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                <title>कानून - National Jagat Vision</title>
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                <description>कानून RSS Feed</description>
                
                            <item>
                <title>महासमुंद नकल कांड: 12वीं की छात्रा के 'स्टिंग' से मचा हड़कंप, DEO ने DPI को सौंपी प्रारंभिक रिपोर्ट; कल हाईकोर्ट में अहम सुनवाई, कार्रवाई पर सस्पेंस</title>
                                    <description><![CDATA[<p>रायपुर/महासमुंद। छत्तीसगढ़ के महासमुंद जिले में 12वीं बोर्ड परीक्षा के दौरान हुए खुलेआम नकल कांड में प्रशासनिक स्तर पर हलचल तेज हो गई है। भंवरपुर स्थित स्वामी आत्मानंद उत्कृष्ट हिन्दी-अंग्रेजी माध्यम स्कूल परीक्षा केंद्र में हुई इस घटना की प्रारंभिक जांच रिपोर्ट जिला शिक्षा अधिकारी (DEO) कार्यालय ने लोक शिक्षण संचालनालय (DPI) को सौंप दी है। अब पूरे प्रदेश की निगाहें कल यानी 4 मई को छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में होने वाली अहम सुनवाई पर टिकी हैं। फिलहाल, रिपोर्ट के आधार पर शिक्षा विभाग के स्तर पर दोषियों पर क्या गाज गिरेगी, इसे लेकर संशय बरकरार है।</p>
<h5><strong>छात्रा ने 'स्टिंग' कर</strong></h5>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.nationaljagatvision.com/law/mahasamund-cheating-case-sting-of-12th-class-student-creates-stir/article-9553"><img src="https://www.nationaljagatvision.com/media/400/2026-05/image_search_1777782161285.jpg" alt=""></a><br /><p>रायपुर/महासमुंद। छत्तीसगढ़ के महासमुंद जिले में 12वीं बोर्ड परीक्षा के दौरान हुए खुलेआम नकल कांड में प्रशासनिक स्तर पर हलचल तेज हो गई है। भंवरपुर स्थित स्वामी आत्मानंद उत्कृष्ट हिन्दी-अंग्रेजी माध्यम स्कूल परीक्षा केंद्र में हुई इस घटना की प्रारंभिक जांच रिपोर्ट जिला शिक्षा अधिकारी (DEO) कार्यालय ने लोक शिक्षण संचालनालय (DPI) को सौंप दी है। अब पूरे प्रदेश की निगाहें कल यानी 4 मई को छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में होने वाली अहम सुनवाई पर टिकी हैं। फिलहाल, रिपोर्ट के आधार पर शिक्षा विभाग के स्तर पर दोषियों पर क्या गाज गिरेगी, इसे लेकर संशय बरकरार है।</p>
<h5><strong>छात्रा ने 'स्टिंग' कर खोली सिस्टम की पोल</strong></h5>
<p>इस पूरे मामले का पर्दाफाश किसी विभागीय उड़नदस्ते (फ्लाइंग स्क्वॉड) या शिक्षा अधिकारी ने नहीं किया है, बल्कि उसी सेंटर पर 12वीं की परीक्षा दे रही एक निडर छात्रा ने किया है। प्रदेश में बेहतर रिजल्ट का दिखावा करने के लिए कई जिलों से नकल की दबी-छिपी शिकायतें आ रही थीं, लेकिन भंवरपुर सेंटर पर तो खुलेआम नियमों की धज्जियां उड़ाई जा रही थीं। परेशान छात्रा ने न सिर्फ इसकी लिखित शिकायत की, बल्कि 'स्टिंग' के जरिए इस पूरे फर्जीवाड़े को उजागर कर दिया। शुरुआत में स्थानीय स्तर पर मामले को दबाने की कोशिश हुई और जांच के नाम पर खानापूर्ति की गई। जब जिला स्तर पर कोई सुनवाई नहीं हुई, तो छात्रा ने सीधे माध्यमिक शिक्षा मंडल (माशिमं) रायपुर पहुंचकर न्याय की गुहार लगाई।</p>
<h5><strong>हाईकोर्ट ने लिया स्वतः संज्ञान, कल पेश होगा शासन का जवाब</strong></h5>
<p>छात्रा की पुख्ता शिकायत को माशिमं की अध्यक्ष ने बेहद गंभीरता से लिया और तत्काल महासमुंद कलेक्टर को पत्र लिखकर इस पूरे प्रकरण की तथ्यात्मक रिपोर्ट तलब की। मामला तब और हाई-प्रोफाइल हो गया जब छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने इस गंभीर मामले पर स्वतः संज्ञान (Suo Motu) ले लिया। हाईकोर्ट ने राज्य के मुख्य सचिव को नोटिस जारी कर इस अव्यवस्था पर जवाब तलब किया है। इस मामले में कल, 4 मई को हाईकोर्ट में सुनवाई होनी है, जिसमें राज्य शासन की ओर से जवाब प्रस्तुत किया जाना है।</p>
<h5><strong>जांच रिपोर्ट में नकल को माना गया 'गंभीर', मंत्री ने दिए सख्त कार्रवाई के संकेत</strong></h5>
<p>विभागीय सूत्रों के मुताबिक, माशिमं मुख्यालय तक शिकायत पहुंचने और हाईकोर्ट की सख्ती के बाद ही जिला शिक्षा कार्यालय हरकत में आया। आनन-फानन में जांच पूरी कर रिपोर्ट सीधे संचालनालय (DPI) को भेजी गई है। बताया जा रहा है कि इस प्रारंभिक रिपोर्ट में परीक्षा केंद्र में नकल और भारी अव्यवस्था को गंभीर माना गया है।</p>
<p>इस पूरे विवाद पर स्कूल शिक्षा मंत्री गजेंद्र यादव ने भी कड़ा रुख अपनाया है। उन्होंने स्पष्ट किया है कि जांच रिपोर्ट का बारीकी से अध्ययन किया जा रहा है और परीक्षा के दौरान किसी भी स्तर पर गड़बड़ी या केंद्र प्रभारियों की मिलीभगत पाए जाने पर उनके खिलाफ सख्त से सख्त अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाएगी।</p>
<p> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>कानून</category>
                                            <category>छत्तीसगढ़</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 03 May 2026 09:53:10 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[मनीशंकर पांडेय]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>छत्तीसगढ़ में 5 सिविल जजों का एक साथ इस्तीफा, विधि विभाग ने किया मंजूर; कठिन परीक्षा पास कर पाई थी कुर्सी, अब अचानक छोड़ी नौकरी तो उठने लगे सवाल</title>
                                    <description><![CDATA[<p>बिलासपुर।छत्तीसगढ़ के न्यायिक और प्रशासनिक महकमे से एक बड़ी और हैरान करने वाली खबर सामने आई है। प्रदेश में पदस्थ पांच सिविल जजों (जूनियर डिवीजन) ने अपनी सरकारी नौकरी से इस्तीफा दे दिया है। राज्य शासन के विधि एवं विधायी कार्य विभाग ने छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट की अनुशंसा पर इन सभी पांचों जजों के त्यागपत्र को स्वीकार कर लिया है। साथ ही इन्हें सेवा से कार्यमुक्त (रिलीव) करने का आधिकारिक आदेश भी जारी कर दिया गया है। इतनी कठिन चयन प्रक्रिया से गुजरने के बाद एक साथ पांच जजों के पद छोड़ने से कानूनी और प्रशासनिक हलकों में खासी चर्चा है।</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.nationaljagatvision.com/law/in-chhattisgarh-simultaneous-resignation-of-5-civil-judges-was-accepted/article-9552"><img src="https://www.nationaljagatvision.com/media/400/2026-05/image_search_1777776125725.png" alt=""></a><br /><p>बिलासपुर।छत्तीसगढ़ के न्यायिक और प्रशासनिक महकमे से एक बड़ी और हैरान करने वाली खबर सामने आई है। प्रदेश में पदस्थ पांच सिविल जजों (जूनियर डिवीजन) ने अपनी सरकारी नौकरी से इस्तीफा दे दिया है। राज्य शासन के विधि एवं विधायी कार्य विभाग ने छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट की अनुशंसा पर इन सभी पांचों जजों के त्यागपत्र को स्वीकार कर लिया है। साथ ही इन्हें सेवा से कार्यमुक्त (रिलीव) करने का आधिकारिक आदेश भी जारी कर दिया गया है। इतनी कठिन चयन प्रक्रिया से गुजरने के बाद एक साथ पांच जजों के पद छोड़ने से कानूनी और प्रशासनिक हलकों में खासी चर्चा है।</p><h5><strong>इन न्यायिक अधिकारियों ने छोड़ा पद</strong></h5><p>विधि एवं विधायी कार्य विभाग द्वारा जारी किए गए आदेश के अनुसार, जिन न्यायिक अधिकारियों का इस्तीफा मंजूर किया गया है, वे रायपुर, दुर्ग और महासमुंद जैसे प्रमुख जिलों में अपनी सेवाएं दे रहे थे। इस्तीफा देने वाले जजों में शामिल हैं:</p><p> द्विब सिंह सेंगर - सिविल जज (जूनियर डिवीजन), दुर्ग</p><p> प्रिय दर्शन गोस्वामी - चतुर्थ सिविल जज (जूनियर डिवीजन), महासमुंद</p><p> कुमारी नंदनी पटेल - सिविल जज (जूनियर डिवीजन), रायपुर</p><p> कुमारी भामिनी राठी - अष्टम सिविल जज (जूनियर डिवीजन), रायपुर</p><p> अर्पित गुप्ता - प्रथम सिविल जज (जूनियर डिवीजन), रायपुर</p><p>इस्तीफे की वजह व्यक्तिगत , लेकिन चर्चाओं का बाजार गर्म</p><p>आधिकारिक जानकारी के मुताबिक, न्यायिक सेवा में पदस्थ इन सभी पांचों सिविल जजों ने अपने पद से त्यागपत्र देने के पीछे 'व्यक्तिगत कारणों' का हवाला दिया है। नियमतः जब इन्होंने अपना इस्तीफा सौंपा, तो हाईकोर्ट ने इसकी प्रक्रियागत जांच की। जांच पूरी होने के बाद हाईकोर्ट ने इन इस्तीफों को मंजूर करने के लिए राज्य शासन के विधि एवं विधायी कार्य विभाग (लॉ डिपार्टमेंट) को अपनी अनुशंसा भेज दी। इसी अनुशंसा के आधार पर शासन ने मुहर लगाते हुए इन्हें अप्रैल माह में ही कार्यमुक्त कर दिया है।</p><p>आखिर क्यों हुआ मोहभंग? उठ रहे सवाल</p><p>सिविल जज (CJ) की परीक्षा राज्य लोक सेवा आयोग और हाईकोर्ट के समन्वय से आयोजित की जाने वाली सबसे कठिन और प्रतिष्ठित परीक्षाओं में से एक मानी जाती है। वकालत की पढ़ाई करने वाले हजारों युवा इस पद के लिए सालों तक दिन-रात एक करते हैं। ऐसे में इतनी कड़ी प्रतिस्पर्धा को पार कर जज की कुर्सी और इतना बड़ा रुतबा हासिल करने वाले इन पांच अधिकारियों का अचानक नौकरी छोड़ना हर किसी को चौंका रहा है।</p><p>एक साथ पांच जजों के इस तरह सामूहिक त्यागपत्र ने आम जनमानस के बीच भी कई सवाल खड़े कर दिए हैं। लोग यह जानने को उत्सुक हैं कि करियर की शुरुआत में ही आखिर ऐसी क्या वजह रही होगी कि इन होनहार युवाओं ने एक सुरक्षित और सम्मानजनक करियर को यूं अचानक अलविदा कह दिया। क्या इसके पीछे कोई अन्य बेहतर करियर विकल्प है या फिर न्यायिक सेवा का वर्कलोड? कारण जो भी हो, फिलहाल यह हाई-प्रोफाइल इस्तीफा पूरे प्रदेश में चर्चा का विषय बना हुआ है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>कानून</category>
                                            <category>बिलासपुर</category>
                                            <category>छत्तीसगढ़</category>
                                    

                <link>https://www.nationaljagatvision.com/law/in-chhattisgarh-simultaneous-resignation-of-5-civil-judges-was-accepted/article-9552</link>
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                <pubDate>Sun, 03 May 2026 08:13:47 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[मनीशंकर पांडेय]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>उज्बेकिस्तान की युवतियों को अवैध हिरासत में रखने का आरोप: हाईकोर्ट का कड़ा रुख, केंद्र और राज्य सरकार को नोटिस जारी</title>
                                    <description><![CDATA[<div class="markdown markdown-main-panel stronger enable-updated-hr-color" dir="ltr">
<p><strong>बिलासपुर/रायपुर।</strong> राजधानी रायपुर में अवैध रूप से रहने के आरोप में हिरासत में ली गईं उज्बेकिस्तान की दो युवतियों के मामले में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। युवतियों की ओर से दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus) याचिका पर सुनवाई करते हुए अदालत ने केंद्र और राज्य सरकार को नोटिस जारी किया है। कोर्ट ने दोनों सरकारों से दो सप्ताह के भीतर जवाब तलब किया है। इसके साथ ही, अदालत ने याचिकाकर्ता युवतियों को भी अपना जवाब पेश करने का निर्देश दिया है।</p>
<p><strong>जानिए क्या है पूरा मामला?</strong></p>
<p>यह पूरा मामला रायपुर के तेलीबांधा थाना क्षेत्र से जुड़ा है।</p></div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.nationaljagatvision.com/law/high-court-takes-a-tough-stance-on-the-allegations-of/article-9530"><img src="https://www.nationaljagatvision.com/media/400/2026-04/image_search_1776420104381.jpg" alt=""></a><br /><div class="markdown markdown-main-panel stronger enable-updated-hr-color" dir="ltr">
<p><strong>बिलासपुर/रायपुर।</strong> राजधानी रायपुर में अवैध रूप से रहने के आरोप में हिरासत में ली गईं उज्बेकिस्तान की दो युवतियों के मामले में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। युवतियों की ओर से दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus) याचिका पर सुनवाई करते हुए अदालत ने केंद्र और राज्य सरकार को नोटिस जारी किया है। कोर्ट ने दोनों सरकारों से दो सप्ताह के भीतर जवाब तलब किया है। इसके साथ ही, अदालत ने याचिकाकर्ता युवतियों को भी अपना जवाब पेश करने का निर्देश दिया है।</p>
<p><strong>जानिए क्या है पूरा मामला?</strong></p>
<p>यह पूरा मामला रायपुर के तेलीबांधा थाना क्षेत्र से जुड़ा है। फरवरी 2026 में पुलिस को मुखबिर से सूचना मिली थी कि इलाके के एक होटल में उज्बेकिस्तान की दो युवतियां अवैध रूप से ठहरी हुई हैं। इस सूचना पर कार्रवाई करते हुए पुलिस ने दोनों को हिरासत में ले लिया था। चूंकि मामला विदेशी नागरिकों की सुरक्षा और संदेहास्पद गतिविधियों से जुड़ा था, इसलिए इसकी आगे की जांच इंटेलिजेंस ब्यूरो (IB) को सौंप दी गई थी।</p>
<p><strong>बिना मजिस्ट्रेट के सामने पेश किए जेल में रखने का आरोप</strong></p>
<p>अब इस मामले में युवतियों की ओर से हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया गया है। दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका में पुलिस की कार्रवाई पर गंभीर सवाल उठाए गए हैं। याचिका में आरोप है कि युवतियों को 14 जनवरी 2026 से ही लगातार हिरासत में रखा गया है, जो पूरी तरह से गैरकानूनी है। याचिकाकर्ताओं के मुताबिक, उन्हें बिना किसी औपचारिक गिरफ्तारी के रायपुर सेंट्रल जेल के डिटेंशन सेंटर में रखा गया और इस दौरान उन्हें किसी भी मजिस्ट्रेट या न्यायिक अधिकारी के सामने पेश नहीं किया गया।</p>
<p><strong>वीजा खत्म होना महज एक तकनीकी त्रुटि: बचाव पक्ष</strong></p>
<p>याचिका में दलील दी गई है कि हिरासत में रखने के दौरान कानूनी प्रक्रियाओं का घोर उल्लंघन हुआ है। आरोप है कि गिरफ्तारी के समय कोई स्पष्ट मामला दर्ज नहीं था और एफआईआर बाद में लिखी गई, जिससे इस पूरी हिरासत की वैधता पर ही सवाल खड़े होते हैं। याचिकाकर्ताओं ने कोर्ट को बताया कि दोनों युवतियां टूरिस्ट के रूप में भारत आई थीं और उनके पास वैध पासपोर्ट मौजूद हैं। वीजा की अवधि का समाप्त होना केवल एक 'तकनीकी त्रुटि' है।</p>
<p>युवतियों के वकीलों ने अदालत में तर्क दिया कि बिना मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किए किसी को भी लंबे समय तक हिरासत में रखना भारतीय संविधान और आपराधिक न्याय व्यवस्था (CrPC) के नियमों का खुला उल्लंघन है।</p>
<p>सुनवाई के दौरान राज्य और केंद्र सरकार की ओर से पेश हुए अधिवक्ताओं ने जवाब दाखिल करने के लिए अदालत से समय मांगा। कोर्ट ने इस मांग को स्वीकार करते हुए दो सप्ताह का समय दिया है। अब इस मामले की अगली सुनवाई में सरकार के जवाब पर सबकी निगाहें टिकी होंगी।</p>
</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>कानून</category>
                                            <category>छत्तीसगढ़</category>
                                    

                <link>https://www.nationaljagatvision.com/law/high-court-takes-a-tough-stance-on-the-allegations-of/article-9530</link>
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                <pubDate>Fri, 01 May 2026 14:24:05 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[मनीशंकर पांडेय]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>पत्रकार मुकेश चंद्राकर हत्याकांड: हाईकोर्ट से आरोपियों को बड़ा झटका, दंतेवाड़ा में ही चलेगा ट्रायल; जान के खतरे की दलील खारिज</title>
                                    <description><![CDATA[<p><strong>बिलासपुर/बीजापुर।</strong> बीजापुर के बहुचर्चित और सनसनीखेज पत्रकार मुकेश चंद्राकर हत्याकांड मामले में आरोपियों को छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय से करारा झटका लगा है। हाईकोर्ट में चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा की खंडपीठ ने मुख्य आरोपी सुरेश चंद्राकर समेत अन्य आरोपियों की आपराधिक स्थानांतरण याचिका (TPCR No. 07/2026) को सिरे से खारिज कर दिया है। अदालत के इस फैसले के बाद अब यह पूरी तरह स्पष्ट हो गया है कि इस हत्याकांड का ट्रायल दंतेवाड़ा की जिला एवं सत्र अदालत में ही जारी रहेगा।</p>
<p><strong>80 किलोमीटर के सफर में बताया था जान का खतरा</strong> मुख्य आरोपी सुरेश चंद्राकर, रितेश चंद्राकर, दिनेश चंद्राकर और</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.nationaljagatvision.com/law/journalist-mukesh-chandrakar-murder-case-big-blow-to-accused-from/article-9529"><img src="https://www.nationaljagatvision.com/media/400/2026-05/01_05_2026-journalist_mukesh_chandrakar_murder_case_m.jpg" alt=""></a><br /><p><strong>बिलासपुर/बीजापुर।</strong> बीजापुर के बहुचर्चित और सनसनीखेज पत्रकार मुकेश चंद्राकर हत्याकांड मामले में आरोपियों को छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय से करारा झटका लगा है। हाईकोर्ट में चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा की खंडपीठ ने मुख्य आरोपी सुरेश चंद्राकर समेत अन्य आरोपियों की आपराधिक स्थानांतरण याचिका (TPCR No. 07/2026) को सिरे से खारिज कर दिया है। अदालत के इस फैसले के बाद अब यह पूरी तरह स्पष्ट हो गया है कि इस हत्याकांड का ट्रायल दंतेवाड़ा की जिला एवं सत्र अदालत में ही जारी रहेगा।</p>
<p><strong>80 किलोमीटर के सफर में बताया था जान का खतरा</strong> मुख्य आरोपी सुरेश चंद्राकर, रितेश चंद्राकर, दिनेश चंद्राकर और महेंद्र रामटेके ने अपने वकील के माध्यम से हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। इसमें मांग की गई थी कि मामले का ट्रायल दंतेवाड़ा से जगदलपुर स्थानांतरित किया जाए। बचाव पक्ष ने दलील दी कि जगदलपुर जेल से दंतेवाड़ा कोर्ट तक पेशी पर जाने के लिए लगभग 80 किलोमीटर का सफर तय करना पड़ता है और इस रास्ते में आरोपियों की जान को गंभीर खतरा है।</p>
<p><strong>जेल प्रशासन की दलील और कोर्ट का कड़ा रुख</strong> सुनवाई के दौरान जेल प्रशासन ने आरोपियों के तर्कों की हवा निकाल दी। प्रशासन ने कोर्ट को आश्वस्त किया कि आरोपियों को पेशी पर ले जाने में सुरक्षा या लॉजिस्टिक की कोई भी समस्या नहीं है। इसके अलावा, कोर्ट में पेशी के लिए वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग (VC) की पूरी व्यवस्था उपलब्ध है। जेल प्रशासन ने यह भी कहा कि अगर जरूरत पड़ी, तो आरोपियों को सीधे दंतेवाड़ा जेल में शिफ्ट किया जा सकता है। दोनों पक्षों को सुनने के बाद अदालत ने सुरक्षा के बहाने ट्रायल को प्रभावित करने की कोशिश को निराधार मानते हुए याचिका खारिज कर दी। अब इस मामले में सभी आरोपियों को आगामी 4 मई को दंतेवाड़ा जिला एवं सत्र न्यायालय में पेश किया जाएगा।</p>
<p><strong>क्या है पूरा मामला?</strong> गौरतलब है कि 1 जनवरी 2025 को स्वतंत्र पत्रकार और ‘बस्तर जंक्शन’ यूट्यूब चैनल के संचालक मुकेश चंद्राकर की बेरहमी से हत्या कर दी गई थी। मुकेश ने सड़क निर्माण में ठेकेदार द्वारा किए जा रहे भ्रष्टाचार और अनियमितताओं का बेबाकी से खुलासा किया था।</p>
<p>इसी रंजिश के चलते मास्टरमाइंड और मुकेश के चचेरे भाई (ठेकेदार) सुरेश चंद्राकर ने खौफनाक साजिश रची। उसने अपने अन्य भाइयों और सहयोगियों के साथ मिलकर मुकेश की हत्या की और पुलिस को गुमराह करने के लिए शव को चट्टानपारा स्थित बाड़े के सेप्टिक टैंक में डालकर ऊपर से चुनवा दिया। हालांकि, मुकेश के साथी पत्रकारों की मदद से पुलिस ने सेप्टिक टैंक खोदकर शव ढूंढ निकाला और बाद में हत्या में प्रयुक्त हथियार भी बरामद कर लिए</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>कानून</category>
                                            <category>छत्तीसगढ़</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 01 May 2026 14:14:09 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[मनीशंकर पांडेय]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>बिलासपुर प्रेस क्लब पत्रकार कॉलोनी में जमीन के बंदरबांट पर प्रशासन का बड़ा प्रहार, नियम विरुद्ध बेची गई जमीनों की रजिस्ट्रियां होंगी शून्य, सीमांकन का आदेश जारी</title>
                                    <description><![CDATA[<p>बिलासपुर। लंबे समय से विवादों, शिकायतों और घोटालों के भंवर में फंसी बिलासपुर प्रेस क्लब गृह निर्माण समिति पर अब प्रशासन का चाबुक चल गया है। पत्रकारों के आशियाने के लिए आवंटित बेशकीमती जमीन पर बीते कई सालों से जिस तरह बंदरबांट का खेल खेला जा रहा था, उस पर लगाम कसने की पूरी तैयारी हो चुकी है। जिला प्रशासन ने एक सख्त और बड़ा फैसला लेते हुए प्रेस क्लब की पत्रकार कॉलोनी की जमीन के विधिवत सीमांकन और दस्तावेजों की बारीकी से जांच के आदेश जारी कर दिए हैं। इसके साथ ही प्रशासन की जांच की आंच उन लोगों</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.nationaljagatvision.com/crime/administrations-big-attack-on-the-distribution-of-land-in-bilaspur/article-9501"><img src="https://www.nationaljagatvision.com/media/400/2026-04/file_0000000098d07207bfbe277dfc4d5170.png" alt=""></a><br /><p>बिलासपुर। लंबे समय से विवादों, शिकायतों और घोटालों के भंवर में फंसी बिलासपुर प्रेस क्लब गृह निर्माण समिति पर अब प्रशासन का चाबुक चल गया है। पत्रकारों के आशियाने के लिए आवंटित बेशकीमती जमीन पर बीते कई सालों से जिस तरह बंदरबांट का खेल खेला जा रहा था, उस पर लगाम कसने की पूरी तैयारी हो चुकी है। जिला प्रशासन ने एक सख्त और बड़ा फैसला लेते हुए प्रेस क्लब की पत्रकार कॉलोनी की जमीन के विधिवत सीमांकन और दस्तावेजों की बारीकी से जांच के आदेश जारी कर दिए हैं। इसके साथ ही प्रशासन की जांच की आंच उन लोगों तक भी पहुंचने वाली है, जिन्होंने समिति के नियमों को धता बताकर आवंटित जमीनें दूसरों को बेच दी हैं।</p>
<p>इस आदेश के बाद उन लोगों की रातों की नींद उड़ गई है, जिन्होंने नियमों को ताक पर रखकर इस बहुमूल्य जमीन की मलाई काटी और रियल एस्टेट का धंधा बना लिया।</p>
<p> </p>
<h5><strong>पुरानी कार्यकारिणी ने दबा दी थी आवाज</strong></h5>
<p> </p>
<p>दरअसल, यह पूरा मामला केवल जमीन नपाई का एक सामान्य प्रशासनिक आदेश नहीं है, बल्कि सालों से दबाई जा रही आम पत्रकारों की उस आवाज की जीत है, जिसे पिछली कार्यकारिणी ने पूरी तरह से अनसुना कर दिया था। सूत्रों की मानें तो पिछली समितियों के कार्यकाल में कॉलोनी के रखरखाव और जमीन आवंटन में भारी अनियमितताएं बरती गईं। आम और जरूरतमंद पत्रकार अपने हक़ के लिए दर-दर भटकते रहे, प्रेस क्लब के सदस्यों ने लगातार अपनी आवाज सरकार तक पहुंचाई, लेकिन अपनों को रेवड़ियां बांटने की होड़ में पुरानी कार्यकारिणी ने इन शिकायतों को रद्दी की टोकरी में डाल दिया।</p>
<p> </p>
<h5><strong>बायलाज का खुला उल्लंघन: आवंटित जमीनें बेचीं, अब शून्य होंगी रजिस्ट्रियां</strong></h5>
<p> </p>
<p> </p>
<p>इस पूरे मामले में सबसे बड़ा फर्जीवाड़ा अब जाकर सामने आया है। समिति के बायलाज (नियमों) का खुला उल्लंघन करते हुए आवंटित जमीनों की धड़ल्ले से खरीद-बिक्री की गई है। समिति के सख्त प्रावधानों के अनुसार, जमीन आवंटित होने के बाद उस पर सिर्फ मकान बनाकर स्वयं निवास करने का नियम है। किसी भी स्थिति में आवंटित जमीन को किसी दूसरे व्यक्ति को बेचने का अधिकार आवंटियों को नहीं है।</p>
<p>इसके बावजूद कई लोगों ने जमीन हथिया कर उसे मुनाफे में बाहरी लोगों को बेच दिया। प्रशासन अब इस दिशा में सबसे सख्त कदम उठाने जा रहा है। जांच में जो भी ऐसे मामले सामने आएंगे, जहां पत्रकारों के लिए आरक्षित जमीन किसी और को बेची गई है, उन सभी जमीनों की दूसरी बिक्री (रजिस्ट्री) को शून्य (रद्द) घोषित करने की बड़ी कानूनी कार्रवाई की जाएगी।</p>
<p> </p>
<h5> <strong>अध्यक्ष अजीत मिश्रा की पहल पर हरकत में आया प्रशासन</strong></h5>
<p> </p>
<p>इस पूरे भ्रष्ट नेक्सस को तोड़ने का बीड़ा हाल ही में बिलासपुर प्रेस क्लब के मौजूदा अध्यक्ष अजीत मिश्रा ने उठाया। उन्होंने इस जमीन घोटाले, अवैध बिक्री और अव्यवस्था की पुरानी फाइलें खोलीं और तथ्यों के साथ सीधे वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों को पत्र लिखा। अजीत मिश्रा की इसी ठोस शिकायत और लगातार बनाए गए दबाव का नतीजा है कि जिला प्रशासन को मामले की गंभीरता समझ आई और त्वरित निर्णय लेते हुए सीमांकन और अवैध रजिस्ट्रियों पर गाज गिराने का यह बड़ा आदेश जारी किया गया।</p>
<p> </p>
<h5> <strong>इंच-इंच नपेगी जमीन, 4 सदस्यीय स्पेशल टीम गठित</strong></h5>
<p> </p>
<p>अतिरिक्त तहसीलदार, बिलासपुर द्वारा 24 अप्रैल 2026 को जारी आदेश के मुताबिक, मौजा बिरकोना (आशावन रोड, पत्रकार कॉलोनी) की विवादित जमीनों का अब कड़ाई से सीमांकन होगा।</p>
<h5><strong>इन खसरा नंबरों की होगी जांच:</strong></h5>
<p>खसरा नम्बर 1340/27 (रकबा 0.8090 हेक्टेयर)</p>
<p>खसरा नम्बर 1340/4 (रकबा 1.2010 हेक्टेयर)</p>
<p>खसरा नम्बर 1260/2 (रकबा 2.2370 हेक्टेयर)</p>
<p>जमीन के इस भारी घालमेल की परतें उधेड़ने के लिए राजस्व अधिकारियों की एक विशेष टीम गठित की गई है। इस टास्क फोर्स में ये अधिकारी शामिल हैं:</p>
<p>श्री कुलदीप शर्मा - राजस्व निरीक्षक (कोनी)</p>
<p>श्रीमती ममता तिर्की - राजस्व निरीक्षक (मोपका)</p>
<p>श्री पराग महिलांगे - पटवारी (हल्का नं. 47, बिरकोना)</p>
<p>श्री रूपेश गुरूदीवान - पटवारी (हल्का नं. 33, चांटीडीह)</p>
<p> </p>
<h5><strong>20 मई से पहले देनी होगी रिपोर्ट, बेनकाब होंगे कई चेहरे</strong></h5>
<p> </p>
<p>अतिरिक्त तहसीलदार के न्यायालय ने जांच दल को स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि वे मौके पर जाकर पूरी भूमि के दस्तावेजों की विधिवत जांच करें। टीम को मौका जांच प्रतिवेदन, पंचनामा, नजरी नक्शा और राजस्व अभिलेखों की सत्यप्रति के साथ 20 मई 2026 के पूर्व अनिवार्य रूप से अपनी रिपोर्ट न्यायालय में पेश करनी होगी।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>अपराध</category>
                                            <category>कानून</category>
                                            <category>बिलासपुर</category>
                                            <category>छत्तीसगढ़</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 29 Apr 2026 19:00:47 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[मनीशंकर पांडेय]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>DMF महाघोटाला: 18 हजार करोड़ के 1.13 लाख प्रोजेक्ट्स में कमीशनखोरी की सेंध, केंद्र की सख्ती के बाद भी ऑडिट और वार्षिक रिपोर्ट गायब</title>
                                    <description><![CDATA[<p>रायपुर (NJV News) छत्तीसगढ़ के 33 जिलों में खनिज प्रभावित क्षेत्रों के विकास के लिए बनाए गए जिला खनिज न्यास (DMF) में बड़े पैमाने पर धांधली का मामला थमने का नाम नहीं ले रहा है। फाइलों के खेल और आंकड़ों की बाजीगरी में अब तक 18 हजार करोड़ रुपये से अधिक के 1 लाख 13 हजार से ज्यादा प्रोजेक्ट मंजूर किए जा चुके हैं। इनमें से आधे से अधिक प्रोजेक्ट कागजों पर या धरातल पर पूरे भी हो चुके हैं। लेकिन, इन कार्यों में मनमानी और भ्रष्टाचार की थोक में शिकायतें छत्तीसगढ़ को पूरे देश में सुर्खियों में ला रही</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.nationaljagatvision.com/crime/dmf-mega-scam-commission-embezzlement-in-113-lakh-projects-worth/article-9482"><img src="https://www.nationaljagatvision.com/media/400/2026-04/file_000000008544720790cfc70b8b11e212.png" alt=""></a><br /><p>रायपुर (NJV News) छत्तीसगढ़ के 33 जिलों में खनिज प्रभावित क्षेत्रों के विकास के लिए बनाए गए जिला खनिज न्यास (DMF) में बड़े पैमाने पर धांधली का मामला थमने का नाम नहीं ले रहा है। फाइलों के खेल और आंकड़ों की बाजीगरी में अब तक 18 हजार करोड़ रुपये से अधिक के 1 लाख 13 हजार से ज्यादा प्रोजेक्ट मंजूर किए जा चुके हैं। इनमें से आधे से अधिक प्रोजेक्ट कागजों पर या धरातल पर पूरे भी हो चुके हैं। लेकिन, इन कार्यों में मनमानी और भ्रष्टाचार की थोक में शिकायतें छत्तीसगढ़ को पूरे देश में सुर्खियों में ला रही हैं। हालत यह है कि इस महाघोटाले की जांच अब ED (प्रवर्तन निदेशालय) और EOW-ACB जैसी एजेंसियां कर रही हैं, और कई पूर्व आईएएस तथा रसूखदार अधिकारी सलाखों के पीछे हैं।</p>
<p> </p>
<h5><strong>18 हजार करोड़ और 1.13 लाख प्रोजेक्ट्स का मायाजाल</strong></h5>
<p> </p>
<p>सरकारी आंकड़ों और वेब से प्राप्त हालिया विश्लेषण के मुताबिक, राज्य में DMF के तहत अब तक 18,234 करोड़ रुपये की लागत के 1,13,394 कार्य स्वीकृत किए जा चुके हैं। इस न्यास में खनन कंपनियों की रॉयल्टी से अब तक अलग-अलग जिलों से कुल 14,776.56 करोड़ रुपये की भारी-भरकम राशि संग्रहित की जा चुकी है।</p>
<p> </p>
<p><strong>कार्यों की वर्तमान स्थिति इस प्रकार है:</strong></p>
<ul>
<li> पूरे हुए कार्य: 10,688 करोड़ रुपये के 78,247 प्रोजेक्ट पूरे हो चुके हैं।</li>
<li> प्रगति पर: 4,376 करोड़ रुपये के 20,740 कार्य अभी भी चल रहे हैं।</li>
<li>शुरू नहीं हुए: 932 करोड़ रुपये के 3,946 कार्यों का अब तक श्रीगणेश ही नहीं हुआ।</li>
<li> रद्द कार्य: 2,026 करोड़ रुपये के 9,767 प्रोजेक्ट अलग-अलग तकनीकी और प्रशासनिक कारणों से रद्द कर दिए गए हैं।</li>
</ul>
<p> </p>
<p><strong>केंद्र की सख्ती बेअसर, ऑडिट रिपोर्ट पोर्टल से नदारद</strong></p>
<p> </p>
<p>DMF फंड में मची अंधेरगर्दी को देखते हुए केंद्र सरकार ने पिछले साल पारदर्शिता सुनिश्चित करने के सख्त निर्देश जारी किए थे। लेकिन जिलों में बैठे अफसरों ने इन निर्देशों को पूरी तरह दरकिनार कर दिया है। विडंबना यह है कि राज्य के ज्यादातर जिलों ने न तो DMF की कोई ऑडिट रिपोर्ट पोर्टल पर अपलोड की है और न ही वार्षिक रिपोर्ट (Annual Report) का कोई अता-पता है। ऑडिट न होने से करोड़ों की गड़बड़ियों पर पर्दा डालना इस सिंडिकेट के लिए बेहद आसान हो गया है।</p>
<p> </p>
<h5><strong>ED-EOW का शिकंजा: 40% तक कमीशनखोरी का आरोप</strong></h5>
<p> </p>
<p>DMF फंड मूल रूप से खदानों से प्रभावित आदिवासियों और स्थानीय लोगों के स्वास्थ्य, शिक्षा और आजीविका के उत्थान के लिए बनाया गया था। लेकिन जांच एजेंसियों के मुताबिक, इसे भ्रष्ट तंत्र ने अपना 'ATM' बना लिया। कोरबा और अन्य जिलों में चहेते ठेकेदारों को काम बांटने, टेंडर में हेरफेर करने और बीज निगम के जरिए फर्जीवाड़ा करने के कई बड़े मामले सामने आए हैं।</p>
<p>जांच एजेंसियों द्वारा कोर्ट में पेश की गई 6000 पन्नों की चार्जशीट के अनुसार, टेंडर के बदले 15% से लेकर 40% तक का भारी-भरकम कमीशन वसूला गया। इसके लिए बाकायदा डमी फर्मों का इस्तेमाल हुआ। इस घोटाले में पूर्व आईएएस अनिल टुटेजा, रानू साहू, और पूर्व सीएमओ अधिकारी सौम्या चौरसिया समेत कई बड़े नौकरशाहों और ठेकेदारों पर शिकंजा कसा जा चुका है और करोड़ों की संपत्तियां कुर्क हुई हैं।</p>
<p>बहरहाल, खनिज धारित राज्य छत्तीसगढ़ में 18 हजार करोड़ के इस फंड ने विकास की जगह भ्रष्टाचार का जो पहाड़ खड़ा किया है, उसकी कई परतें अभी भी खुलनी बाकी हैं। बिना ऑडिट और रिपोर्ट के यह तय कर पाना मुश्किल है कि आदिवासियों के हक के आखिर कितने हजार करोड़ रुपये भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गए।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>अपराध</category>
                                            <category>कानून</category>
                                            <category>छत्तीसगढ़</category>
                                    

                <link>https://www.nationaljagatvision.com/crime/dmf-mega-scam-commission-embezzlement-in-113-lakh-projects-worth/article-9482</link>
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                <pubDate>Tue, 28 Apr 2026 17:51:44 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[मनीशंकर पांडेय]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>13 साल बाद आया फैसला: बिलासपुर के महेश स्वीट्स को हाईकोर्ट का तगड़ा झटका, अरारोट की बोरी में निकला था मक्का स्टार्च, 1 लाख का जुर्माना बरकरार</title>
                                    <description><![CDATA[हाईकोर्ट की दो टूक- गुणवत्ता सही होना काफी नहीं, मिसब्रांडिंग अपने आप में एक अलग अपराध।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.nationaljagatvision.com/law/decision-came-after-13-years-high-courts-big-blow-to/article-9461"><img src="https://www.nationaljagatvision.com/media/400/2026-04/image_search_1777340932311.jpg" alt=""></a><br /><p>बिलासपुर। 13 साल बाद आए एक अहम फैसले में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने खाद्य सुरक्षा नियमों की अनदेखी और 'मिसब्रांडिंग' के मामले में बिलासपुर के नामी 'महेश स्वीट्स' के संचालक को बड़ा झटका दिया है। चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस बिभु दत्ता गुरु की डिवीजन बेंच ने एक दशक से अधिक समय से चले आ रहे इस मामले में महेश स्वीट्स के संचालक महेश चौकसे की आपराधिक अपील को सिरे से खारिज कर दिया है। 13 साल लंबी कानूनी जिरह के बाद अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि खाद्य सुरक्षा कानून के तहत उन पर लगाया गया 1 लाख रुपये का जुर्माना पूरी तरह वैध है और गलत लेबल वाला (मिसब्रांडेड) सामान रखना या इस्तेमाल करना कानूनन अपराध है।</p>
<p> </p>
<h5><strong>क्या है 13 साल पुराना यह पूरा विवाद?</strong></h5>
<p> </p>
<p>यह मामला साल 2011 से शुरू हुआ था। 15 अक्टूबर 2011 को खाद्य सुरक्षा अधिकारी ने बिलासपुर के तारबहार इलाके में स्थित महेश स्वीट्स की निर्माण इकाई (यूनिट) का औचक निरीक्षण किया था। जांच टीम को वहां 50 किलो का एक पैक बोरा मिला, जिस पर बड़े अक्षरों में 'अरारोट' लिखा हुआ था। अधिकारियों ने नियमानुसार उस बोरे से सैंपल लिया और जांच के लिए राज्य खाद्य परीक्षण प्रयोगशाला (रायपुर) भेज दिया।</p>
<p> </p>
<h5><strong>अरारोट की जगह निकला 'मक्का स्टार्च'</strong></h5>
<p> </p>
<p>31 अक्टूबर 2011 को रायपुर लैब से आई रिपोर्ट ने सबको चौंका दिया। रिपोर्ट में बताया गया कि सैंपल गुणवत्ता के मानकों पर तो खरा है, लेकिन वह 'अरारोट' है ही नहीं। दरअसल, अरारोट के नाम पर बोरे में 'मक्का स्टार्च' (Corn Starch) भरा हुआ था। लेबल पर अरारोट लिखना और अंदर मक्का स्टार्च होना सीधे तौर पर 'मिसब्रांडिंग' का मामला था। इसी आधार पर 22 मई 2012 को संचालक पर एक लाख रुपये का जुर्माना लगाया गया था। 2019 में सत्र न्यायालय से भी अपील खारिज हुई, जिसके बाद 13 साल की इस कानूनी लड़ाई का अंत अब हाईकोर्ट के अंतिम फैसले से हुआ है।</p>
<p> </p>
<p>हाईकोर्ट में बचाव पक्ष की दलीलें</p>
<p> </p>
<p>महेश स्वीट्स के संचालक की ओर से तर्क दिया गया कि वह अरारोट या मक्का स्टार्च के व्यापारी नहीं हैं, बल्कि कटलेट जैसे खाद्य पदार्थ बनाते हैं। सैंपल अंतिम उत्पाद का नहीं, कच्चे माल का था। यह भी दलील दी गई कि जब माल की गुणवत्ता बिल्कुल सही थी और सिर्फ नाम का अंतर था, तो सजा नहीं मिलनी चाहिए। बचाव पक्ष ने रायपुर लैब की वैधता पर भी सवाल उठाए थे और कहा था कि जांच गाजियाबाद की सेंट्रल लैब में होनी चाहिए थी।</p>
<p> </p>
<h5><strong>हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी: व्यापारी भी बराबर का जिम्मेदार</strong></h5>
<p> </p>
<p>13 साल बाद इस मामले का पटाक्षेप करते हुए हाईकोर्ट ने राज्य सरकार की कार्रवाई को पूरी तरह सही माना। चीफ जस्टिस की बेंच ने अपने फैसले में कहा कि:</p>
<p> रायपुर की राज्य प्रयोगशाला पूरी तरह से अधिकृत है, इसलिए उसकी रिपोर्ट शत-प्रतिशत वैध है।</p>
<p> मिसब्रांडिंग एक अलग अपराध है। भले ही उत्पाद की गुणवत्ता अच्छी हो, लेकिन गलत नाम से खाद्य सामग्री का उपयोग नहीं किया जा सकता।</p>
<p> सिर्फ माल बनाने वाला (निर्माता) ही नहीं, बल्कि उस सामग्री का उपयोग करने वाले व्यापारी की भी पूरी जिम्मेदारी बनती है कि वह सही चीज का इस्तेमाल करे।</p>
<p>अंततः हाईकोर्ट ने कहा कि निचली अदालत का फैसला कानूनी रूप से बिल्कुल सही है और सैंपलिंग प्रक्रिया में कोई खामी नहीं है। 13 साल बाद आए इस सख्त फैसले के साथ ही अदालत ने महेश स्वीट्स की अपील खारिज कर दी, जिससे उन्हें अब 1 लाख रुपये का जुर्माना भरना ही होगा।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>कानून</category>
                                            <category>बिलासपुर</category>
                                            <category>छत्तीसगढ़</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 28 Apr 2026 07:19:39 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[मनीशंकर पांडेय]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>कोरबा पाम मॉल जमीन घोटाला: पुलिस ने फिर पेश किया खात्मा, हाईकोर्ट ने CJM को 4 हफ्ते में फैसला लेने का दिया अल्टीमेटम</title>
                                    <description><![CDATA[<p>NJV लीगल डेस्क। छत्तीसगढ़ के बहुचर्चित कोरबा पाम मॉल जमीन घोटाले मामले में एक बड़ा लीगल अपडेट सामने आया है। शासकीय दस्तावेजों में कूट रचना (फर्जीवाड़ा) की एफआईआर के मामले में कोरबा पुलिस की कार्यप्रणाली एक बार फिर सवालों के घेरे में आ गई है। निचली अदालत के स्पष्ट आदेश के बावजूद कोतवाली पुलिस ने चार्जशीट की जगह फिर से 'खात्मा रिपोर्ट' (Closure Report) पेश कर दी है। अब बिलासपुर हाईकोर्ट ने इस मामले में दखल देते हुए मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (CJM) कोरबा को 4 सप्ताह के भीतर इस खात्मा प्रतिवेदन पर अंतिम निर्णय लेने का सख्त आदेश दिया है।</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.nationaljagatvision.com/law/korba-palm-mall-land-scam-police-again-presented-its-end/article-9443"><img src="https://www.nationaljagatvision.com/media/400/2026-04/image_search_1777264918196.jpg" alt=""></a><br /><p>NJV लीगल डेस्क। छत्तीसगढ़ के बहुचर्चित कोरबा पाम मॉल जमीन घोटाले मामले में एक बड़ा लीगल अपडेट सामने आया है। शासकीय दस्तावेजों में कूट रचना (फर्जीवाड़ा) की एफआईआर के मामले में कोरबा पुलिस की कार्यप्रणाली एक बार फिर सवालों के घेरे में आ गई है। निचली अदालत के स्पष्ट आदेश के बावजूद कोतवाली पुलिस ने चार्जशीट की जगह फिर से 'खात्मा रिपोर्ट' (Closure Report) पेश कर दी है। अब बिलासपुर हाईकोर्ट ने इस मामले में दखल देते हुए मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (CJM) कोरबा को 4 सप्ताह के भीतर इस खात्मा प्रतिवेदन पर अंतिम निर्णय लेने का सख्त आदेश दिया है।</p>
<h5><strong>हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच का अहम निर्देश</strong></h5>
<p>इस हाई-प्रोफाइल मामले में दायर याचिका WPCR 221/2026 (अंकित सिंह बनाम अन्य) पर सुनवाई करते हुए माननीय मुख्य न्यायाधीश और जस्टिस रवींद्र अग्रवाल की अध्यक्षता वाली डिवीजन बेंच ने 22 फरवरी को अपना फैसला सुनाया है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि सीजेएम कोर्ट सभी पक्षों को विस्तार से और पूर्ण रूप से सुने, ताकि मामले से जुड़े कोई भी नए तथ्य हों, तो वे पारदर्शी रूप से सामने आ सकें। कोर्ट ने इस पूरी प्रक्रिया और खात्मा रिपोर्ट पर निर्णय लेने के लिए 4 हफ्ते का समय निर्धारित किया है।</p>
<p><strong>पुलिस की कार्यप्रणाली पर उठे गंभीर सवाल</strong></p>
<p>इस पूरे मामले में सबसे चौंकाने वाली बात पुलिस का रवैया है, जो सीधे तौर पर कोर्ट के आदेशों की अवहेलना प्रतीत होता है। दरअसल, 20 फरवरी 2026 को ही सीजेएम कोरबा ने प्रथम श्रेणी मजिस्ट्रेट श्री सत्यानंद प्रसाद द्वारा 10 नवंबर को दिए गए आदेश का हवाला देते हुए पुलिस को 30 दिनों के भीतर अभियोग पत्र (चार्जशीट) पेश करने का निर्देश दिया था। कोर्ट के इस आदेश में स्पष्ट रूप से 7 महत्वपूर्ण बिंदुओं पर जांच करने को कहा गया था। लेकिन, पुलिस ने इन न्यायिक निर्देशों के बिल्कुल विपरीत जाकर मामले में जांच करने के बजाय 'खात्मा' पेश कर दिया, जिससे यह स्पष्ट होता है कि पुलिस द्वारा गंभीरता से जांच नहीं की गई है।</p>
<p><strong>एफआईआर कूट रचना की, जांच जमीन की स्थिति की</strong></p>
<p>कानूनी जानकारों के मुताबिक, यह मामला पुलिसिया जांच की दिशा पर एक बड़ा सवालिया निशान लगाता है। कोतवाली थाना कोरबा में अपराध क्रमांक 1085/20 के तहत जो एफआईआर दर्ज की गई थी, वह मुख्य रूप से 'शासकीय दस्तावेजों में हेरफेर और कूट रचना' (Forgery of Government Documents) की गंभीर धाराओं के तहत थी। कायदे से जांच दस्तावेजों के फर्जीवाड़े, जाली हस्ताक्षरों या छेड़छाड़ पर केंद्रित होनी चाहिए थी। लेकिन इसके ठीक उलट, पुलिस की जांच की दिशा केवल 'जमीन की भौतिक स्थिति' का पता लगाने तक ही सीमित रह गई और मूल अपराध की जांच को दरकिनार कर दिया गया।</p>
<p><strong>अब क्या होगा सीजेएम कोर्ट का अगला कदम?</strong></p>
<p>हाईकोर्ट के आदेश के बाद अब पूरे प्रदेश के लीगल सर्किल की निगाहें कोरबा के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट की अदालत पर टिक गई हैं। अब देखना यह है कि:</p>
<p>  क्या सीजेएम कोर्ट अपने ही 20 फरवरी 2026 के उस आदेश को पलट देगी, जिसमें उन्होंने 30 दिन में चार्जशीट पेश करने को कहा था, और पुलिस की इस खात्मा रिपोर्ट को स्वीकार कर लेगी?</p>
<p> या फिर न्यायालय के आदेश के विपरीत जाकर मनमानी जांच करने और बिना उचित जांच के खात्मा पेश करने के लिए पुलिस अधिकारियों को अवमानना (Contempt of Court) का नोटिस जारी किया जाएगा?</p>
<p>हाईकोर्ट के 4 हफ्ते के अल्टीमेटम के बाद अब गेंद कोरबा सीजेएम कोर्ट के पाले में है। सभी पक्षों को सुनने के बाद जो भी फैसला आएगा, वह इस बहुचर्चित जमीन घोटाले की दिशा तय करेगा।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>कानून</category>
                                            <category>बिलासपुर</category>
                                            <category>छत्तीसगढ़</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 27 Apr 2026 10:12:59 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[मनीशंकर पांडेय]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>कोरबा DMF घोटाले में पूर्व IAS अनिल टुटेजा को हाईकोर्ट से बड़ा झटका, जमानत याचिका खारिज; कोर्ट ने कहा- 'रसूखदार पद पर थे, गवाहों को प्रभावित कर सकते हैं</title>
                                    <description><![CDATA[<p>बिलासपुर।छत्तीसगढ़ के बहुचर्चित कोरबा डिस्ट्रिक्ट मिनरल फंड (DMF) घोटाले में जेल में बंद पूर्व IAS अधिकारी अनिल टुटेजा को बिलासपुर हाईकोर्ट से तगड़ा झटका लगा है। हाईकोर्ट ने उनकी जमानत याचिका को सिरे से खारिज कर दिया है। जस्टिस नरेंद्र कुमार व्यास की सिंगल बेंच ने मामले की सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि एक प्रभावशाली पद पर रहते हुए बड़े पैमाने पर पब्लिक फंड का गबन किया गया है, इसलिए ऐसे मामलों में जमानत नहीं दी जा सकती।</p>
<p>  </p>
<h4>'<strong>सीनियर अफसर थे, गवाहों को कर सकते हैं प्रभावित</strong></h4>
<p>  </p>
<p>  </p>
<p>हाईकोर्ट ने जमानत नामंजूर करते हुए कड़ा रुख अपनाया। कोर्ट ने</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.nationaljagatvision.com/law/big-blow-to-former-ias-anil-tuteja-from-high-court/article-9425"><img src="https://www.nationaljagatvision.com/media/400/2026-04/image_search_1777183657273.jpg" alt=""></a><br /><p>बिलासपुर।छत्तीसगढ़ के बहुचर्चित कोरबा डिस्ट्रिक्ट मिनरल फंड (DMF) घोटाले में जेल में बंद पूर्व IAS अधिकारी अनिल टुटेजा को बिलासपुर हाईकोर्ट से तगड़ा झटका लगा है। हाईकोर्ट ने उनकी जमानत याचिका को सिरे से खारिज कर दिया है। जस्टिस नरेंद्र कुमार व्यास की सिंगल बेंच ने मामले की सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि एक प्रभावशाली पद पर रहते हुए बड़े पैमाने पर पब्लिक फंड का गबन किया गया है, इसलिए ऐसे मामलों में जमानत नहीं दी जा सकती।</p>
<p> </p>
<h4>'<strong>सीनियर अफसर थे, गवाहों को कर सकते हैं प्रभावित</strong></h4>
<p> </p>
<p> </p>
<p>हाईकोर्ट ने जमानत नामंजूर करते हुए कड़ा रुख अपनाया। कोर्ट ने माना कि टुटेजा औद्योगिक विभाग में एक बेहद प्रभावशाली और वरिष्ठ पद (एडिशनल सेक्रेटरी) पर थे। अगर उन्हें जमानत दी जाती है, तो इस बात की पूरी संभावना है कि वे बाहर आकर सबूतों के साथ छेड़छाड़ कर सकते हैं और गवाहों को प्रभावित कर सकते हैं। कोर्ट ने कहा कि उन्होंने सप्लायर्स के साथ मिलकर बड़े पैमाने पर सरकारी पैसे का दुरुपयोग किया है, जिसका सीधा नुकसान आम जनता और समुदाय को हुआ है।</p>
<p> </p>
<p> </p>
<h4><strong>समानता (Parity) की दलील भी नहीं आई काम</strong></h4>
<p> </p>
<p>टुटेजा के वकीलों ने कोर्ट में दलील दी थी कि इस मामले के अन्य सह-आरोपियों को सुप्रीम कोर्ट से जमानत मिल चुकी है, लिहाजा 'पैरिटी' (समानता) के आधार पर उन्हें भी राहत दी जानी चाहिए। कोर्ट ने इस तर्क को खारिज करते हुए केस रिकॉर्ड का हवाला दिया। कोर्ट ने कहा कि आरोपी दीपेश टांक 8 महीने से 1 साल तक, जबकि रानू साहू और सौम्या चौरसिया 2 साल से ज्यादा समय तक जेल में रही हैं। इसके उलट, ईओडब्ल्यू (EOW) और एसीबी (ACB) द्वारा 23 फरवरी 2026 को गिरफ्तार किए गए टुटेजा को जेल में महज दो महीने ही हुए हैं। ऐसे में वे अन्य आरोपियों के साथ समानता का दावा बिल्कुल नहीं कर सकते।</p>
<p> </p>
<h4><strong>16 करोड़ का कमीशन और पीसी एक्ट का शिकंजा</strong></h4>
<p> </p>
<p>फैसले में इस बात का प्रमुखता से जिक्र है कि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम (Prevention of Corruption Act) की धारा 7 और 12 के तहत टुटेजा की संलिप्तता प्रथम दृष्टया साबित होती है। केस डायरी के अनुसार, सतपाल सिंह छाबड़ा को अवैध कमीशन के तौर पर 16 करोड़ रुपये मिले थे, जिसमें से सीधा पेमेंट आवेदक (टुटेजा) को भी किया गया है। कोर्ट ने कहा कि 18 फरवरी 2025 को पुलिस के सामने दिए गए छाबड़ा के बयान की सच्चाई सामने लाने के लिए आरोपी की कस्टडी बेहद जरूरी है।</p>
<p> </p>
<h4><strong>ट्रायल में देरी जमानत का आधार नहीं</strong></h4>
<p> </p>
<p>बचाव पक्ष का यह भी तर्क था कि मामले में दस्तावेजों की भरमार है और कई गवाहों से पूछताछ होनी है, जिससे ट्रायल में लंबा वक्त लगेगा। इस पर जस्टिस व्यास की बेंच ने दो टूक कहा कि केवल ट्रायल में देरी होने से किसी भी आरोपी को जमानत पर रिहा होने का हक नहीं मिल जाता। अदालत को अपराध की गंभीरता और आरोपी की भूमिका देखनी होती है। इन्हीं सख्त टिप्पणियों के साथ अदालत ने जमानत याचिका खारिज कर दी, जिससे फिलहाल पूर्व IAS के जेल से बाहर आने के रास्ते बंद हो गए हैं।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>कानून</category>
                                            <category>बिलासपुर</category>
                                            <category>छत्तीसगढ़</category>
                                    

                <link>https://www.nationaljagatvision.com/law/big-blow-to-former-ias-anil-tuteja-from-high-court/article-9425</link>
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                <pubDate>Sun, 26 Apr 2026 11:38:46 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[मनीशंकर पांडेय]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>BIG BREAKING: मंत्री प्रतिमा बागरी की कुर्सी पर मंडराया खतरा! 'जाति प्रमाण पत्र' विवाद में हाईकोर्ट का बड़ा एक्शन, 60 दिन में जांच के निर्देश</title>
                                    <description><![CDATA[<p>भोपाल। मध्यप्रदेश की सियासत में एक बार फिर बड़ा भूचाल आ गया है। डॉ. मोहन यादव सरकार में नगरीय प्रशासन राज्यमंत्री प्रतिमा बागरी का 'जाति प्रमाण पत्र' विवाद अब तूल पकड़ चुका है। यह मामला सीधे मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की चौखट से होता हुआ अब 'हाई लेवल कास्ट स्क्रूटनी कमेटी' (उच्च स्तरीय जाति छानबीन समिति) के पास पहुंच गया है। हाईकोर्ट ने मामले की गंभीरता को देखते हुए कमेटी को 60 दिन के भीतर जांच कर फाइनल फैसला सुनाने का अल्टीमेटम दिया है। अदालत के इस आदेश के बाद सत्ता के गलियारों में हड़कंप मच गया है, वहीं विपक्ष में बैठी</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.nationaljagatvision.com/law/big-breaking-threat-looms-on-minister-pratima-bagris-chair-high/article-9401"><img src="https://www.nationaljagatvision.com/media/400/2026-04/image_search_1777090005355.jpg" alt=""></a><br /><p>भोपाल। मध्यप्रदेश की सियासत में एक बार फिर बड़ा भूचाल आ गया है। डॉ. मोहन यादव सरकार में नगरीय प्रशासन राज्यमंत्री प्रतिमा बागरी का 'जाति प्रमाण पत्र' विवाद अब तूल पकड़ चुका है। यह मामला सीधे मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की चौखट से होता हुआ अब 'हाई लेवल कास्ट स्क्रूटनी कमेटी' (उच्च स्तरीय जाति छानबीन समिति) के पास पहुंच गया है। हाईकोर्ट ने मामले की गंभीरता को देखते हुए कमेटी को 60 दिन के भीतर जांच कर फाइनल फैसला सुनाने का अल्टीमेटम दिया है। अदालत के इस आदेश के बाद सत्ता के गलियारों में हड़कंप मच गया है, वहीं विपक्ष में बैठी कांग्रेस को सरकार को घेरने के लिए एक बड़ा सियासी हथियार मिल गया है।</p>
<h5><strong>कांग्रेस ने खोला मोर्चा, भोपाल में प्रेस कॉन्फ्रेंस</strong></h5>
<p>इस पूरे विवाद की सियासी आंच को तेज करते हुए मध्यप्रदेश कांग्रेस अनुसूचित जाति (SC) विभाग के प्रदेश अध्यक्ष प्रदीप अहिरवार ने भोपाल स्थित प्रदेश कांग्रेस मुख्यालय (PCC) में एक अहम प्रेस कॉन्फ्रेंस की। अहिरवार ने ही मंत्री बागरी के जाति प्रमाण पत्र पर सवाल उठाते हुए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। उन्होंने मीडिया को बताया कि न्यायपालिका ने उनके द्वारा 31 मार्च 2025 को दिए गए आवेदन को गंभीरता से लिया है और अब राज्यमंत्री को अपनी सच्चाई साबित करनी होगी।</p>
<h5><strong>क्या है मध्यप्रदेश हाईकोर्ट का सख्त निर्देश?</strong></h5>
<p>मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने इस बहुचर्चित मामले की सुनवाई करते हुए सीधे पुलिस या एजेंसी को जांच के आदेश देने के बजाय एक निर्धारित कानूनी प्रक्रिया का पालन करने को कहा है। कोर्ट के प्रमुख निर्देश इस प्रकार हैं:</p>
<p> <strong>स्क्रूटनी कमेटी करेगी जांच: </strong>याचिकाकर्ता प्रदीप अहिरवार की शिकायत के आधार पर हाई लेवल कास्ट स्क्रूटनी कमेटी पूरे मामले की बिंदुवार और निष्पक्ष सुनवाई करेगी।</p>
<p> <strong>60 दिन का अल्टीमेटम: </strong>अदालत ने साफ कर दिया है कि मामले को लटकाया नहीं जा सकता। कमेटी को 60 दिन (दो महीने) के भीतर प्रमाण पत्र की वैधता पर अपना अंतिम निर्णय लेना होगा।</p>
<p> <strong>मंत्री को मिलेगा बचाव का मौका:</strong> कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत के तहत संबंधित पक्ष (प्रतिवादी क्रमांक-3 यानी मंत्री प्रतिमा बागरी) को अपना पक्ष रखने और बचाव का पूरा अवसर दिया जाएगा।</p>
<h5><strong>सरकार ने कोर्ट में क्या कहा?</strong></h5>
<p>सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से पेश हुए शासकीय अधिवक्ता ने हाईकोर्ट को आश्वस्त किया है। उन्होंने कहा कि सक्षम प्राधिकारी (हाई लेवल कमेटी) पूरी तरह से नियमों के तहत काम करेगी। यदि पहले इस शिकायत पर कोई निर्णय नहीं लिया गया है, तो अब तय समय-सीमा में जांच कर फैसला लिया जाएगा और इसकी आधिकारिक सूचना याचिकाकर्ता को भी दी जाएगी।</p>
<p><strong>सियासी मायने</strong>: नगरीय प्रशासन राज्यमंत्री प्रतिमा बागरी विंध्य क्षेत्र का एक उभरता हुआ दलित चेहरा हैं। ऐसे में अगर हाई लेवल कमेटी की जांच में उनका जाति प्रमाण पत्र किसी भी स्तर पर त्रुटिपूर्ण या अवैध पाया जाता है, तो न सिर्फ उन्हें मंत्री पद से हाथ धोना पड़ सकता है, बल्कि उनकी विधायकी पर भी तलवार लटक सकती है। फिलहाल, अगले 60 दिन मध्यप्रदेश की सियासत के लिए बेहद दिलचस्प और उथल-पुथल वाले साबित हो<span style="font-family:'-apple-system', BlinkMacSystemFont, 'Segoe UI', Roboto, 'Helvetica Neue', Arial, 'Noto Sans', sans-serif, 'Apple Color Emoji', 'Segoe UI Emoji', 'Segoe UI Symbol', 'Noto Color Emoji';font-size:16px;">ने वाले हैं।</span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राष्ट्रीय</category>
                                            <category>कानून</category>
                                            <category>राजनीति</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 25 Apr 2026 09:38:34 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[मनीशंकर पांडेय]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>NJV EXCLUSIVE: पूर्व ACB/EOW चीफ शेख आरिफ पर लटकी जांच की तलवार, सौम्या और टुटेजा की शिकायतें दबाने व फाइलें गायब करने का सनसनीखेज आरोप</title>
                                    <description><![CDATA[<p>रायपुर: छत्तीसगढ़ की ब्यूरोक्रेसी और सत्ता के गलियारों में एक बार फिर बड़ा हड़कंप मचने के आसार हैं। पूर्ववर्ती सरकार में ताकतवर रहे 2005 बैच के आईपीएस अधिकारी और तत्कालीन ईओडब्ल्यू/एसीबी (EOW/ACB) चीफ शेख हुसैन आरिफ के खिलाफ एक बेहद गंभीर शिकायत राज्य के मुख्य सचिव विकास शील को सौंपी गई है।</p>
<p>महानदी भवन पहुंची इस शिकायत में सनसनीखेज आरोप लगाया गया है कि आरिफ ने अपने कार्यकाल के दौरान शराब घोटाले के कथित सूत्रधार अनिल टुटेजा और कोयला लेवी घोटाले में फंसी तत्कालीन उप सचिव सौम्या चौरसिया को बचाने के लिए न सिर्फ भ्रष्टाचार की अहम शिकायतों को दबाया,</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.nationaljagatvision.com/crime/njv-exclusive-the-sword-of-investigation-hangs-on-former-acbeow/article-9389"><img src="https://www.nationaljagatvision.com/media/400/2026-04/20260424_163310.jpg" alt=""></a><br /><p>रायपुर: छत्तीसगढ़ की ब्यूरोक्रेसी और सत्ता के गलियारों में एक बार फिर बड़ा हड़कंप मचने के आसार हैं। पूर्ववर्ती सरकार में ताकतवर रहे 2005 बैच के आईपीएस अधिकारी और तत्कालीन ईओडब्ल्यू/एसीबी (EOW/ACB) चीफ शेख हुसैन आरिफ के खिलाफ एक बेहद गंभीर शिकायत राज्य के मुख्य सचिव विकास शील को सौंपी गई है।</p>
<p>महानदी भवन पहुंची इस शिकायत में सनसनीखेज आरोप लगाया गया है कि आरिफ ने अपने कार्यकाल के दौरान शराब घोटाले के कथित सूत्रधार अनिल टुटेजा और कोयला लेवी घोटाले में फंसी तत्कालीन उप सचिव सौम्या चौरसिया को बचाने के लिए न सिर्फ भ्रष्टाचार की अहम शिकायतों को दबाया, बल्कि सरकारी फाइलों और रिकॉर्ड्स को ही नष्ट करवा दिया। एक जागरूक नागरिक और अधिवक्ता नरेश चंद्र गुप्ता ने मुख्य सचिव को विस्तृत याचिका सौंपते हुए इस पूरे मामले की स्वतंत्र एजेंसी से निष्पक्ष जांच की मांग की है।</p>
<p> </p>
<h5><strong>रसूखदारों को संरक्षण देने का गंभीर आरोप</strong></h5>
<p> </p>
<p>याचिका में आरोप लगाया गया है कि आईपीएस शेख हुसैन आरिफ जब एसीबी/ईओडब्ल्यू के निदेशक और रायपुर के एसएसपी/आईजी का अतिरिक्त प्रभार संभाल रहे थे, तब एजेंसी अपने मूल उद्देश्य (भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने) से पूरी तरह भटक गई थी। अधिवक्ता का दावा है कि इस दौरान संस्था की कार्यप्रणाली का उपयोग महादेव सट्टा ऐप, कोयला और शराब घोटाले के प्रभावशाली आरोपियों को संरक्षण देने के लिए किया गया।</p>
<p>यह बात सार्वजनिक है कि आरिफ महादेव ऐप घोटाले के संदर्भ में केंद्रीय जांच एजेंसियों (विशेषकर सीबीआई) के राडार पर हैं। याचिका में अनिल टुटेजा और सौम्या चौरसिया जैसे प्रमुख आरोपियों से उनके कथित करीबी संबंधों का हवाला देते हुए उनके नेतृत्व में हुई जांच की निष्पक्षता और पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े किए गए हैं।</p>
<p> </p>
<h5><strong>साल 2020 की इन अहम शिकायतों की फाइलें गायब!</strong></h5>
<p> </p>
<p>मुख्य सचिव को दी गई शिकायत में स्पष्ट उल्लेख है कि साल 2020 में इन रसूखदारों के खिलाफ पुख्ता शिकायतें एसीबी में दर्ज कराई गई थीं। कार्रवाई करना तो दूर, जानबूझकर इन फाइलों को ही कथित रूप से अवैध तरीके से नष्ट कर दिया गया। जिन शिकायतों को दबाने का आरोप है, वे इस प्रकार हैं:</p>
<p> <strong>सौम्या चौरसिया</strong> (तत्कालीन उप सचिव) 4 जुलाई 2020 को भूमि विचलन (लैंड डायवर्सन) से जुड़े प्रशासनिक निर्णयों में भारी भ्रष्टाचार की शिकायत की गई थी।</p>
<p> <strong>अनिल टुटेजा</strong> (तत्कालीन संयुक्त सचिव, उद्योग)11 मई 2020 को वीज़ा प्राप्ति के लिए कथित रूप से गलत घोषणाएं और भ्रामक जानकारी देने के मामले में शिकायत दर्ज कराई गई थी।</p>
<p> पुलिस कर्मियों पर आरोप 29 मई 2020 को महादेव सट्टा ऐप घोटाले से जुड़े संदिग्धों के साथ मनी लॉन्ड्रिंग (धन शोधन) में संलिप्तता की शिकायत की गई थी।</p>
<p>शिकायतकर्ता ने स्पष्ट किया है कि सरकारी अभिलेखों का विनाश और दमन केवल कदाचार नहीं है, बल्कि यह पद का घोर दुरुपयोग और न्याय प्रक्रिया में सीधे तौर पर बाधा डालने वाला गंभीर आपराधिक कृत्य है।</p>
<h5><strong>मुख्य सचिव से की गई ये प्रमुख मांगें:</strong></h5>
<p> </p>
<p>अधिवक्ता गुप्ता ने मुख्य सचिव से इस मामले में त्वरित और सख्त कार्रवाई की अपील करते हुए निम्नलिखित मांगें रखी हैं:</p>
<p> <strong>1.स्वतंत्र जांच</strong>: तत्कालीन एसीबी चीफ शेख हुसैन आरिफ की कार्यप्रणाली, शिकायतों को दबाने और भ्रष्टाचार के आरोपियों को संरक्षण देने में उनकी भूमिका की किसी स्वतंत्र एजेंसी या विशेष समिति से जांच कराई जाए।</p>
<p> </p>
<p><strong> 2.दोषियों पर FIR: </strong>जिन अधिकारियों ने लापरवाही बरतते हुए या जानबूझकर इन अहम फाइलों को नष्ट किया है, उनके खिलाफ तत्काल विभागीय और आपराधिक कार्रवाई शुरू की जाए।</p>
<p> </p>
<p> <strong>3.रिकॉर्ड का पुनर्निर्माण</strong>: नष्ट की गई फाइलों और अभिलेखों को जहां तक संभव हो फिर से तैयार (Reconstruct) किया जाए ताकि लंबित मामलों की जांच पूरी हो सके।</p>
<p> </p>
<p><strong> 4.संस्थागत सुधार:</strong>भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए कड़े संस्थागत कदम उठाए जाएं।</p>
<p> </p>
<h5><strong>बढ़ सकती हैं आरिफ की मुश्किलें</strong></h5>
<p> </p>
<p>छत्तीसगढ़ में सत्ता परिवर्तन के बाद से ही पिछली सरकार के चहेते अफसर लगातार जांच एजेंसियों के निशाने पर हैं। अब मुख्य सचिव के पास सीधे तौर पर पहुंची इस शिकायत ने तत्कालीन एसीबी चीफ की कार्यप्रणाली को कटघरे में खड़ा कर दिया है। मंत्रालय सूत्रों की मानें तो यदि मुख्य सचिव विकास शील इस मामले में जांच के आदेश देते हैं, तो आईपीएस आरिफ समेत कई तत्कालीन अधिकारियों की मुश्किलें बढ़नी तय हैं। ब्यूरोक्रेसी की नजरें अब महानदी भवन के अगले कदम पर टिकी हुई हैं।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>अपराध</category>
                                            <category>कानून</category>
                                            <category>छत्तीसगढ़</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 24 Apr 2026 16:34:03 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[मनीशंकर पांडेय]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>जग्गी हत्याकांड: अमित जोगी को सुप्रीम संजीवनी, हाईकोर्ट के फैसले पर लगी रोक, गिरफ्तारी भी टली</title>
                                    <description><![CDATA[<p>रायपुर (NJV Desk) छत्तीसगढ़ के सियासी इतिहास के सबसे चर्चित और हाई-प्रोफाइल रामअवतार जग्गी हत्याकांड (Jaggi Murder Case) में एक बार फिर बड़ा ट्विस्ट आ गया है। इस मामले में आजीवन कारावास की सजा का सामना कर रहे पूर्व मुख्यमंत्री स्वर्गीय अजीत जोगी के बेटे अमित जोगी को देश की सर्वोच्च अदालत (Supreme Court) से एक बड़ी संजीवनी मिली है। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट द्वारा सुनाई गई उम्रकैद की सजा और सरेंडर के सख्त फरमान पर सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल 'ब्रेक' लगा दिया है। यानी, अमित जोगी की गिरफ्तारी और जेल जाने के संकट पर फौरी तौर पर विराम लग गया है।</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.nationaljagatvision.com/law/jaggi-murder-case-amit-jogi-banned-due-to-supreme-sanjeevani/article-9358"><img src="https://www.nationaljagatvision.com/media/400/2026-04/file_00000000fc5871fa875ff70c58bc728d.png" alt=""></a><br /><p>रायपुर (NJV Desk) छत्तीसगढ़ के सियासी इतिहास के सबसे चर्चित और हाई-प्रोफाइल रामअवतार जग्गी हत्याकांड (Jaggi Murder Case) में एक बार फिर बड़ा ट्विस्ट आ गया है। इस मामले में आजीवन कारावास की सजा का सामना कर रहे पूर्व मुख्यमंत्री स्वर्गीय अजीत जोगी के बेटे अमित जोगी को देश की सर्वोच्च अदालत (Supreme Court) से एक बड़ी संजीवनी मिली है। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट द्वारा सुनाई गई उम्रकैद की सजा और सरेंडर के सख्त फरमान पर सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल 'ब्रेक' लगा दिया है। यानी, अमित जोगी की गिरफ्तारी और जेल जाने के संकट पर फौरी तौर पर विराम लग गया है।</p>
<p>इस नए घटनाक्रम ने राज्य की राजनीति में अचानक सरगर्मी बढ़ा दी है। हाईकोर्ट के फैसले के बाद बैकफुट पर आई जोगी कांग्रेस (JCC-J) और अमित जोगी के समर्थकों को इस अंतरिम राहत से एक बड़ा संबल मिला है।</p>
<h5><strong>सुप्रीम कोर्ट का कड़ा रुख, CBI से मांगा जवाब</strong></h5>
<p>हाईकोर्ट ने 6 अप्रैल को जो फैसला सुनाया था, वह जोगी परिवार के लिए किसी सियासी और कानूनी भूकंप से कम नहीं था। कोर्ट ने अमित जोगी को 3 हफ्ते के भीतर सरेंडर करने का अल्टीमेटम दिया था। समय तेजी से बीत रहा था और गिरफ्तारी की तलवार लटक रही थी। इसी बीच अमित जोगी ने देश की सबसे बड़ी अदालत का रुख किया।</p>
<p>सुप्रीम कोर्ट ने मामले की गंभीरता और साक्ष्यों की कड़ियों का संज्ञान लेते हुए जोगी को अंतरिम राहत प्रदान की। इसके साथ ही, कोर्ट ने देश की प्रमुख जांच एजेंसी CBI को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है। जोगी के वकीलों ने सुप्रीम कोर्ट में मजबूत दलील पेश करते हुए कहा कि उनके मुवक्किल के खिलाफ हत्या की साजिश में शामिल होने के कोई पुख्ता और सीधे साक्ष्य मौजूद नहीं हैं।</p>
<p>अमित जोगी की ओर से मुख्य रूप से दो आदेशों को चुनौती दी गई थी। पहला, जिसमें CBI को इस मामले में हाईकोर्ट में अपील करने की विशेष अनुमति दी गई थी और दूसरा, हाईकोर्ट का वह हालिया आदेश जिसमें उन्हें हत्या (IPC की धारा 302) और आपराधिक साजिश (120-बी) का दोषी ठहराया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने अब इन दोनों ही अपीलों को एक साथ (क्लब) कर लिया है और अगली सुनवाई तक सरेंडर के आदेश पर पूरी तरह स्टे लगा दिया है।</p>
<p>इस पूरी कानूनी जंग की जड़ें 21 साल पुरानी हैं। 4 जून 2003 की रात राजधानी रायपुर में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) के कद्दावर नेता रामअवतार जग्गी की सरेआम गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। चुनावी साल में हुए इस हत्याकांड ने नवगठित राज्य छत्तीसगढ़ की राजनीति में भूचाल ला दिया था।</p>
<p>मामले की जांच जब आगे बढ़ी, तो इसकी आंच सीधे तत्कालीन मुख्यमंत्री अजीत जोगी के निवास तक पहुंची और उनके बेटे अमित जोगी को मुख्य आरोपियों में शामिल किया गया। कानूनी दांव-पेंच के इस लंबे सफर में शुरुआत में निचली अदालत (ट्रायल कोर्ट) ने साक्ष्यों के अभाव का हवाला देते हुए अमित जोगी को बरी कर दिया था।</p>
<h5><strong>सियासी गलियारों में हलचल तेज</strong></h5>
<p>निचली अदालत के फैसले के खिलाफ CBI और जग्गी परिवार ने लंबी लड़ाई लड़ी, जिसका नतीजा 6 अप्रैल को हाईकोर्ट के फैसले के रूप में दिखा, जब कोर्ट ने अमित जोगी को दोषी मानते हुए उम्रकैद की सजा सुना दी। लेकिन अब सुप्रीम कोर्ट के 'स्टे ऑर्डर' ने पूरी कहानी का रुख फिर मोड़ दिया है।</p>
<p>छत्तीसगढ़ की सियासत में इस आदेश के दूरगामी मायने निकाले जा रहे हैं। एक तरफ जोगी समर्थकों में जश्न और राहत की लहर है, तो दूसरी तरफ सत्ताधारी दल और विपक्ष की निगाहें इस बात पर टिक गई हैं कि अब CBI सुप्रीम कोर्ट में अपना क्या बचाव पेश करती है। फिलहाल के लिए अमित जोगी ने गिरफ्तारी के फंदे को टाल दिया है, लेकिन असल कानूनी 'क्लाइमेक्स' अब सुप्रीम कोर्ट के अंतिम फैसले से ही तय होगा।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>कानून</category>
                                            <category>बिलासपुर</category>
                                            <category>छत्तीसगढ़</category>
                                            <category>राजनीति</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 23 Apr 2026 12:57:40 +0530</pubDate>
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