नियम और कानून की खुलेआम धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। चौथी कक्षा की अंग्रेजी परीक्षा में एक बेहद आपत्तिजनक और विवादित सवाल पूछा गया था। इस मामले ने पूरे छत्तीसगढ़ में भारी बवाल मचाया था। शासन स्तर पर मामले की गंभीरता को देखते हुए अवर सचिव ने 20 मार्च तक जांच रिपोर्ट तलब की थी। लेकिन डीपीआई यानी लोक शिक्षण संचालनालय के अफसर दोषियों को खुलेआम बचाने में लगे हैं। उन्होंने इस बेहद अहम जांच रिपोर्ट को ही दबा दिया है। अब तक यह फाइल शिक्षा सचिव की टेबल तक नहीं पहुंच सकी है। इससे साफ पता चलता है कि शिक्षा विभाग में किस कदर मनमानी हावी है।</p>
<p>इस पूरे विवाद की शुरुआत कक्षा चौथी की अर्धवार्षिक परीक्षा से हुई थी। अंग्रेजी के प्रश्न पत्र में एक ऐसा सवाल पूछ लिया गया जो पूरी तरह से विवादित और छोटे बच्चों के लिए घोर आपत्तिजनक था। बच्चों के मानसिक स्तर को पूरी तरह दरकिनार कर दिया गया और मनमाने तरीके से यह पेपर सेट किया गया। प्रश्न पत्र तैयार करने की जो तय प्रक्रिया होती है उसका रत्ती भर भी पालन नहीं किया गया। जब यह पेपर स्कूलों में बंटा तो हंगामा मच गया। पूरे प्रदेश के अभिभावकों और शिक्षाविदों ने इसकी कड़ी आलोचना की। इसके बाद मामले की शिकायत सीधे लोक शिक्षण संचालनालय में की गई ताकि दोषियों को सजा मिल सके।</p>
<p>बढ़ते दबाव और भारी फजीहत के बाद जांच तो शुरू हुई लेकिन वह विभागीय साठगांठ का शिकार हो गई। जांचकर्ताओं ने जब जिला शिक्षा अधिकारी से इस घोर लापरवाही पर जवाब मांगा तो वे कोई भी स्पष्ट या ठोस जवाब नहीं दे सके। जिम्मेदार अधिकारी के गोलमोल जवाब से जांच टीम भी पूरी तरह असंतुष्ट थी। जांच प्रतिवेदन में यह बात साफ तौर पर लिखी गई कि जवाब बिल्कुल संतोषजनक नहीं है। सारा मामला शीशे की तरह साफ था। इसके बावजूद डीपीआई के आला अफसरों ने इस गंभीर मामले की रिपोर्ट को आगे नहीं बढ़ाया।</p>
<p>शिक्षा विभाग के अवर सचिव ने सख्त निर्देश दिए थे कि 20 मार्च तक हर हाल में पूरी जांच रिपोर्ट प्रस्तुत की जाए। लेकिन विभाग के अफसरों के कानों पर जूं तक नहीं रेंगी। समय सीमा बीत जाने के बाद भी फाइल अफसरों की टेबल से आगे नहीं खिसकी। साफ है कि दोषियों पर कड़ी कार्रवाई करने के बजाय उन्हें पूरा सरकारी संरक्षण दिया जा रहा है। बात सिर्फ जांच रिपोर्ट को आलमारी में दबाने तक सीमित नहीं है। मामले को रफादफा करने की हर मुमकिन कोशिश की गई। इस पूरे मामले में जब सूचना के अधिकार के तहत जानकारी मांगी गई तो वहां भी बड़ा खेल किया गया। आरटीआई का जवाब देने में जानबूझकर महीनों की देरी की गई ताकि विभाग की नाकामी और सच्चाई जनता के सामने न आ सके।</p>
<p>लगातार दबाव बढ़ने पर शिक्षा विभाग ने महज दिखावे के लिए कुछ मामूली कार्रवाई शुरू की थी। लेकिन इसी बीच मामले में कोर्ट से स्टे ले लिया गया। इस स्टे का सीधा फायदा उन दोषियों को मिला जिन्होंने बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ किया था। आज हालत यह है कि अनियमितता और लापरवाही की इतनी बड़ी शिकायत होने के बाद भी कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है। शिक्षा विभाग के अफसर पूरी तरह से बेलगाम और बेखौफ हो चुके हैं। सवाल सेट करने में हुई इस भयानक लापरवाही के बाद भी किसी पर गाज नहीं गिरना पूरे सरकारी सिस्टम की सबसे बड़ी नाकामी है।</p>
<p>अब सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि आखिर डीपीआई के अफसर किसके दबाव में काम कर रहे हैं। वह कौन सी ताकत है जो चौथी कक्षा के बच्चों के प्रश्न पत्र में विवादित सवाल डालने वालों को बचा रही है। अवर सचिव के आदेशों को दरकिनार करने वाले इन अफसरों पर शासन कब कार्रवाई करेगा। यह पूरा घटनाक्रम बताता है कि शिक्षा विभाग में नीचे से लेकर ऊपर तक सब कुछ भगवान भरोसे चल रहा है। अभिभावक अब शासन के उच्च अधिकारियों से इस मामले में सीधे दखल देने की मांग कर रहे हैं ताकि इस पूरे मामले का पर्दाफाश हो सके और शिक्षा व्यवस्था पर लोगों का भरोसा दोबारा कायम हो सके।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>छत्तीसगढ़</category>
                                            <category>प्रशासनिक </category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 11 Apr 2026 09:29:26 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[मनीशंकर पांडेय]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>साड़ी घोटाले के बाद एक और मामला आया सामने महिला बाल विकास विभाग का नया कारनामा सिर्फ एक दीवार पोत कर डकार लिए लाखों रुपये</title>
                                    <description><![CDATA[<p><img src="https://www.nationaljagatvision.com/media/2026-04/20260401_110802.jpg" alt="20260401_110802" width="800" height="600" />रायपुर/ बिलासपुर छत्तीसगढ़ के महिला एवं बाल विकास विभाग में भ्रष्टाचार की जड़ें कितनी गहरी हो चुकी हैं इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि यहां एक के बाद एक घोटालों की झड़ी लग गई है। अभी प्रदेश भर की आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को बांटी गई छोटी और घटिया साड़ियों का मामला ठंडा भी नहीं हुआ था कि विभाग का एक नया कारनामा सामने आ गया है। इस बार अफसरों ने बच्चों के आंगनबाड़ी केंद्रों की रंगाई पुताई के फंड पर हाथ साफ कर दिया है। मस्तूरी ब्लॉक में यह घोटाला बहुत ही शातिराना तरीके से अंजाम दिया</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.nationaljagatvision.com/chhattisgarh/after-the-saree-scam-another-case-came-to-the-fore/article-9116"><img src="https://www.nationaljagatvision.com/media/400/2026-04/20260401_110802.jpg" alt=""></a><br /><p><img src="https://www.nationaljagatvision.com/media/2026-04/20260401_110802.jpg" alt="20260401_110802" width="800" height="600"></img>रायपुर/ बिलासपुर छत्तीसगढ़ के महिला एवं बाल विकास विभाग में भ्रष्टाचार की जड़ें कितनी गहरी हो चुकी हैं इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि यहां एक के बाद एक घोटालों की झड़ी लग गई है। अभी प्रदेश भर की आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को बांटी गई छोटी और घटिया साड़ियों का मामला ठंडा भी नहीं हुआ था कि विभाग का एक नया कारनामा सामने आ गया है। इस बार अफसरों ने बच्चों के आंगनबाड़ी केंद्रों की रंगाई पुताई के फंड पर हाथ साफ कर दिया है। मस्तूरी ब्लॉक में यह घोटाला बहुत ही शातिराना तरीके से अंजाम दिया गया है। फंड पूरे केंद्र को संवारने के लिए आया था लेकिन पुताई सिर्फ एक दीवार की गई। उसी दीवार की फोटो खींचकर फाइलें भर दी गईं और बाकी के लाखों रुपये सीधे भ्रष्ट अधिकारियों की जेब में चले गए।</p>
<p><img src="https://www.nationaljagatvision.com/media/2026-04/screenshot_20260411_082719_whatsappbusiness.jpg" alt="Screenshot_20260411_082719_WhatsAppBusiness" width="1078" height="1447"></img></p>
<h5><strong>कागजों पर चकाचक और जमीन पर बदहाल हैं 300 केंद्र</strong></h5>
<p>मस्तूरी विकासखंड में करीब 300 आंगनबाड़ी केंद्र चलते हैं। इन केंद्रों का मुख्य उद्देश्य छोटे बच्चों को शुरुआती शिक्षा देना और महिलाओं के विकास के लिए काम करना है। लेकिन यहां की जमीनी सच्चाई देखकर लगता है कि विकास सिर्फ कागजों पर हो रहा है। इन इमारतों की हालत बहुत ही खराब है। सालों से यहां मेंटेनेंस का कोई काम नहीं हुआ है। इमारतें बदरंग हो चुकी हैं और दीवारें खस्ताहाल हैं। विभाग बड़े बड़े दावे करता है कि उसने इसी साल सभी केंद्रों को चकाचक करवा दिया है। लेकिन जब असलियत सामने आई तो अधिकारियों के सारे दावों की हवा निकल गई।</p>
<h5><strong>मौखिक आदेश से हुआ खेल और लौट गया रंगाई का फंड</strong></h5>
<p>सूत्रों से मिली पुख्ता जानकारी के मुताबिक इन आंगनबाड़ी केंद्रों की रंगाई पुताई के लिए विभाग ने बकायदा फंड जारी किया था। हर सेक्टर के लिए 50 से 60 हजार रुपये मंजूर किए गए थे। यह रकम इसलिए थी ताकि बच्चे जब पढ़ने आएं तो उन्हें एक साफ सुथरा और सुंदर माहौल मिले। लेकिन इस नेक काम में भी भ्रष्टाचार का दीमक लग गया। एक बड़े भ्रष्ट अफसर ने मौखिक आदेश जारी किया और पूरा खेल ही पलट दिया। अधिकारी ने रंगाई पुताई के लिए आए पैसे को वापस मंगा लिया और ऐसा जुगाड़ भिड़ाया कि काम भी हो जाए और पैसा भी बच जाए।</p>
<h5> <strong>विभाग का स्मार्ट विकास सिर्फ एक दीवार पोतो और फोटो खींचो</strong></h5>
<p>इस घोटाले का तरीका इतना स्मार्ट है कि कोई भी आम आदमी सिर पकड़ ले। विभाग का यह विकास मॉडल वाकई गजब है। अफसर का फरमान था कि पैसा वापस करो और पुताई सिर्फ उतनी करो जितनी कैमरे में आ जाए। इसके बाद आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को मजबूर किया गया कि वे किसी भी एक दीवार पर रंग पोत दें। बस उसी एक चमचमाती दीवार के सामने खड़े होकर फोटो खींची गई और विभाग को भेज दी गई। ऊपर बैठे साहब लोगों ने इस फोटो को देखा और मान लिया कि पूरा केंद्र नया हो गया है। इस तरह काम पूरा दिखा कर एक बड़े फंड का सीधा बंदरबांट कर लिया गया।</p>
<h5> <strong>साड़ी वितरण में भी हुई थी भारी धोखाधड़ी</strong></h5>
<p>यह भ्रष्टाचार का कोई पहला मामला नहीं है। इससे ठीक पहले विभाग ने साड़ी वितरण में भी भारी गड़बड़ी की थी। पूरे छत्तीसगढ़ की आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं और सहायिकाओं को जो साड़ियां दी गई थीं उनकी क्वालिटी एकदम रद्दी थी। मानक के हिसाब से हर महिला को 6.3 मीटर की साड़ी दी जानी थी। इसमें 5.5 मीटर की मुख्य साड़ी और लगभग 80 सेंटीमीटर का ब्लाउज पीस होना चाहिए था। लेकिन जब महिलाओं ने पैकेट खोले तो उनके होश उड़ गए।</p>
<h5><strong>धोने के बाद और सिकुड़ गई साड़ियां</strong></h5>
<p>ग्राउंड पर बांटी गई इन साड़ियों की लंबाई 5.3 मीटर से भी कम निकली। कपड़े की क्वालिटी इतनी खराब थी कि एक बार पानी में डालते ही साड़ी और भी ज्यादा सिकुड़ गई। धोने के बाद कपड़े की लंबाई और चौड़ाई इतनी घट गई कि वह पहनने लायक ही नहीं बची। इस भद्दे मजाक से आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं और सहायिकाओं में भारी गुस्सा भर गया। उन्होंने साफ कह दिया कि वे ऐसी घटिया साड़ियां इस्तेमाल नहीं करेंगी। महिलाओं ने साड़ियां वापस कर दीं और विभाग के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए अपनी शिकायत भी दर्ज करा दी।</p>
<h5><strong>दबाव में काम कर रही हैं कार्यकर्ताएं</strong></h5>
<p>आंगनबाड़ी कार्यकर्ता आज दोहरी मार झेल रही हैं। जब वे विभाग से अपने हक की बात करती हैं तो उन्हें सिलाई और रंगाई के नाम पर सिर्फ धोखा मिलता है। ऊपर से अधिकारियों का इतना भारी दबाव रहता है कि वे खुलकर कुछ बोल भी नहीं पातीं। एक दीवार रंगने वाले मामले में भी यही हुआ। मौखिक आदेश देकर सारा काम करा लिया गया ताकि कल को कोई लिखित सबूत न बचे। यह भ्रष्टाचारियों की बहुत पुरानी और आजमाई हुई चाल है। लेकिन अब सच्चाई सबके सामने आ चुकी है। लोग इस भ्रष्टाचार को लेकर तरह तरह की बातें कर रहे हैं और विभाग की खूब किरकिरी हो रही है।</p>
<h5> <strong>पूरे जिले में हो सकता है लाखों के गबन का खुलासा</strong></h5>
<p>एक तरफ घटिया साड़ी थमा कर महिलाओं का मजाक उड़ाया गया और दूसरी तरफ बच्चों के केंद्रों का पैसा डकार लिया गया। दोनों ही मामलों में नुकसान सिर्फ आम जनता और ग्राउंड पर काम करने वाली महिलाओं का हुआ है। मस्तूरी ब्लॉक के 300 केंद्र आज भी अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहे हैं। सवाल यह उठता है कि जब सिर्फ एक ब्लॉक में इतना बड़ा खेल हो सकता है तो पूरे जिले में क्या हालात होंगे।</p>
<p>अगर इस रंगाई पुताई घोटाले की सही तरीके से और बिना किसी दबाव के जांच की जाए तो पूरे जिले में लाखों रुपये के भ्रष्टाचार का बड़ा पर्दाफाश होना तय है। जिन भ्रष्ट अफसरों ने एक दीवार पोत कर पूरा पैसा अपनी जेब में भरा है उनकी असलियत सामने आनी चाहिए। अब हर किसी की नजर इसी बात पर टिकी है कि क्या आला अधिकारी इस मामले में कोई सख्त एक्शन लेंगे या फिर यह करोड़ों का घोटाला भी हमेशा की तरह सरकारी फाइलों के किसी अंधेरे कोने में दब कर रह जाएगा।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>बिलासपुर</category>
                                            <category>छत्तीसगढ़</category>
                                            <category>प्रशासनिक </category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 11 Apr 2026 08:39:17 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[मनीशंकर पांडेय]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>जल संसाधन विभाग में महाघोटाला दागी ईएनसी इंद्रजीत उइके के पुराने काले कारनामे आए सामने अब सीबीआई जांच की उठी मांग</title>
                                    <description><![CDATA[<p>रायपुर छत्तीसगढ़ के जल संसाधन विभाग में हुए करोड़ों के पुराने घोटाले अब ईएनसी इंद्रजीत उइके के गले की फांस बनते जा रहे हैं। विभाग में बिना जमीन पर गए घर बैठे गूगल मैप से सर्वे कर 15 करोड़ निकालने की तैयारी हो या फिर स्टेशनरी और फर्जी भू अर्जन के नाम पर करोड़ों की लूट इन सभी पुराने मामलों में अब केंद्रीय जांच ब्यूरो यानी सीबीआई से जांच कराने की मांग तेज हो गई है। अफसरशाही पूरी तरह बेलगाम है और सरकारी खजाने को लूटने के लिए नियमों की धज्जियां उड़ाई गई हैं। प्रमुख अभियंता ईएनसी इंद्रजीत उइके की</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.nationaljagatvision.com/crime/old-dark-deeds-of-enc-indrajit-uike-tainted-with-mega/article-9112"><img src="https://www.nationaljagatvision.com/media/400/2026-04/20260410_173614.jpg" alt=""></a><br /><p>रायपुर छत्तीसगढ़ के जल संसाधन विभाग में हुए करोड़ों के पुराने घोटाले अब ईएनसी इंद्रजीत उइके के गले की फांस बनते जा रहे हैं। विभाग में बिना जमीन पर गए घर बैठे गूगल मैप से सर्वे कर 15 करोड़ निकालने की तैयारी हो या फिर स्टेशनरी और फर्जी भू अर्जन के नाम पर करोड़ों की लूट इन सभी पुराने मामलों में अब केंद्रीय जांच ब्यूरो यानी सीबीआई से जांच कराने की मांग तेज हो गई है। अफसरशाही पूरी तरह बेलगाम है और सरकारी खजाने को लूटने के लिए नियमों की धज्जियां उड़ाई गई हैं। प्रमुख अभियंता ईएनसी इंद्रजीत उइके की संदिग्ध भूमिका और उनकी नियम विरुद्ध संविदा नियुक्ति सबसे बड़े सवालों के घेरे में है। विभाग के गलियारों में यह चर्चा आम है कि सत्ताधारी नेताओं का सीधा संरक्षण पाकर दागी अफसरों ने यह खेल खेला और अब इस पूरे सिंडिकेट को तोड़ने के लिए सीबीआई जांच ही एकमात्र विकल्प है।</p>
<p><strong style="font-family:'Noto Sans Devanagari', sans;font-size:1.25rem;">गूगल मैप से फर्जी सर्वे का पुराना खेल</strong></p>
<p>यह मामला भले ही पुराना हो लेकिन इसकी आंच अब फिर से तेज हो गई है। राजधानी रायपुर और अन्य जिलों में सिंचाई का रकबा बढ़ाने के लिए करोड़ों के प्रोजेक्ट बने थे। जशपुर जिले के पत्थलगांव की मैनी नदी पर शेखरपुर और डांडपानी परियोजना के लिए करोड़ों की प्रशासकीय स्वीकृति मिली थी। योजना शुरू होने से पहले जमीन पर भौगोलिक सर्वे होना था लेकिन स्थानीय विरोध के कारण अफसर वहां पहुंच नहीं पाए। इसके बाद अफसरों ने बड़ा फर्जीवाड़ा किया। भारी भरकम प्रोजेक्ट बचाने के लिए घर बैठे गूगल मैप की मदद ली और पूरा सर्वे कागजों पर तैयार कर लिया। इसी फर्जी रिपोर्ट पर 15 करोड़ रुपये के भुगतान की नोटशीट चला दी गई। तत्कालीन मुख्य अभियंता इंद्रजीत उइके ने पहले भुगतान रोकने को कहा था लेकिन बाद में पूरी कहानी बदल गई और केंद्रीय जल आयोग के कड़े निर्देश रद्दी में डाल दिए गए। अब इसी अनदेखी की सीबीआई जांच मांगी जा रही है।</p>
<h5><strong>योर सेल्फ चेक से करोड़ों का पुराना गबन</strong></h5>
<p>विभाग का एक और पुराना और बड़ा घोटाला रामानुजगंज और बलरामपुर इलाके का है। जल संसाधन संभाग क्रमांक दो के कार्यपालन यंत्री संजय ग्रायेकर ने भू अर्जन के नाम पर आठ करोड़ 67 लाख रुपये का सीधा गबन किया। इस अफसर ने योर सेल्फ चेक काटे और पैसा व्यक्तिगत फर्मों और चहेते कर्मचारियों के खातों में डाल दिया। जिन 10 योजनाओं के नाम पर पैसा निकला उनका जमीन पर कोई काम ही नहीं हुआ था। इसके अलावा मात्र तीन महीने में स्टेशनरी के नाम पर साढ़े तीन करोड़ और मुरूम भराई के नाम पर साढ़े चार करोड़ ठिकाने लगा दिए गए। मीडिया के तीखे सवालों पर ईएनसी उइके भागते नजर आए थे। इसी खामोशी और मिलीभगत का सच उगलवाने के लिए सीबीआई जांच की मांग उठ रही है।</p>
<p> </p>
<h5><strong>नियम विरुद्ध नियुक्ति और नेताओं का संरक्षण</strong></h5>
<p> </p>
<p>ईएनसी इंद्रजीत उइके 30 जून 2025 को रिटायर हुए थे लेकिन नियमों को तोड़कर सरकार ने उन्हें उसी पद पर फिर से संविदा पर बैठा दिया। मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के इतिहास में किसी रिटायर अधिकारी को इतने बड़े पद पर बिठाने का यह पहला मामला था। संविदा अधिकारी को वित्तीय अधिकार नहीं दिए जा सकते लेकिन उइके को पूरी ताकत सौंप दी गई। सूत्र बताते हैं कि यह सब विभागीय मंत्री और बड़े नेताओं की मिलीभगत से हुआ। इसी राजनीतिक संरक्षण के कारण वरिष्ठ अभियंताओं का हक मारा गया और भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिला।</p>
<p> </p>
<h5><strong>ईएनसी इंद्रजीत उइके के वे पुराने मामले जिनकी अब सीबीआई जांच की मांग हो रही है</strong></h5>
<p> </p>
<ul style="list-style-type:square;">
<li>1 रिटायरमेंट के बाद असंवैधानिक नियुक्ति 30 जून 2025 को रिटायर होने के बाद नियमों को ताक पर रखकर दोबारा प्रमुख अभियंता के पद पर संविदा नियुक्ति हासिल करना।</li>
<li>2 संविदा पद पर वित्तीय अधिकारों का दुरुपयोग सरकारी आदेशों का उल्लंघन कर एक संविदा अधिकारी के तौर पर करोड़ों रुपये की फाइलों और वित्तीय ताकत का मनमाना इस्तेमाल।</li>
<li>3 गूगल सर्वे घोटाले में संदिग्ध चुप्पी 15 करोड़ के फर्जी गूगल सर्वे घोटाले में शुरुआत में पत्र लिखना लेकिन बाद में ठोस कार्रवाई न कर मामले को दबाना।</li>
<li>4 भू अर्जन फर्जीवाड़े में जवाबदेही से भागना 8 करोड़ 67 लाख के भू अर्जन और स्टेशनरी घोटाले में विभाग प्रमुख के तौर पर चुप्पी साधना और दोषियों को बचाना।</li>
<li>5 वरिष्ठ अधिकारियों का हक मारना राजनीतिक रसूख का फायदा उठाकर संविदा नियुक्ति पाना जिससे योग्य और वरिष्ठ इंजीनियरों का प्रमोशन रुका।</li>
<li>6 सत्ताधारी नेताओं का सीधा संरक्षण बिना शीर्ष नेताओं की मिलीभगत के इतनी बड़ी संविदा नियुक्ति और पावर मिलना संभव नहीं है जो सीधे तौर पर भ्रष्टाचार की ओर इशारा करता है।</li>
</ul>
<p>इन सभी पुराने और संगीन मामलों के सामने आने के बाद अब साफ हो गया है कि बिना सीबीआई जांच के सच्चाई सामने नहीं आएगी। लोग और नेता अब लामबंद हो रहे हैं और उनका साफ कहना है कि नेताओं का संरक्षण हटाकर दागी अफसरों पर सख्त कार्रवाई और सीबीआई जांच के बिना विभाग में जारी करोड़ों की लूट का यह काला सच कभी बेनकाब नहीं होगा।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>अपराध</category>
                                            <category>छत्तीसगढ़</category>
                                            <category>प्रशासनिक </category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 10 Apr 2026 17:36:36 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[मनीशंकर पांडेय]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>बीजेपी की नई राष्ट्रीय टीम में दिखेगा छत्तीसगढ़ का दम अध्यक्ष नितिन नवीन की लिस्ट में 9 नेताओं के नाम शामिल</title>
                                    <description><![CDATA[<p>नई दिल्ली/रायपुर।बीजेपी के नए राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन अपनी नई टीम तैयार करने में जुट गए हैं। पार्टी का रिमोट कंट्रोल अब उनके हाथ में है और वे 2029 के लोकसभा चुनाव को ध्यान में रखकर अपनी टीम बना रहे हैं। दिल्ली के सियासी गलियारों में चर्चा तेज है कि इस नई राष्ट्रीय टीम में छत्तीसगढ़ के नेताओं को बड़ी और अहम जिम्मेदारी मिल सकती है।</p>
<p>नितिन नवीन इसी साल जनवरी में बीजेपी के 16वें राष्ट्रीय अध्यक्ष बने हैं। अध्यक्ष बनने से पहले वे छत्तीसगढ़ बीजेपी के प्रभारी थे। इस वजह से वे छत्तीसगढ़ के नेताओं और यहां के संगठन</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.nationaljagatvision.com/chhattisgarh/chhattisgarhs-strength-will-be-visible-in-bjps-new-national-team/article-9097"><img src="https://www.nationaljagatvision.com/media/400/2026-04/image_search_1775793407860.jpg" alt=""></a><br /><p>नई दिल्ली/रायपुर।बीजेपी के नए राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन अपनी नई टीम तैयार करने में जुट गए हैं। पार्टी का रिमोट कंट्रोल अब उनके हाथ में है और वे 2029 के लोकसभा चुनाव को ध्यान में रखकर अपनी टीम बना रहे हैं। दिल्ली के सियासी गलियारों में चर्चा तेज है कि इस नई राष्ट्रीय टीम में छत्तीसगढ़ के नेताओं को बड़ी और अहम जिम्मेदारी मिल सकती है।</p>
<p>नितिन नवीन इसी साल जनवरी में बीजेपी के 16वें राष्ट्रीय अध्यक्ष बने हैं। अध्यक्ष बनने से पहले वे छत्तीसगढ़ बीजेपी के प्रभारी थे। इस वजह से वे छत्तीसगढ़ के नेताओं और यहां के संगठन की ताकत को बहुत अच्छी तरह से जानते हैं। छत्तीसगढ़ बीजेपी के संगठन को देश में सबसे मजबूत माना जाता है। इसी मजबूती और पुराने भरोसे के कारण नितिन नवीन अपनी नई दिल्ली वाली टीम में छत्तीसगढ़ के दिग्गजों को खास जगह दे सकते हैं।</p>
<h5><strong>युवा महिला और अनुभव का होगा तालमेल</strong></h5>
<p>पार्टी सूत्रों के मुताबिक नई टीम में युवाओं के जोश और वरिष्ठ नेताओं के अनुभव का बराबर तालमेल रखा जाएगा। इसके साथ ही महिलाओं को भी अहम पदों पर बिठाया जाएगा। पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव खत्म होने के बाद कभी भी इन नए नामों का ऐलान किया जा सकता है। वैसे भी बीजेपी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में छत्तीसगढ़ को हमेशा महत्व मिला है और हर बार दो से तीन नेताओं को जिम्मेदारी दी जाती है। लेकिन इस बार अध्यक्ष खुद नितिन नवीन हैं इसलिए यह संख्या बढ़ सकती है।</p>
<h5><strong>राष्ट्रीय टीम के लिए इन 9 संभावित नामों की है सबसे ज्यादा चर्चा</strong></h5>
<p>नितिन नवीन की टीम में शामिल होने के लिए छत्तीसगढ़ से करीब आठ से नौ नेताओं के नाम सामने आ रहे हैं। ये वे नेता हैं जो संगठन का काम जानते हैं और जातिगत समीकरणों में भी फिट बैठते हैं।</p>
<p> <strong>संतोष पांडे </strong>यह राजनांदगांव से लगातार दो बार के सांसद हैं। वे पार्टी के मुख्य प्रवक्ता और पूर्व प्रदेश महामंत्री रह चुके हैं। उन्हें संगठन चलाने का लंबा अनुभव है और वे एक कुशल रणनीतिकार माने जाते हैं।</p>
<p> <strong>नारायण चंदेल </strong>यह पार्टी का बड़ा ओबीसी चेहरा हैं। तीन बार विधायक रह चुके हैं और पूर्व नेता प्रतिपक्ष की जिम्मेदारी भी संभाल चुके हैं। उनके पास प्रदेश संगठन का अच्छा खासा अनुभव है।</p>
<p> <strong>अनुराग सिंह देव</strong>  वर्तमान में हाउसिंग बोर्ड के अध्यक्ष हैं। युवा मोर्चा के पूर्व अध्यक्ष रह चुके हैं। कांग्रेस के दिग्गज टीएस सिंह देव के खिलाफ दो बार चुनाव लड़ चुके हैं। पार्टी इनमें काफी संभावनाएं देखती है।</p>
<p> <strong>सौरभ सिंह </strong>अकलतरा के पूर्व विधायक हैं। यह एक तेजतर्रार युवा चेहरा हैं। कांग्रेस सरकार के खिलाफ मुखर रहने वाले सौरभ सिंह को नितिन नवीन का बेहद करीबी माना जाता है।</p>
<p> <strong>महेश गागड़ा </strong> यह पूर्व मंत्री और आदिवासी चेहरा हैं। राष्ट्रीय स्तर पर युवा मोर्चा के उपाध्यक्ष रह चुके हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के करीबी माने जाते हैं और संगठन के काम में माहिर हैं।</p>
<p> <strong>लता उसेंडी</strong> बस्तर से आने वाला यह एक बड़ा आदिवासी चेहरा हैं। पूर्व मंत्री रह चुकी हैं और वर्तमान में पार्टी की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं। उनके पास ओडिशा राज्य के प्रभारी की भी जिम्मेदारी है।</p>
<p> <strong>भावना बोहरा</strong> यह पार्टी का तेजतर्रार महिला चेहरा हैं और वर्तमान में विधायक हैं। सामाजिक कार्यों में इनकी पकड़ बहुत मजबूत है। छत्तीसगढ़ के बाहर दूसरे राज्यों के चुनावों में भी पार्टी इनका उपयोग कर रही है।</p>
<p> <strong>सुशांत शुक्ला </strong>यह युवा विधायक हैं और युवा मोर्चा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य रह चुके हैं। यह पार्टी का बड़ा युवा चेहरा हैं और इन्होंने नितिन नवीन के साथ काफी काम किया है।</p>
<p> <strong>डॉ कृष्णमूर्ति बांधी </strong>यह पूर्व स्वास्थ्य मंत्री हैं और पार्टी का बड़ा अनुसूचित जाति चेहरा हैं।</p>
<h5><strong>मंत्रियों को मिली जगह तो राज्य में होगा फेरबदल</strong></h5>
<p>चर्चा केवल विधायकों या पूर्व विधायकों तक सीमित नहीं है। राज्य सरकार के कुछ ऐसे मंत्री भी हैं जिनका कामकाज बहुत अच्छा रहा है। पूरी संभावना है कि नितिन नवीन अपने पुराने अनुभव को देखते हुए कुछ मंत्रियों को भी दिल्ली बुलाकर अपनी टीम में शामिल कर लें। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि अगर ऐसा होता है तो छत्तीसगढ़ में मुख्यमंत्री अपने मंत्रिमंडल में फेरबदल करेंगे और कुछ नए चेहरों को मंत्री बनने का मौका मिलेगा।</p>
<h5><strong>हाईकमान करेगा फैसला</strong></h5>
<p>इस पूरी सियासी चर्चा पर राजनांदगांव सांसद संतोष पांडे का कहना है कि भारतीय जनता पार्टी के काम करने का अपना एक तरीका है। राष्ट्रीय स्तर पर पदाधिकारियों को चुनने का काम पार्टी हाईकमान और शीर्ष नेतृत्व का होता है और वही टीम तय करेगी कि किसे क्या जिम्मेदारी देनी है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>छत्तीसगढ़</category>
                                            <category>राजनीति</category>
                                            <category>प्रशासनिक </category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 10 Apr 2026 09:27:26 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[मनीशंकर पांडेय]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>बिलासपुर में निजी अस्पतालों की मनमानी पर रोक अब मरीजों को उसी फार्मेसी से दवा लेना जरूरी नहीं</title>
                                    <description><![CDATA[<p>बिलासपुर शहर के निजी अस्पतालों और नर्सिंग होम में अब मरीजों को अपनी ही फार्मेसी से दवा खरीदने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकेगा। शासन ने ड्रग विभाग के जरिए एक नया और कड़ा नियम लागू किया है। इसके तहत हर अस्पताल की फार्मेसी के काउंटर पर एक बड़ा नोटिस लगाना जरूरी हो गया है। इस नोटिस में साफ शब्दों में लिखा होना चाहिए कि मरीज हमारी फार्मेसी से दवा लेने के लिए बाध्य नहीं हैं। वे अपनी मर्जी से बाहर किसी भी दुकान से दवा खरीद सकते हैं। यह खबर उन सभी मरीजों के लिए बड़ी राहत है</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.nationaljagatvision.com/chhattisgarh/stopping-the-arbitrariness-of-private-hospitals-in-bilaspur-now-it/article-9096"><img src="https://www.nationaljagatvision.com/media/400/2026-04/20260410_090312.jpg" alt=""></a><br /><p>बिलासपुर शहर के निजी अस्पतालों और नर्सिंग होम में अब मरीजों को अपनी ही फार्मेसी से दवा खरीदने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकेगा। शासन ने ड्रग विभाग के जरिए एक नया और कड़ा नियम लागू किया है। इसके तहत हर अस्पताल की फार्मेसी के काउंटर पर एक बड़ा नोटिस लगाना जरूरी हो गया है। इस नोटिस में साफ शब्दों में लिखा होना चाहिए कि मरीज हमारी फार्मेसी से दवा लेने के लिए बाध्य नहीं हैं। वे अपनी मर्जी से बाहर किसी भी दुकान से दवा खरीद सकते हैं। यह खबर उन सभी मरीजों के लिए बड़ी राहत है जो निजी अस्पतालों के महंगे बिल से परेशान रहते हैं।</p>
<p>प्रशासन ने नियम तो बना दिया है लेकिन मरीजों और उनके परिजनों की असली परेशानी कुछ और ही बनी हुई है। डॉक्टर जो दवाएं पर्ची पर लिखते हैं वह अक्सर बाहर के आम मेडिकल स्टोर पर मिलती ही नहीं हैं। वे दवाएं केवल उसी अस्पताल की फार्मेसी में उपलब्ध होती हैं। इससे मरीज चाहकर भी बाहर से दवा नहीं खरीद पाते हैं और उन्हें मजबूर होकर उसी अस्पताल से ही दवा लेनी पड़ती है। बिलासपुर जिले में लगभग 150 से ज्यादा नर्सिंग होम और अस्पताल हैं जहां उनकी खुद की फार्मेसी चल रही है।</p>
<p>ड्रग विभाग के साफ निर्देशों के बाद भी अस्पतालों ने इस नियम को बिल्कुल गंभीरता से नहीं लिया है। जमीनी हकीकत यह है कि शहर के 95 प्रतिशत अस्पतालों की फार्मेसी पर यह जरूरी नोटिस अब तक नहीं लगाया गया है। इस भारी लापरवाही को देखते हुए ड्रग विभाग की टीम अब एक्शन में आ गई है और सीधे अस्पतालों में जाकर दबिश दे रही है। टीम के सदस्य खुद अपनी निगरानी में फार्मेसी काउंटर पर जाकर मरीजों के अधिकार वाला नोटिस चिपका रहे हैं। इसके साथ ही अस्पताल संचालकों को सख्त चेतावनी भी दी जा रही है कि वे मरीजों पर अपनी ही दुकान से दवा खरीदने का किसी भी तरह का दबाव न बनाएं वरना कड़ी कार्रवाई की जाएगी।</p>
<p>अस्पतालों की फार्मेसी से दवा लेना मरीजों की जेब पर बहुत भारी पड़ रहा है। आमतौर पर बाहर के मेडिकल स्टोर पर मरीजों को दवाओं की कुल कीमत पर 5 से 15 प्रतिशत तक की छूट बड़ी आसानी से मिल जाती है। वहीं दूसरी तरफ अस्पताल के अंदर बनी फार्मेसी में कोई छूट नहीं दी जाती है। यहां मरीजों को दवा के पैकेट पर छपे पूरे दाम पर ही दवाइयां खरीदनी पड़ती हैं। लंबी चलने वाली बीमारियों और गंभीर इलाज के दौरान यह छूट बहुत मायने रखती है। अस्पताल में छूट न मिलने से मरीजों पर बहुत बड़ा आर्थिक बोझ पड़ता है और उनका बजट बिगड़ जाता है।</p>
<p>स्वास्थ्य विभाग और प्रशासन का कहना है कि मरीजों को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक होना बहुत जरूरी है। अस्पताल प्रबंधन अपनी फार्मेसी से दवा लेने के लिए मरीजों को किसी भी सूरत में मजबूर नहीं कर सकता है। औषधि प्रशासन के एडीसी भीष्म देव सिंह ने यह बात बिल्कुल साफ कर दी है कि कोई भी मरीज या उसका परिजन अस्पताल की फार्मेसी से ही दवा लेने के लिए मजबूर नहीं है। वे जहां से चाहें वहां से अपनी जरूरत की दवा खरीद सकते हैं। यह जानकारी देने वाला नोटिस हर अस्पताल की फार्मेसी में लगाना बिल्कुल अनिवार्य कर दिया गया है। डॉक्टरों को भी यह निर्देश दिए गए हैं कि वे पर्ची पर ऐसी दवाएं ही लिखें जो बाजार में हर जगह आसानी से उपलब्ध हों।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>बिलासपुर</category>
                                            <category>छत्तीसगढ़</category>
                                            <category>प्रशासनिक </category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 10 Apr 2026 09:03:35 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[मनीशंकर पांडेय]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>मार्कफेड में 18 करोड़ का तिरपाल घोटाला 18500 का टेंडर पर गुपचुप खरीद लिए 33 हजार नग</title>
                                    <description><![CDATA[<p>रायपुर। छत्तीसगढ़ मार्कफेड में तिरपाल खरीदी के नाम पर बड़ा खेल हो गया है। धान को बारिश से बचाने के लिए 18500 तिरपाल खरीदने का टेंडर निकला था। लेकिन अफसरों ने अपनी गजब की दरियादिली दिखाते हुए गुपचुप तरीके से 33 हजार तिरपाल खरीद डाले। मतलब तय मात्रा से 14517 नग ज्यादा खरीदे गए। यह पूरी खरीदी जीएसटी समेत 12685 रुपए प्रति नग के हिसाब से हुई। इस सौदे में सीधे तौर पर 18 करोड़ रुपए से ज्यादा का हेरफेर हुआ है।</p>
<p>अधिकारियों की इस मेहरबानी का नतीजा यह है कि दो करोड़ रुपए से ज्यादा के 1630 तिरपाल बिना</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.nationaljagatvision.com/crime/tarpaulin-scam-of-rs-18-crore-in-markfed-33-thousand/article-9094"><img src="https://www.nationaljagatvision.com/media/400/2026-04/20260410_065148.jpg" alt=""></a><br /><p>रायपुर। छत्तीसगढ़ मार्कफेड में तिरपाल खरीदी के नाम पर बड़ा खेल हो गया है। धान को बारिश से बचाने के लिए 18500 तिरपाल खरीदने का टेंडर निकला था। लेकिन अफसरों ने अपनी गजब की दरियादिली दिखाते हुए गुपचुप तरीके से 33 हजार तिरपाल खरीद डाले। मतलब तय मात्रा से 14517 नग ज्यादा खरीदे गए। यह पूरी खरीदी जीएसटी समेत 12685 रुपए प्रति नग के हिसाब से हुई। इस सौदे में सीधे तौर पर 18 करोड़ रुपए से ज्यादा का हेरफेर हुआ है।</p>
<p>अधिकारियों की इस मेहरबानी का नतीजा यह है कि दो करोड़ रुपए से ज्यादा के 1630 तिरपाल बिना इस्तेमाल के ही पड़े हैं। रायपुर बिलासपुर महासमुंद रायगढ़ और गौरेला पेंड्रा मरवाही जैसे जिलों में ये महंगे तिरपाल धूल फांक रहे हैं। दूसरी तरफ जमीनी हकीकत बिल्कुल अलग है। राजनांदगांव के घोटिया और दुर्ग के कई धान खरीदी केंद्रों में धान आधा ढंका और आधा खुला पड़ा है। कहीं फटे तिरपाल से धान को ढंका गया है। कई समितियों को तो मजबूरी में खुद के पैसे से तिरपाल खरीदने पड़ गए। मतलब जहां जरूरत है वहां तिरपाल नहीं हैं और जहां जरूरत नहीं है वहां करोड़ों का माल डंप पड़ा है।</p>
<p>इस घोटाले में टेंडर के नियम भी बड़े शानदार तरीके से सेट किए गए हैं। जिन कंपनियों पर भारतीय खाद्य निगम पहले ही कार्रवाई कर चुका है उन्हें ही बार बार काम दिया जा रहा है। टेंडर प्रक्रिया में गिने चुने नाम ही आते हैं। ये फर्में आपस में मिलकर कार्टल बनाती हैं। टेंडर खुलने पर जो कंपनी पहले दूसरे या तीसरे नंबर पर आती है सभी को आपस में काम बांट दिया जाता है। नई टेंडर प्रक्रिया में टंडन बैग पॉली और क्लाइमेक्स को सप्लाई का काम मिला है। ताज्जुब की बात यह है कि यही कंपनियां हरियाणा और पश्चिम बंगाल में 9 हजार से 10 हजार रुपए के सस्ते दाम पर तिरपाल बेचती हैं लेकिन छत्तीसगढ़ में 12 हजार से ज्यादा का मोटा रेट वसूलती हैं।</p>
<p>इस पूरे मामले में मार्कफेड के एमडी जितेंद्र शुक्ला का रवैया भी बड़ा दिलचस्प है। उनका कहना है कि उनकी इसमें कोई रुचि नहीं है और जो फर्में टेंडर में आएंगी उन्हें ही तो काम देंगे। दूसरी ओर मार्कफेड के चेयरमैन शशिकांत द्विवेदी ने इस पूरी गड़बड़ी और नई खरीदी में मिली शिकायतों को संज्ञान में लिया है। उन्होंने विभाग प्रमुख को नोटशीट लिखकर मामले की जांच और दोषियों पर कार्रवाई के निर्देश दिए हैं। अब देखना है कि 18 करोड़ के इस खेल में जांच कहां तक पहुंचती</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>अपराध</category>
                                            <category>छत्तीसगढ़</category>
                                            <category>प्रशासनिक </category>
                                    

                <link>https://www.nationaljagatvision.com/crime/tarpaulin-scam-of-rs-18-crore-in-markfed-33-thousand/article-9094</link>
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                <pubDate>Fri, 10 Apr 2026 06:52:11 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[मनीशंकर पांडेय]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>3200 करोड़ का शराब घोटाला ईओडब्ल्यू ने पेश किया 9वां चालान सौम्या चौरसिया समेत तीन पर कसा शिकंजा</title>
                                    <description><![CDATA[<p>रायपुर। छत्तीसगढ़ के बहुचर्चित शराब घोटाले में जांच एजेंसी ईओडब्ल्यू ने एक और बड़ा धमाका किया है। ईओडब्ल्यू ने स्पेशल कोर्ट में 1500 पन्नों का 9वां पूरक चालान पेश कर दिया है। इस बार पूर्व मुख्यमंत्री की उप सचिव रहीं सौम्या चौरसिया केके श्रीवास्तव और देवेन्द्र डडसेना को मुख्य रूप से घेरा गया है। इस महाघोटाले में अब तक कुल 51 आरोपियों के खिलाफ चार्जशीट कोर्ट में दाखिल हो चुकी है। इससे साफ पता चलता है कि भ्रष्टाचार का यह नेटवर्क कितना बड़ा और शातिर था।</p>
<h5><strong>सौम्या चौरसिया पर सिस्टम को हैक करने का आरोप</strong></h5>
<p>जांच एजेंसी ने साफ कहा</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.nationaljagatvision.com/crime/liquor-scam-worth-rs-3200-crore-eow-presented-9th-challan/article-9088"><img src="https://www.nationaljagatvision.com/media/400/2026-04/image_search_1775730656006.jpg" alt=""></a><br /><p>रायपुर। छत्तीसगढ़ के बहुचर्चित शराब घोटाले में जांच एजेंसी ईओडब्ल्यू ने एक और बड़ा धमाका किया है। ईओडब्ल्यू ने स्पेशल कोर्ट में 1500 पन्नों का 9वां पूरक चालान पेश कर दिया है। इस बार पूर्व मुख्यमंत्री की उप सचिव रहीं सौम्या चौरसिया केके श्रीवास्तव और देवेन्द्र डडसेना को मुख्य रूप से घेरा गया है। इस महाघोटाले में अब तक कुल 51 आरोपियों के खिलाफ चार्जशीट कोर्ट में दाखिल हो चुकी है। इससे साफ पता चलता है कि भ्रष्टाचार का यह नेटवर्क कितना बड़ा और शातिर था।</p>
<h5><strong>सौम्या चौरसिया पर सिस्टम को हैक करने का आरोप</strong></h5>
<p>जांच एजेंसी ने साफ कहा है कि सौम्या चौरसिया ने अपने बड़े पद का जमकर गलत इस्तेमाल किया। उन्होंने शराब माफिया के पूरे सिंडिकेट को सरकारी संरक्षण दिया। प्रशासनिक स्तर पर हर संभव मदद की। ईओडब्ल्यू को उनके खिलाफ पक्के सबूत मिले हैं। वहीं केके श्रीवास्तव पर काली कमाई को ठिकाने लगाने का जिम्मा था। उसने अवैध कैश का लेन देन किया। पैसे को इधर से उधर पहुंचाने और खपाने में उसका सबसे बड़ा रोल था।</p>
<h5><strong>राजीव भवन से जुड़े शख्स का नाम भी शामिल</strong></h5>
<p>तीसरा बड़ा नाम देवेन्द्र डडसेना का है। यह शख्स सीधे तौर पर राजीव भवन से जुड़ा रहा है। एजेंसी का दावा है कि डडसेना का काम अवैध वसूली का पैसा लेना और उसे सुरक्षित रखना था। ऊपर से जैसे निर्देश मिलते थे वह उस पैसे को आगे पहुंचा देता था। उसने इस पूरे काले खेल में एक सक्रिय मोहरे की तरह काम किया।</p>
<h5><strong>ऐसे काम करता था घोटाले का पूरा सिस्टम</strong></h5>
<p>प्रवर्तन निदेशालय यानी ईडी ने अपनी एफआईआर में इस घोटाले को 3200 करोड़ रुपए से ज्यादा का बताया था। ईओडब्ल्यू की जांच में पता चला है कि यह कोई आम चोरी नहीं थी। इसे बहुत ही शातिराना तरीके से तीन हिस्सों में बांटा गया था। पहला तरीका कमीशन का था। डिस्टलरी चलाने वालों से शराब की हर पेटी पर मोटा कमीशन वसूला जाता था। इसके लिए पूरा रेट कार्ड तय था। जो पैसा नहीं देता था उसकी शराब राज्य में नहीं बिकती थी।</p>
<h5><strong>नकली होलोग्राम से सरकारी दुकानों में बिकी शराब</strong></h5>
<p>दूसरा तरीका और भी ज्यादा खतरनाक था। सिंडिकेट ने सरकारी सिस्टम को ही अपनी जागीर बना लिया था। बिना कागजी एंट्री के शराब फैक्ट्रियों में अतिरिक्त शराब बनाई गई। उन बोतलों पर नकली होलोग्राम चिपकाए गए। फिर इन्हें सीधे सरकारी दुकानों से बेचकर सारा कैश अपनी जेब में डाल लिया गया। इस शराब का सरकारी खजाने में एक रुपया भी नहीं गया।</p>
<p>तीसरा तरीका सप्लाई जोन बदलने का था। मनमाफिक सप्लाई जोन देकर शराब कंपनियों से करोड़ों की उगाही की गई। कई जिलों में तो शराब बिक्री का कोई रिकॉर्ड ही नहीं रखा गया। सरकारी दुकानों को साफ निर्देश था कि रजिस्टर में एंट्री नहीं करनी है। जांच में ऐसी लाखों पेटी शराब चोरी छिपे बिकने के पक्के सबूत मिले हैं।</p>
<h5><strong>आगे और गिरेंगी गाज</strong></h5>
<p>ईओडब्ल्यू ने साफ कर दिया है कि खेल अभी खत्म नहीं हुआ है। कई और बड़े अफसर नेता और कंपनियां जांच के रडार पर हैं। उनके खिलाफ तेजी से सबूत जुटाए जा रहे हैं। जल्द ही कोर्ट में कुछ और चालान पेश किए जाएंगे। यह छत्तीसगढ़ के इतिहास का सबसे बड़ा आर्थिक अपराध है। भ्रष्टाचारियों ने नियम कानून को ताक पर रखकर जनता की गाढ़ी कमाई को लूटा है। जांच एजेंसियां अब इस पूरे काले नेटवर्क की एक एक कड़ी जोड़कर असली चेहरों को बेनकाब करने में पूरी ताकत से जुटी हैं। आने वाले दिनों में कई और सफेदपोश इस जाल में फंस सकते हैं।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>अपराध</category>
                                            <category>छत्तीसगढ़</category>
                                            <category>प्रशासनिक </category>
                                    

                <link>https://www.nationaljagatvision.com/crime/liquor-scam-worth-rs-3200-crore-eow-presented-9th-challan/article-9088</link>
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                <pubDate>Thu, 09 Apr 2026 16:01:19 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[मनीशंकर पांडेय]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>छत्तीसगढ़ में पूर्णकालिक डीजीपी की नियुक्ति में हैवीवेट मंत्री का अड़ंगा करोड़ों की डील की आशंका</title>
                                    <description><![CDATA[<p>रायपुर।छत्तीसगढ़ पुलिस महकमे में इन दिनों एक अजीब खेल चल रहा है। प्रदेश को अब तक अपना पूर्णकालिक डीजीपी नहीं मिल पाया है। सर्वोच्च अदालत सुप्रीम कोर्ट और यूपीएससी दोनों राज्य सरकार को कड़ी फटकार लगा चुके हैं। जवाब देने की मियाद खत्म हो चुकी है। फिर भी मंत्रालय से फाइल आगे नहीं बढ़ रही है। इसका कारण कोई कानूनी अड़चन नहीं है। बल्कि एक हैवीवेट भगवाधारी मंत्री का वीटो है। सत्ता के गलियारों में चर्चा बड़ी गर्म है। कहा जा रहा है कि पुलिस विभाग की इस सबसे बड़ी कुर्सी के लिए करोड़ों की डील हुई है। मामला इतना</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.nationaljagatvision.com/chhattisgarh/heavyweight-ministers-obstruction-in-appointment-of-full-time-dgp-in-chhattisgarh/article-9081"><img src="https://www.nationaljagatvision.com/media/400/2026-04/20260409_134604.jpg" alt=""></a><br /><p>रायपुर।छत्तीसगढ़ पुलिस महकमे में इन दिनों एक अजीब खेल चल रहा है। प्रदेश को अब तक अपना पूर्णकालिक डीजीपी नहीं मिल पाया है। सर्वोच्च अदालत सुप्रीम कोर्ट और यूपीएससी दोनों राज्य सरकार को कड़ी फटकार लगा चुके हैं। जवाब देने की मियाद खत्म हो चुकी है। फिर भी मंत्रालय से फाइल आगे नहीं बढ़ रही है। इसका कारण कोई कानूनी अड़चन नहीं है। बल्कि एक हैवीवेट भगवाधारी मंत्री का वीटो है। सत्ता के गलियारों में चर्चा बड़ी गर्म है। कहा जा रहा है कि पुलिस विभाग की इस सबसे बड़ी कुर्सी के लिए करोड़ों की डील हुई है। मामला इतना ज्यादा उलझ गया है कि सरकार को समझ ही नहीं आ रहा है। वह इस हैवीवेट मंत्री की जिद पूरी करे या फिर सीधे सुप्रीम कोर्ट की अवमानना का सामना करे।</p>
<p>यूपीएससी ने पिछले साल 13 मई 2025 को पैनल राज्य सरकार को भेज दिया था। इस पैनल में दो सीनियर आईपीएस अफसरों के नाम शामिल हैं। इनमें 1992 बैच के अरुण देव गौतम और 1994 बैच के हिमांशु गुप्ता का नाम है। आम तौर पर पैनल में तीन नाम होते हैं। लेकिन विकल्प कम होने से केवल दो ही नाम भेजे गए। पूर्व डीजीपी अशोक जुनेजा के रिटायर होने के बाद अरुण देव गौतम प्रभारी डीजीपी के तौर पर काम कर रहे हैं। नियम कहता है कि राज्य में प्रभारी डीजीपी नहीं होना चाहिए। इसी नियम के तहत अरुण देव गौतम का नाम पूर्णकालिक डीजीपी के लिए तय माना जा रहा था। पांच अप्रैल को रविवार की छुट्टी के दिन भी मंत्रालय में अधिकारी बैठे थे। एक बड़ा आदेश निकलने वाला था। लेकिन शाम होते होते चकरी ऐसी घूमी कि मामला ठंडे बस्ते में चला गया।</p>
<p> </p>
<p>सूत्रों की मानें तो छत्तीसगढ़ के एक बहुत ही कद्दावर मंत्री अरुण देव गौतम को इस पद पर नहीं देखना चाहते। वे हिमांशु गुप्ता को डीजीपी की कुर्सी पर बिठाना चाहते हैं। मंत्री जी की इस जिद के आगे पूरा सिस्टम बेबस नजर आ रहा है। राजनीतिक हलकों में चर्चा जोरों पर है कि पर्दे के पीछे करोड़ों का लंबा लेनदेन हो चुका है। शायद यही असल वजह है जिसके कारण अरुण देव गौतम का नाम फाइनल होते होते अचानक अटक गया। अब सिस्टम एक बड़े धर्मसंकट में फंसा है। एक तरफ वह अफसर है जिसने मैदान में नक्सलियों से सीधा लोहा लिया। दूसरी तरफ वह कद्दावर मंत्री हैं जिनकी नाराजगी सत्ता के लिए भारी पड़ सकती है। छत्तीसगढ़ शायद देश का पहला ऐसा राज्य बनेगा जहां यूपीएससी का पैनल आने के बाद भी सिर्फ एक मंत्री की जिद के कारण पुलिस मुखिया की नियुक्ति नहीं हो पा रही है।</p>
<p>इस पूरी देरी पर सुप्रीम कोर्ट का रुख बहुत ही सख्त है। साल 2006 का प्रकाश सिंह मामला राज्य डीजीपी नियुक्तियों के लिए सबसे बड़ा नियम है। कोर्ट का साफ आदेश है कि राज्य सरकारें यूपीएससी के भेजे गए वरिष्ठ अफसरों में से ही अपना डीजीपी चुनें। अभी हाल ही में 5 फरवरी 2026 को एक मामले में सुनवाई हुई। कोर्ट ने बेहद कड़ा रुख अपनाते हुए कहा कि नियुक्ति में देरी हुई तो जिम्मेदार अफसरों की जवाबदेही तय की जाएगी। यूपीएससी ने भी राज्य के मुख्य सचिव को एक बहुत ही कड़ा पत्र लिखा है। इसमें सुप्रीम कोर्ट की दो हफ्ते की मियाद का जिक्र है। पर लगता है हमारी व्यवस्था को सर्वोच्च अदालत के आदेशों से ज्यादा फिक्र अपने राजनीतिक आकाओं को खुश रखने की है।</p>
<p>रेस में सबसे आगे चल रहे अरुण देव गौतम का करियर शानदार रहा है। कानपुर के रहने वाले अरुण देव जेएनयू से एमफिल करने के बाद 1992 में आईपीएस बने। वे छत्तीसगढ़ के कई चुनौती वाले जिलों के एसपी रहे हैं। साल 2009 में राजनांदगांव में बड़े नक्सली हमले के बाद उन्हें वहां का एसपी बनाकर भेजा गया। इसके बाद 25 मई 2013 को झीरम घाटी का भीषण नक्सली कांड हुआ। तब भी संकट के समय सरकार ने अरुण देव गौतम को ही बस्तर का आईजी बना कर भेजा था। उन्होंने वहां हालात संभाले और चुनाव शांतिपूर्ण तरीके से संपन्न करवाए। उनका पलड़ा हर लिहाज से भारी है। फिर भी सिस्टम के तराजू में मंत्री जी का वजन एक अफसर के शौर्य से ज्यादा भारी साबित हो रहा है।</p>
<p>अब इस पूरे मामले पर सबकी निगाहें मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय पर टिकी हैं। मुख्यमंत्री फिलहाल दो दिन के दिल्ली दौरे पर हैं। दिल्ली से उनके लौटने के बाद ही अब कोई अंतिम फैसला लिया जाएगा। जानकारों का स्पष्ट कहना है कि सरकार को बिना देरी किए फैसला लेना चाहिए। पैनल में सिर्फ दो ही नाम हैं। सरकार को जिस किसी को भी डीजीपी बनाना हो उसे तुरंत निर्णय लेकर फाइल पर मुहर लगा देनी चाहिए। इस तरह के लंबे अनिर्णय और सियासी सौदेबाजी से पुलिस फोर्स के जवानों के बीच बिल्कुल भी अच्छा संदेश नहीं जाता है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>छत्तीसगढ़</category>
                                            <category>राजनीति</category>
                                            <category>प्रशासनिक </category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 09 Apr 2026 13:46:54 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[मनीशंकर पांडेय]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>यौन शोषण में निलंबित आईपीएस रतनलाल डांगी कश्मीर में लगा रहे ठुमके वीडियो हुआ वायरल...</title>
                                    <description><![CDATA[<p>रायपुर। छत्तीसगढ़ में यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों में निलंबित किए गए सीनियर आईपीएस अधिकारी रतनलाल डांगी इन दिनों कश्मीर की वादियों में मजे से छुट्टियां मना रहे हैं। नियम के मुताबिक निलंबन के दौरान उन्हें बिना इजाजत पुलिस मुख्यालय नया रायपुर किसी भी हाल में नहीं छोड़ना था लेकिन सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे एक नए वीडियो ने सारे सरकारी आदेशों की पोल खोल कर रख दी है। इस वीडियो में आईपीएस डांगी कश्मीर की वादियों में बेफिक्र होकर घूमते और एक फिल्मी गाने पर झूमते नजर आ रहे हैं। इस वीडियो के सामने आने के बाद अब</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.nationaljagatvision.com/crime/ips-ratanlal-dangi-suspended-for-sexual-exploitation-dancing-in-kashmir/article-9073"><img src="https://www.nationaljagatvision.com/media/400/2026-04/20260409_092229.jpg" alt=""></a><br /><p>रायपुर। छत्तीसगढ़ में यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों में निलंबित किए गए सीनियर आईपीएस अधिकारी रतनलाल डांगी इन दिनों कश्मीर की वादियों में मजे से छुट्टियां मना रहे हैं। नियम के मुताबिक निलंबन के दौरान उन्हें बिना इजाजत पुलिस मुख्यालय नया रायपुर किसी भी हाल में नहीं छोड़ना था लेकिन सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे एक नए वीडियो ने सारे सरकारी आदेशों की पोल खोल कर रख दी है। इस वीडियो में आईपीएस डांगी कश्मीर की वादियों में बेफिक्र होकर घूमते और एक फिल्मी गाने पर झूमते नजर आ रहे हैं। इस वीडियो के सामने आने के बाद अब सरकार और सिस्टम पर बड़े और गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं कि आखिर एक दागी अफसर को इतनी भारी छूट किसने दी है।</p>
<p><strong style="font-family:'Noto Sans Devanagari', sans;font-size:1.25rem;">सरकारी आदेशों की खुलेआम उड़ी धज्जियां</strong></p>
<p>अभी कुछ ही दिन पहले राज्य शासन के गृह पुलिस विभाग ने कड़ा कदम उठाते हुए डांगी को तत्काल प्रभाव से निलंबित किया था। उस निलंबन आदेश में यह बात बिल्कुल साफ शब्दों में लिखी गई थी कि इस पूरी अवधि के दौरान उनका मुख्यालय नया रायपुर रहेगा और सक्षम अधिकारी की पूर्व अनुमति के बिना वह अपना मुख्यालय बिल्कुल नहीं छोड़ सकेंगे। अब उनका यह कश्मीर का वीडियो वायरल होने के बाद हर तरफ यह सवाल उठ रहा है कि क्या सुशासन का दावा करने वाली प्रदेश सरकार ने उन्हें कश्मीर घूमने की विशेष अनुमति दी है या फिर वह सरकारी आदेशों को खुलेआम ठेंगा दिखाते हुए खुद ही सैर सपाटे पर निकल गए हैं। निलंबित होने के बाद भी उनके चेहरे पर कोई शिकन नहीं दिख रही है बल्कि वह गाने गाते हुए इन्जॉय कर रहे हैं।</p>
<p><strong style="font-family:'Noto Sans Devanagari', sans;font-size:1.25rem;">जानिए क्या था पूरा मामला जिसने मचाई थी खलबली</strong></p>
<p>रतनलाल डांगी 2003 बैच के एक रसूखदार आईपीएस अधिकारी हैं। पुलिस विभाग में उनकी गिनती काफी तेज तर्रार अधिकारियों में होती रही है और वह कई जिलों के एसपी भी रह चुके हैं। कुछ समय पहले पुलिस विभाग के ही एक सब इंस्पेक्टर की पत्नी ने डांगी पर यौन उत्पीड़न के बेहद गंभीर आरोप लगाए थे। पीड़ित महिला का सीधा आरोप था कि डांगी ने साल 2017 से 2024 तक उसका लगातार शारीरिक और मानसिक शोषण किया। महिला ने यह भी बताया था कि उसके पति की पोस्टिंग के नाम पर उस पर लगातार दबाव डाला गया। इस मामले से जुड़ी कुछ बेहद आपत्तिजनक तस्वीरें सोशल मीडिया पर खूब वायरल हुई थीं। इसके बाद सरकार पर चौतरफा दबाव बढ़ा और आनन फानन में कार्रवाई की गई। पहले उन्हें आईजी के पद से हटाया गया और फिर सस्पेंड कर दिया गया। गृह विभाग ने तब माना था कि उनका आचरण पद के अनुरूप बिल्कुल नहीं है और इससे पुलिस विभाग की छवि को भारी नुकसान पहुंचा है।</p>
<p> </p>
<h5><strong>क्लीन चिट की चर्चा और दोहरे रवैये पर उठते सवाल</strong></h5>
<p> </p>
<p>इस बीच पुलिस महकमे से एक और चौंकाने वाली जानकारी छनकर सामने आ रही है कि विभाग इस गंभीर मामले में डांगी को क्लीन चिट देने की पूरी तैयारी में है। अगर सच में ऐसा होता है तो यह अपने आप में एक बहुत बड़ा सवाल है। इतने सारे साक्ष्य सबूतों और एक महिला के खुले आरोपों के बावजूद एक आईपीएस को कैसे और क्यों बचाया जा रहा है। सिस्टम के इस दोहरे रवैये का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि कुछ समय पहले एक हिस्ट्रीशीटर बदमाश के आरोप लगाने मात्र से एक महिला डीएसपी को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया गया था। लेकिन जब बात एक रसूखदार सीनियर आईपीएस अधिकारी की आती है तो सारे नियम कायदे मानो अपनी सुविधा के हिसाब से बदल जाते हैं।</p>
<p> </p>
<h5><strong>आखिर कौन है मददगार</strong></h5>
<p> </p>
<p>वायरल वीडियो और क्लीन चिट की सुगबुगाहट के बाद अब पुलिस महकमे से लेकर राजनीतिक गलियारों में बस एक ही सवाल गूंज रहा है कि आखिर आईपीएस डांगी की परदे के पीछे से मदद कौन कर रहा है। सस्पेंशन के बावजूद कश्मीर में फिल्मी गाने पर डांस करना यह साफ बताता है कि उन्हें किसी तरह की विभागीय कार्रवाई या सरकार का कोई डर नहीं है। अब पूरी जनता की नजर इस बात पर टिकी है कि इस वायरल वीडियो के सामने आने के बाद गृह विभाग कोई कड़ा नोटिस जारी करता है या फिर सुशासन के नाम पर यह सब कुछ यूं ही चलता रहेगा।</p>
<p> </p>
<p></p><video style="width:100%;height:auto;" src="https://www.nationaljagatvision.com/media/2026-04/vid-20260408-wa0095.mp4" controls=""></video>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>अपराध</category>
                                            <category>छत्तीसगढ़</category>
                                            <category>प्रशासनिक </category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 09 Apr 2026 09:26:08 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[मनीशंकर पांडेय]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>रायपुर के एनएच एमएमआई अस्पताल में बड़ी लूट आयुष्मान कार्ड होने पर भी मरीजों की जेब काट रहा प्रबंधन</title>
                                    <description><![CDATA[<p>रायपुर। केंद्र सरकार की आयुष्मान भारत योजना को रायपुर के निजी अस्पताल पलीता लगा रहे हैं। शहर के मशहूर एनएच एमएमआई अस्पताल में मरीजों के साथ सरेआम लूट मची है। मरीजों के पास आयुष्मान कार्ड होने के बावजूद प्रबंधन इलाज के नाम पर उनसे मोटी रकम वसूल रहा है। मजबूरी में तीमारदारों को अपनी जेब ढीली करनी पड़ रही है। लोग अपनों की जान बचाने के लिए कर्ज ले रहे हैं। स्वास्थ्य विभाग को लगातार शिकायतें मिल रही हैं। लोग हेल्पलाइन नंबर 104 पर फोन कर रहे हैं। अधिकारी भी चिट्ठियां लिख रहे हैं लेकिन अस्पताल प्रबंधन पर कोई असर</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.nationaljagatvision.com/crime/big-loot-in-nh-mmi-hospital-of-raipur-management-picking/article-9053"><img src="https://www.nationaljagatvision.com/media/400/2026-04/20260408_081826.jpg" alt=""></a><br /><p>रायपुर। केंद्र सरकार की आयुष्मान भारत योजना को रायपुर के निजी अस्पताल पलीता लगा रहे हैं। शहर के मशहूर एनएच एमएमआई अस्पताल में मरीजों के साथ सरेआम लूट मची है। मरीजों के पास आयुष्मान कार्ड होने के बावजूद प्रबंधन इलाज के नाम पर उनसे मोटी रकम वसूल रहा है। मजबूरी में तीमारदारों को अपनी जेब ढीली करनी पड़ रही है। लोग अपनों की जान बचाने के लिए कर्ज ले रहे हैं। स्वास्थ्य विभाग को लगातार शिकायतें मिल रही हैं। लोग हेल्पलाइन नंबर 104 पर फोन कर रहे हैं। अधिकारी भी चिट्ठियां लिख रहे हैं लेकिन अस्पताल प्रबंधन पर कोई असर नहीं हो रहा है। भास्कर को कई मरीजों ने अपनी दर्दभरी कहानी बताई है जिससे साफ होता है कि यहां इलाज के नाम पर कैसा गोरखधंधा चल रहा है।</p>
<p>स्वास्थ्य विभाग की कार्रवाई अब तक सिर्फ कागजों तक सीमित है। मिली जानकारी के मुताबिक अस्पताल के खिलाफ पांच बड़ी शिकायतों पर कारण बताओ नोटिस जारी किया गया है। इन मामलों की जांच अभी चल रही है। पिछले तीन सालों में इस अस्पताल के खिलाफ दस से ज्यादा शिकायतें आ चुकी हैं। इसके बावजूद विभागीय अफसर कोई ठोस कदम नहीं उठा पाए हैं। अधिकारी सिर्फ नोटिस थमाकर अपनी जिम्मेदारी पूरी कर रहे हैं। रसूखदार अस्पताल पर हाथ डालने से अधिकारी बच रहे हैं और इसका सीधा नुकसान गरीब और लाचार मरीजों को हो रहा है।</p>
<p>अस्पताल की मनमानी समझने के लिए राजनांदगांव के रमेश परहाते का मामला काफी है। रमेश को फरवरी 2024 में हार्ट अटैक आया था। घबराए परिजनों ने उन्हें रायपुर के इसी अस्पताल में भर्ती कराया। रमेश यहां 14 दिन तक भर्ती रहे। अस्पताल ने सर्जरी जांच और रूम किराए के नाम पर सीधे आठ लाख रुपये का लंबा चौड़ा बिल थमा दिया। रमेश के परिवार ने जब आयुष्मान योजना से इलाज करने को कहा तो प्रबंधन ने साफ मना कर दिया। जान बचाने की मजबूरी में उन्हें पूरे आठ लाख रुपये चुकाने पड़े। बाद में उन्होंने सीएमएचओ दफ्तर में इसकी लिखित शिकायत की। 13 अप्रैल 2024 को विभाग ने अस्पताल को नोटिस तो भेजा लेकिन उसके बाद फाइल ठंडे बस्ते में डाल दी गई और अस्पताल प्रशासन मजे से अपना काम कर रहा है।</p>
<p>लूट का एक और हैरान करने वाला मामला पुरानी बस्ती निवासी धीरज शर्मा का है। धीरज के फूफा को नियमित डायलिसिस की जरूरत होती है। शुरू में अस्पताल ने आयुष्मान कार्ड पर डायलिसिस किया। कुछ दिन बाद ही अस्पताल प्रबंधन ने हर सेशन के लिए तीन हजार रुपये नगद मांगना शुरू कर दिया। परिजनों ने मरीज की जान बचाने के लिए नगद पैसे दिए। बाद में पता चला कि अस्पताल प्रबंधन नगद पैसे भी ले रहा था और आयुष्मान कार्ड से भी पैसे काट रहा था। यह सीधे तौर पर धोखाधड़ी का मामला है। इस धोखाधड़ी की शिकायत के बाद भी विभाग ने कुछ नहीं किया तो परेशान होकर मरीज को दूसरा अस्पताल खोजना पड़ा।</p>
<p>जुलाई 2025 में माध्यमिक शिक्षा मंडल में काम करने वाले खुमान साहू को ब्रेन स्ट्रोक आया। परिजन उन्हें लेकर भागे और अस्पताल पहुंचे। वहां जाते ही प्रबंधन ने दस हजार रुपये जमा करवा लिए। जब परिवार ने आयुष्मान कार्ड दिखाया तो अस्पताल ने इलाज करने से ही मना कर दिया। चार घंटे तक उन्हें वहीं रखा गया और शाम चार बजे छुट्टी दे दी गई। इस चार घंटे के लिए 24 हजार रुपये का बिल बना दिया गया जबकि इसमें दवाइयों का खर्च सिर्फ दो हजार रुपये था। आयुष्मान दफ्तर से फोन जाने पर अस्पताल ने पहले हामी भरी थी लेकिन बाद में बेड खाली नहीं होने का बहाना बनाकर मरीज को चलता कर दिया।</p>
<p>इन तमाम मामलों पर सीएमएचओ डॉ मिथिलेश चौधरी का रटा रटाया जवाब सामने आया है। उनका कहना है कि आयुष्मान योजना में गड़बड़ी की शिकायतों पर अस्पताल को नोटिस दिया गया है। लापरवाही के एक पुराने मामले में अस्पताल पर 20 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया गया था। उनका कहना है कि कोई और गंभीर शिकायत आएगी तो कड़ी कार्रवाई की जाएगी। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि मरीजों से लाखों रुपये की लूट और दोहरी ठगी के बाद भी विभाग को और कितनी गंभीर शिकायत का इंतजार है। सिस्टम की यह सुस्ती मरीजों पर भारी पड़ रही है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>अपराध</category>
                                            <category>छत्तीसगढ़</category>
                                            <category>हेल्थ</category>
                                            <category>प्रशासनिक </category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 08 Apr 2026 08:19:01 +0530</pubDate>
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