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                <title>धर्म कला संस्कृति - National Jagat Vision</title>
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                <description>धर्म कला संस्कृति RSS Feed</description>
                
                            <item>
                <title>Guru-Chandra Navpancham Yog 2026: 16 सितंबर को गुरु-चंद्रमा बनाएंगे नवपंचम योग, इन 4 राशियों के लिए शुभ संकेत</title>
                                    <description><![CDATA[<p><strong>Moon and Jupiter Conjunction 2026:</strong> वैदिक ज्योतिष में ग्रहों की स्थिति, राशि परिवर्तन और उनके बीच बनने वाले संबंधों को विशेष महत्व दिया जाता है। मान्यता है कि जब दो ग्रह एक-दूसरे के साथ विशेष कोणीय संबंध बनाते हैं, तो उससे बनने वाला योग कुछ राशियों के लिए सकारात्मक परिणाम लेकर आ सकता है।</p>
<p>सितंबर 2026 के मध्य में गुरु और चंद्रमा की स्थिति से ऐसा ही एक ज्योतिषीय संयोग बनने की बात कही जा रही है। 16 सितंबर को गुरु-चंद्रमा के बीच नवपंचम योग बनने की मान्यता है। ज्योतिषीय दृष्टि से इसे शुभ योगों में गिना जाता है और</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.nationaljagatvision.com/ritual-culture/guru-chandra-navpancham-yog-2026-guru-chandra-will-create-navpancham-yog-on/article-12474"><img src="https://www.nationaljagatvision.com/media/400/2026-09/navpancham-yoga.webp" alt=""></a><br /><p><strong>Moon and Jupiter Conjunction 2026:</strong> वैदिक ज्योतिष में ग्रहों की स्थिति, राशि परिवर्तन और उनके बीच बनने वाले संबंधों को विशेष महत्व दिया जाता है। मान्यता है कि जब दो ग्रह एक-दूसरे के साथ विशेष कोणीय संबंध बनाते हैं, तो उससे बनने वाला योग कुछ राशियों के लिए सकारात्मक परिणाम लेकर आ सकता है।</p>
<p>सितंबर 2026 के मध्य में गुरु और चंद्रमा की स्थिति से ऐसा ही एक ज्योतिषीय संयोग बनने की बात कही जा रही है। 16 सितंबर को गुरु-चंद्रमा के बीच नवपंचम योग बनने की मान्यता है। ज्योतिषीय दृष्टि से इसे शुभ योगों में गिना जाता है और माना जाता है कि इसका प्रभाव कुछ राशियों के करियर, धन और भाग्य से जुड़े मामलों पर देखने को मिल सकता है।</p>
<p><strong>क्या होता है नवपंचम योग?</strong><br />वैदिक ज्योतिष में नवपंचम योग का संबंध दो ग्रहों की ऐसी स्थिति से माना जाता है, जिसमें उनके बीच पांचवें और नौवें भाव जैसा संबंध बनता है। इसे ज्योतिष में 5-9 संबंध भी कहा जाता है। ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार पंचम भाव बुद्धि, शिक्षा, संतान, रचनात्मकता और प्रेम से जुड़ा माना जाता है, जबकि नवम भाव भाग्य, धर्म, उच्च शिक्षा और जीवन में मिलने वाले अवसरों का प्रतिनिधित्व करता है। इसलिए इन दोनों भावों से संबंधित ग्रहों का शुभ संबंध सकारात्मक परिणाम देने वाला माना जाता है।</p>
<p><strong>गुरु-चंद्रमा का संबंध क्यों माना जाता है खास?</strong><br />ज्योतिष में गुरु को ज्ञान, विस्तार, शिक्षा, समृद्धि और शुभता से जोड़कर देखा जाता है। वहीं चंद्रमा मन, भावनाओं, मानसिक स्थिति और संवेदनशीलता का प्रतिनिधित्व करता है। जब इन दोनों ग्रहों के बीच शुभ संबंध बनने की बात कही जाती है, तो ज्योतिषीय मान्यता के अनुसार व्यक्ति की सोच, निर्णय क्षमता, ज्ञान और भाग्य से जुड़े क्षेत्रों में सकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।</p>
<p><strong>धन और करियर में मिल सकते हैं नए अवसर</strong><br />नवपंचम योग को लेकर मान्यता है कि इसके प्रभाव से कुछ लोगों के लिए आर्थिक और पेशेवर जीवन में नए रास्ते खुल सकते हैं। नौकरी में बदलाव, नई जिम्मेदारी, व्यापार में अवसर या किसी पुराने काम के पूरा होने जैसी स्थितियां बन सकती हैं। हालांकि, ज्योतिषीय योग को निश्चित आर्थिक लाभ की गारंटी नहीं माना जा सकता। वास्तविक परिणाम व्यक्ति की पूरी जन्मकुंडली और अन्य ग्रह स्थितियों पर भी निर्भर माने जाते हैं।</p>
<p><strong>इन 4 राशियों के लिए शुभ माना जा रहा है नवपंचम योग</strong></p>
<p><strong>मेष राशि</strong><br />मेष राशि के जातकों के लिए यह योग भाग्य से जुड़े मामलों में सकारात्मक संकेत देने वाला माना जा रहा है। लंबे समय से अटके कामों में गति आने की उम्मीद की जा सकती है। नौकरी या व्यवसाय में नए अवसर मिलने के साथ किसी महत्वपूर्ण योजना पर आगे बढ़ने का मौका मिल सकता है।</p>
<p><strong>मिथुन राशि</strong><br />मिथुन राशि वालों के लिए गुरु-चंद्रमा का यह संबंध निर्णय क्षमता और कामकाज से जुड़े मामलों में अनुकूल माना जा रहा है। करियर में नई जिम्मेदारी या बेहतर अवसर मिल सकते हैं। आर्थिक मामलों में भी सुधार की संभावना बताई जा रही है, हालांकि खर्चों पर नियंत्रण रखना जरूरी रहेगा।</p>
<p><strong>तुला राशि</strong><br />तुला राशि के जातकों के लिए यह समय करियर और प्रतिष्ठा के लिहाज से महत्वपूर्ण हो सकता है। कार्यक्षेत्र में पहचान बढ़ने या कोई नई जिम्मेदारी मिलने की संभावना मानी जा रही है। अचानक मिलने वाला कोई अवसर भविष्य में लाभ का कारण बन सकता है।</p>
<p><strong>धनु राशि</strong><br />धनु राशि के स्वामी स्वयं गुरु माने जाते हैं, इसलिए इस राशि के लिए गुरु से जुड़े ज्योतिषीय संयोग को विशेष महत्व दिया जाता है। नवपंचम योग के दौरान उच्च शिक्षा, करियर या किसी नए प्रोजेक्ट से जुड़े अवसर मिलने की संभावना बताई जा रही है। आर्थिक मामलों में भी सकारात्मक बदलाव की उम्मीद की जा सकती है।</p>
<p><strong>क्या सभी लोगों पर एक जैसा होगा असर?</strong><br />ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार किसी भी ग्रह योग का प्रभाव सभी जातकों पर समान नहीं होता। जन्मकुंडली में ग्रहों की स्थिति, दशा-अंतर्दशा और संबंधित भावों को देखकर ही किसी व्यक्ति के लिए विस्तृत फलादेश किया जाता है। इसलिए केवल अपनी राशि देखकर किसी बड़े आर्थिक, करियर या वैवाहिक फैसले पर पहुंचना उचित नहीं माना जाना चाहिए।</p>
<p>16 सितंबर 2026 को गुरु और चंद्रमा से बनने वाले नवपंचम योग को ज्योतिषीय परंपराओं में शुभ माना जा रहा है। मेष, मिथुन, तुला और धनु राशि के जातकों के लिए इसे विशेष रूप से अनुकूल बताया जा रहा है। इन राशियों के लिए करियर, धन, शिक्षा और नए अवसरों से जुड़े सकारात्मक संकेत मिलने की मान्यता है।</p>
<p><strong>डिस्क्लेमर: इस लेख में दी गई जानकारी वैदिक ज्योतिष की मान्यताओं और सामान्य ज्योतिषीय गणनाओं पर आधारित है। ग्रहों की स्थिति का वास्तविक प्रभाव वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित नहीं है और अलग-अलग ज्योतिषीय परंपराओं में व्याख्या भिन्न हो सकती है। किसी महत्वपूर्ण जीवन या आर्थिक निर्णय के लिए केवल इस फलादेश पर निर्भर न रहें। नेशनल जगत विजन इन मान्यताओं की पुष्टि नहीं करता है।</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>धर्म कला संस्कृति</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 15 Sep 2026 09:12:52 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[अदिती मजुमदार ]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>Name Plate Vastu: लकड़ी, मेटल या पत्थर… घर के मुख्य द्वार पर कौन सी नेम प्लेट लगाना माना जाता है शुभ?</title>
                                    <description><![CDATA[<p><strong>Name Plate Vastu: </strong>घर की खूबसूरती में मुख्य दरवाजे का अहम योगदान होता है। यही वजह है कि लोग दरवाजे के रंग, सजावट और डिजाइन के साथ-साथ नेम प्लेट पर भी खास ध्यान देते हैं। वास्तु शास्त्र में मुख्य द्वार को महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है और इससे जुड़ी कई चीजों को शुभ-अशुभ मान्यताओं से जोड़कर देखा जाता है।</p>
<p>अगर आप भी अपने घर के दरवाजे पर नई नेम प्लेट लगवाने की तैयारी कर रहे हैं, तो उसके मटेरियल, रंग, आकार और दिशा को लेकर कई सवाल मन में आ सकते हैं। लकड़ी, मेटल और पत्थर तीनों तरह की नेम</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.nationaljagatvision.com/ritual-culture/name-plate-vastu-wood-metal-or-stone%E2%80%A6-which-name-plate/article-12439"><img src="https://www.nationaljagatvision.com/media/400/2026-09/name-plate.webp" alt=""></a><br /><p><strong>Name Plate Vastu: </strong>घर की खूबसूरती में मुख्य दरवाजे का अहम योगदान होता है। यही वजह है कि लोग दरवाजे के रंग, सजावट और डिजाइन के साथ-साथ नेम प्लेट पर भी खास ध्यान देते हैं। वास्तु शास्त्र में मुख्य द्वार को महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है और इससे जुड़ी कई चीजों को शुभ-अशुभ मान्यताओं से जोड़कर देखा जाता है।</p>
<p>अगर आप भी अपने घर के दरवाजे पर नई नेम प्लेट लगवाने की तैयारी कर रहे हैं, तो उसके मटेरियल, रंग, आकार और दिशा को लेकर कई सवाल मन में आ सकते हैं। लकड़ी, मेटल और पत्थर तीनों तरह की नेम प्लेट बाजार में आसानी से मिल जाती हैं। वास्तु की मान्यताओं के अनुसार इनका चुनाव घर के मुख्य द्वार की दिशा और वहां के तत्वों को ध्यान में रखकर किया जा सकता है।</p>
<p><strong>लकड़ी की नेम प्लेट क्यों मानी जाती है शुभ?</strong><br />वास्तु की मान्यताओं में लकड़ी को प्राकृतिक तत्व से जुड़ा हुआ माना जाता है। इसी कारण लकड़ी की नेम प्लेट को कई लोग घर के मुख्य द्वार के लिए सकारात्मक विकल्प मानते हैं। लकड़ी की नेम प्लेट घर के प्रवेश द्वार को गर्मजोशी और प्राकृतिक लुक भी देती है। वास्तु मान्यताओं को मानने वाले लोग इसे विशेष रूप से कुछ दिशाओं के साथ अनुकूल मानते हैं। हालांकि, केवल लकड़ी की नेम प्लेट लगा देने से किसी तरह का निश्चित वास्तु लाभ होता है, इसका वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है।</p>
<p><strong>मेटल की नेम प्लेट कब चुनें?</strong><br />मेटल यानी धातु से बनी नेम प्लेट मजबूत और टिकाऊ होने के साथ आधुनिक लुक भी देती है। वास्तु परंपराओं में धातु को भी विशेष महत्व दिया जाता है, लेकिन अलग-अलग दिशाओं के लिए अलग धातु या रंग को अनुकूल माना जा सकता है। इसलिए अगर आप मेटल नेम प्लेट लगाना चाहते हैं तो केवल डिजाइन पसंद आने के आधार पर फैसला लेने के बजाय मुख्य द्वार की दिशा और अपनी वास्तु मान्यता को ध्यान में रख सकते हैं।</p>
<p><strong>पत्थर की नेम प्लेट कैसी मानी जाती है?</strong><br />पत्थर को आमतौर पर मजबूती और स्थायित्व का प्रतीक माना जाता है। इसी वजह से पत्थर से बनी नेम प्लेट भी कई घरों के मुख्य द्वार पर देखने को मिलती है। वास्तु मान्यताओं में पत्थर को स्थिरता से जोड़कर देखा जाता है। अगर आप पत्थर की नेम प्लेट चुन रहे हैं, तो उसका रंग, आकार और वजन जरूर देखें। मुख्य दरवाजे के लिए बहुत भारी या जरूरत से ज्यादा बड़ी प्लेट चुनने के बजाय दरवाजे के आकार के अनुरूप डिजाइन बेहतर रहेगा।</p>
<p><strong>नेम प्लेट लगाते समय दिशा का रखें ध्यान</strong><br />वास्तु के अनुसार नेम प्लेट के मटेरियल से ज्यादा महत्वपूर्ण मुख्य द्वार की दिशा को भी माना जाता है। अलग-अलग दिशाओं के लिए अलग रंग और सामग्री को अनुकूल माना जाता है। नेम प्लेट ऐसी जगह लगाना बेहतर है जहां वह आसानी से दिखाई दे। उस पर नाम साफ और स्पष्ट लिखा होना चाहिए। बहुत नीचे, अत्यधिक ऊंचाई पर या ऐसी जगह लगाने से बचें जहां नाम पढ़ना मुश्किल हो।</p>
<p><strong>रंग और डिजाइन का भी है महत्व</strong><br />नेम प्लेट खरीदते समय सिर्फ मटेरियल पर ध्यान देना पर्याप्त नहीं है। उसका रंग और डिजाइन भी घर के मुख्य द्वार के साथ मेल खाना चाहिए। वास्तु मान्यताओं में अलग-अलग दिशाओं के लिए अलग रंगों को शुभ माना जाता है। इसलिए वास्तु का पालन करने वाले लोग दरवाजे की दिशा के अनुसार नेम प्लेट का रंग चुनते हैं। इसके अलावा नेम प्लेट को हमेशा साफ-सुथरा और अच्छी स्थिति में रखना चाहिए। टूटी हुई, जंग लगी या धुंधली नेम प्लेट घर के प्रवेश द्वार की खूबसूरती खराब कर सकती है।</p>
<p><strong>लकड़ी, मेटल या पत्थर, कौन सी सबसे शुभ?</strong><br />वास्तु की मान्यताओं के अनुसार हर घर के लिए एक ही मटेरियल को सबसे शुभ नहीं माना जा सकता। नेम प्लेट का चुनाव मुख्य द्वार की दिशा, रंग, डिजाइन और घर की अन्य वास्तु मान्यताओं को ध्यान में रखकर किया जाता है। अगर आप सिर्फ सुंदरता और टिकाऊपन के आधार पर चुनाव कर रहे हैं तो मौसम, रखरखाव और दरवाजे के डिजाइन को भी ध्यान में रखें। वहीं वास्तु को महत्व देने वाले लोग दिशा और मटेरियल के पारंपरिक संबंधों को ध्यान में रख सकते हैं।</p>
<p><strong>छोटी-सी बात, जो नेम प्लेट को बनाएगी बेहतर</strong><br />नेम प्लेट चाहे लकड़ी की हो, मेटल की या पत्थर की, उसका नाम स्पष्ट होना, प्लेट का साफ रहना और दरवाजे के डिजाइन के साथ उसका संतुलित दिखना सबसे जरूरी है। वास्तु संबंधी मान्यताओं को अपनाते समय इन्हें परंपरागत विश्वास के रूप में ही देखना चाहिए।</p>
<p><strong>डिस्क्लेमर: इस खबर में दी गई जानकारी वास्तु शास्त्र की प्रचलित मान्यताओं और सामान्य जानकारी पर आधारित है। वास्तु से जुड़े दावों का कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। अलग-अलग वास्तु परंपराओं में नियम और मान्यताएं भिन्न हो सकती हैं। नेशनल जगत विजन इन मान्यताओं की पुष्टि नहीं करता है।</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>धर्म कला संस्कृति</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 14 Sep 2026 09:06:41 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[अदिती मजुमदार ]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>Hartalika Teej 2026: पहली बार रख रही हैं हरतालिका तीज का व्रत? सुबह की तैयारी से पारण तक जानें पूरा रूटीन</title>
                                    <description><![CDATA[<p><strong>Hartalika Teej 2026: </strong>हरतालिका तीज हिंदू धर्म में महिलाओं के प्रमुख व्रतों में से एक मानी जाती है। सुहागिन महिलाएं इस दिन भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा कर पति की दीर्घायु, दांपत्य जीवन में सुख-शांति और परिवार की समृद्धि की कामना करती हैं। वहीं कई अविवाहित महिलाएं भी मनचाहा जीवनसाथी पाने की कामना से यह व्रत रखती हैं।</p>
<p>हरतालिका तीज का व्रत कठिन व्रतों में गिना जाता है। कई परंपराओं में इस दिन निर्जला व्रत रखने की मान्यता है, यानी अन्न और जल दोनों का त्याग किया जाता है। ऐसे में पहली बार व्रत रखने वाली महिलाओं के</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.nationaljagatvision.com/ritual-culture/hartalika-teej-2026-hartalika-is-observing-fast-for-the-first/article-12417"><img src="https://www.nationaljagatvision.com/media/400/2026-09/hartalika-teej-2026-4.webp" alt=""></a><br /><p><strong>Hartalika Teej 2026: </strong>हरतालिका तीज हिंदू धर्म में महिलाओं के प्रमुख व्रतों में से एक मानी जाती है। सुहागिन महिलाएं इस दिन भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा कर पति की दीर्घायु, दांपत्य जीवन में सुख-शांति और परिवार की समृद्धि की कामना करती हैं। वहीं कई अविवाहित महिलाएं भी मनचाहा जीवनसाथी पाने की कामना से यह व्रत रखती हैं।</p>
<p>हरतालिका तीज का व्रत कठिन व्रतों में गिना जाता है। कई परंपराओं में इस दिन निर्जला व्रत रखने की मान्यता है, यानी अन्न और जल दोनों का त्याग किया जाता है। ऐसे में पहली बार व्रत रखने वाली महिलाओं के लिए यह जानना जरूरी हो जाता है कि दिन की शुरुआत कैसे करें, पूजा की तैयारी कब पूरी करें और अगले दिन व्रत किस तरह खोलें।</p>
<p><strong>कब रखा जाएगा हरतालिका तीज का व्रत 2026?</strong><br />पंचांग के अनुसार, भाद्रपद शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि 13 सितंबर 2026 को सुबह 7:08 बजे शुरू होगी और 14 सितंबर 2026 को सुबह 7:06 बजे समाप्त होगी। उदया तिथि के आधार पर हरतालिका तीज का व्रत 14 सितंबर 2026, सोमवार को रखा जाएगा। हालांकि, पूजा और पारण के समय में स्थानीय पंचांग तथा स्थान के अनुसार थोड़ा अंतर हो सकता है। इसलिए अपने शहर के पंचांग के अनुसार समय की पुष्टि करना उचित रहेगा।</p>
<p><strong>सुबह उठकर सबसे पहले क्या करें?</strong><br />व्रत वाले दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और स्वच्छ कपड़े पहनें। इसके बाद पूजा स्थल की साफ-सफाई कर भगवान शिव और माता पार्वती का ध्यान करें।परंपरा के अनुसार इसके बाद व्रत का संकल्प लिया जाता है। कुछ क्षेत्रों और परिवारों में व्रत से पहले सरगी या फलाहार करने की परंपरा भी है। यदि आपके परिवार में ऐसी परंपरा है, तो सूर्योदय से पहले अपनी सेहत और क्षमता के अनुसार भोजन या फलाहार किया जा सकता है। इसके बाद व्रत शुरू करें और दिनभर अपनी धार्मिक परंपरा के अनुसार पूजा-पाठ करें।</p>
<p><strong>दिनभर कैसे रखें खुद का ध्यान?</strong><br />संकल्प लेने के बाद महिलाएं भगवान शिव और माता पार्वती का स्मरण करती हैं। घर में पूजा की सभी तैयारियां दिन में ही पूरी कर लेना बेहतर रहता है, ताकि शाम की पूजा के समय किसी तरह की परेशानी न हो। शिव-पार्वती की तस्वीर या प्रतिमा, भगवान गणेश, फूल, बेलपत्र, फल, मिठाई और पूजा की अन्य सामग्री पहले से तैयार रखी जा सकती है। अगर आप पहली बार निर्जला व्रत रख रही हैं, तो बहुत ज्यादा शारीरिक मेहनत, धूप में रहने या अनावश्यक भागदौड़ से बचना बेहतर है। गर्भवती महिलाओं, बुजुर्गों या किसी स्वास्थ्य समस्या से जूझ रहे लोगों को निर्जला व्रत रखने से पहले डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए।</p>
<p><strong>शाम को कैसे करें हरतालिका तीज की पूजा?</strong><br />हरतालिका तीज पर शाम के समय पूजा करने की परंपरा है। पूजा स्थल को सजाकर भगवान शिव, माता पार्वती और भगवान गणेश की प्रतिमा स्थापित की जाती है। कुछ स्थानों पर मिट्टी या बालू से शिव-पार्वती की प्रतिमा बनाकर पूजा करने की परंपरा भी है। इसके बाद भगवान को फूल, बेलपत्र, फल, मिठाई और अपनी परंपरा के अनुसार अन्य पूजन सामग्री अर्पित की जाती है। पूजा के दौरान हरतालिका तीज की व्रत कथा का पाठ या श्रवण किया जाता है। अंत में भगवान शिव और माता पार्वती की आरती कर परिवार की सुख-समृद्धि और वैवाहिक जीवन में मंगल की कामना की जाती है।</p>
<p><strong>क्या रातभर जागना जरूरी है?</strong><br />हरतालिका तीज पर रातभर जागकर भजन-कीर्तन और शिव-पार्वती का स्मरण करने की परंपरा कई परिवारों में निभाई जाती है। महिलाएं रात में जागरण कर पूजा और धार्मिक गतिविधियों में शामिल होती हैं। हालांकि, हर व्यक्ति की शारीरिक क्षमता अलग होती है। यदि स्वास्थ्य या कमजोरी के कारण पूरी रात जागना संभव न हो, तो अपनी सेहत को प्राथमिकता देना चाहिए और परिवार की परंपरा के अनुसार अगले दिन पूजा के बाद व्रत का पारण किया जा सकता है।</p>
<p><strong>15 सितंबर को होगा व्रत का पारण?</strong><br />हरतालिका तीज का व्रत आमतौर पर अगले दिन पूजा के बाद खोला जाता है। दिए गए पंचांग के अनुसार, 15 सितंबर 2026 की सुबह 7:44 बजे के बाद पारण का समय बताया गया है। पारण से पहले भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा कर उनका आशीर्वाद लिया जाता है। इसके बाद पानी या अन्य तरल पदार्थ से धीरे-धीरे व्रत खोलना बेहतर माना जाता है। लंबे समय तक निर्जला रहने के बाद अचानक बहुत ज्यादा या भारी भोजन करने से बचना चाहिए।</p>
<p><strong>पहली बार व्रत रखने वाली महिलाओं के लिए जरूरी बात</strong><br />हरतालिका तीज आस्था और परंपरा से जुड़ा व्रत है, लेकिन निर्जला व्रत हर व्यक्ति के लिए समान रूप से उपयुक्त हो, यह जरूरी नहीं है। कमजोरी, चक्कर, बेहोशी, अत्यधिक प्यास, सांस लेने में परेशानी या तबीयत बिगड़ने जैसे लक्षण महसूस हों तो व्रत जारी रखने की बजाय स्वास्थ्य को प्राथमिकता दें और जरूरत पड़ने पर चिकित्सकीय मदद लें।</p>
<p><strong>डिस्क्लेमर: इस खबर में दी गई जानकारी धार्मिक मान्यताओं, प्रचलित परंपराओं और सामान्य जानकारी पर आधारित है। पूजा, व्रत और पारण की विधि तथा समय अलग-अलग क्षेत्रों और पंचांगों के अनुसार बदल सकते हैं। निर्जला व्रत रखने से पहले अपनी स्वास्थ्य स्थिति को ध्यान में रखें। नेशनल जगत विजन धार्मिक मान्यताओं की पुष्टि नहीं करता है।</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>धर्म कला संस्कृति</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 12 Sep 2026 09:07:42 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[अदिती मजुमदार ]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>Lemon and Chillies: घर, दुकान और गाड़ी पर क्यों टांगते हैं नींबू-मिर्च? बुरी नजर या सिर्फ परंपरा, जानिए पूरा सच</title>
                                    <description><![CDATA[<p>घर का मुख्य दरवाजा हो, दुकान का शटर या फिर नई गाड़ी, आपने अक्सर इनके सामने नींबू-मिर्च लटकी हुई जरूर देखी होगी। भारत में लंबे समय से चली आ रही इस परंपरा को कई लोग बुरी नजर, नकारात्मक ऊर्जा और दुर्भाग्य से बचाव से जोड़ते हैं। वहीं कुछ लोग इसे पुराने समय से चली आ रही एक व्यावहारिक परंपरा मानते हैं। नींबू-मिर्च को लेकर धार्मिक और लोक मान्यताएं अलग-अलग क्षेत्रों में अलग हो सकती हैं। लेकिन सवाल यह है कि आखिर इसे टांगने की शुरुआत क्यों हुई और क्या इसके पीछे वास्तव में कोई वैज्ञानिक आधार है?</p>
<p><strong>नींबू-मिर्च को बुरी</strong></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.nationaljagatvision.com/ritual-culture/lemon-and-chillies-why-hang-lemon-and-chillies-at-home/article-12391"><img src="https://www.nationaljagatvision.com/media/400/2026-09/lemon-and-chillied.webp" alt=""></a><br /><p>घर का मुख्य दरवाजा हो, दुकान का शटर या फिर नई गाड़ी, आपने अक्सर इनके सामने नींबू-मिर्च लटकी हुई जरूर देखी होगी। भारत में लंबे समय से चली आ रही इस परंपरा को कई लोग बुरी नजर, नकारात्मक ऊर्जा और दुर्भाग्य से बचाव से जोड़ते हैं। वहीं कुछ लोग इसे पुराने समय से चली आ रही एक व्यावहारिक परंपरा मानते हैं। नींबू-मिर्च को लेकर धार्मिक और लोक मान्यताएं अलग-अलग क्षेत्रों में अलग हो सकती हैं। लेकिन सवाल यह है कि आखिर इसे टांगने की शुरुआत क्यों हुई और क्या इसके पीछे वास्तव में कोई वैज्ञानिक आधार है?</p>
<p><strong>नींबू-मिर्च को बुरी नजर से बचाने वाला क्यों माना जाता है?</strong><br />लोक मान्यता के अनुसार, नींबू और मिर्च को घर या दुकान के प्रवेश द्वार पर लगाने से नजर दोष का प्रभाव कम होता है। माना जाता है कि नींबू की खटास और मिर्च का तीखापन नकारात्मक प्रभावों को दूर रखने में मदद करता है। हालांकि, बुरी नजर या नकारात्मक ऊर्जा को रोकने की इस मान्यता का वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है। इसे मुख्य रूप से धार्मिक विश्वास और पारंपरिक प्रथा के रूप में देखा जाता है।</p>
<p><strong>क्या नींबू-मिर्च का कोई वैज्ञानिक कारण भी है?</strong><br />नींबू और मिर्च में मौजूद कुछ प्राकृतिक यौगिकों की अपनी गंध और रासायनिक विशेषताएं होती हैं। मिर्च में पाया जाने वाला कैप्साइसिन उसकी तीखापन पैदा करता है। हालांकि, घर के दरवाजे पर नींबू-मिर्च लटकाने से मच्छर या अन्य कीट निश्चित रूप से दूर रहते हैं, ऐसा साबित करने के लिए पर्याप्त वैज्ञानिक प्रमाण नहीं हैं। इसी तरह, यह दावा भी सही नहीं माना जा सकता कि धागे में पिरोया गया नींबू हवा को शुद्ध करता है। घर या दुकान की हवा की गुणवत्ता सुधारने के लिए उचित वेंटिलेशन, साफ-सफाई और जरूरत के अनुसार एयर फिल्ट्रेशन जैसे उपाय ज्यादा प्रभावी होते हैं।</p>
<p><strong>अलक्ष्मी से जुड़ी क्या है मान्यता?</strong><br />नींबू-मिर्च लगाने से जुड़ी एक लोकप्रिय पौराणिक मान्यता माता लक्ष्मी की बहन अलक्ष्मी से जुड़ी है। धार्मिक कथाओं में अलक्ष्मी को दरिद्रता और अभाव से जोड़ा जाता है। लोकविश्वास के अनुसार उन्हें खट्टी और तीखी चीजें पसंद हैं। इसी मान्यता के आधार पर कहा जाता है कि दरवाजे पर नींबू-मिर्च देखकर अलक्ष्मी वहीं रुक जाती हैं और घर या दुकान के अंदर प्रवेश नहीं करतीं। यह धार्मिक-लोक मान्यता है, जिसका वैज्ञानिक आधार नहीं माना जाता।</p>
<p><strong>शनिवार या मंगलवार को ही क्यों लगाते हैं नींबू-मिर्च?</strong><br />कई परिवारों और व्यापारिक प्रतिष्ठानों में नींबू-मिर्च लगाने के लिए शनिवार या मंगलवार को शुभ माना जाता है। इन दिनों को लेकर भी अलग-अलग धार्मिक और क्षेत्रीय मान्यताएं प्रचलित हैं। कुछ लोग शुक्रवार को नींबू-मिर्च खरीदकर शनिवार को इसे मुख्य द्वार पर लगाते हैं। हालांकि, इसके लिए कोई सार्वभौमिक धार्मिक नियम नहीं है और अलग-अलग परंपराओं में अलग विधियां देखने को मिलती हैं।</p>
<p><strong>कितनी मिर्च और कितने नींबू लगाए जाते हैं?</strong><br />लोक परंपरा में आमतौर पर एक नींबू के साथ 5 या 7 हरी मिर्च धागे में पिरोकर मुख्य दरवाजे पर लटकाने की बात कही जाती है। कुछ स्थानों पर अलग संख्या को भी शुभ माना जाता है। वहीं, एक साथ कितनी नींबू-मिर्च की लड़ियां लगानी चाहिए, इसे लेकर भी अलग-अलग मान्यताएं हैं। इसलिए इसे किसी वैज्ञानिक नियम या अनिवार्य धार्मिक विधि के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।</p>
<p><strong>नींबू-मिर्च कितने दिन में बदलनी चाहिए?</strong><br />परंपरा का पालन करने वाले लोग आमतौर पर नींबू-मिर्च के सूखने के बाद उसे बदल देते हैं। कई जगह इसे करीब 7 से 10 दिन के भीतर बदलने की मान्यता है। पुरानी नींबू-मिर्च को लेकर भी अलग-अलग लोक परंपराएं हैं। इसे बदलते समय स्थानीय मान्यता या परिवार की परंपरा का पालन किया जाता है। वहीं व्यावहारिक रूप से सूखी या सड़ी सामग्री को खुले में फेंकने के बजाय उचित तरीके से निपटाना स्वच्छता के लिहाज से बेहतर है।</p>
<p><strong>तो क्या नींबू-मिर्च अंधविश्वास है या विज्ञान?</strong><br />नींबू-मिर्च को लेकर दो अलग पहलुओं को समझना जरूरी है। बुरी नजर, नकारात्मक ऊर्जा या दुर्भाग्य को रोकने वाली बात धार्मिक और लोक मान्यताओं पर आधारित है, जबकि इसे हवा शुद्ध करने या निश्चित रूप से कीट भगाने वाला वैज्ञानिक उपाय बताने के लिए पर्याप्त प्रमाण नहीं हैं। इसलिए इसे भारतीय संस्कृति और परंपरा का हिस्सा मानकर अपनाना अलग बात है, लेकिन इसके आधार पर वैज्ञानिक दावों को सच मान लेना उचित नहीं होगा।</p>
<p>नींबू-मिर्च टांगने की परंपरा भारत के कई हिस्सों में आज भी देखने को मिलती है। कुछ लोग इसे आस्था से जोड़ते हैं तो कुछ इसे पुरानी घरेलू परंपरा मानते हैं। अगर कोई व्यक्ति इसे धार्मिक विश्वास के तौर पर अपनाता है, तो इसमें और वैज्ञानिक तथ्य में अंतर समझना जरूरी है।</p>
<p><strong>डिस्क्लेमर: इस खबर में दी गई जानकारी धार्मिक, लोक मान्यताओं और सामान्य वैज्ञानिक जानकारी पर आधारित है। अलग-अलग क्षेत्रों में मान्यताएं भिन्न हो सकती हैं। नींबू-मिर्च से बुरी नजर दूर होने या हवा शुद्ध होने जैसे दावों को वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित तथ्य नहीं माना जाना चाहिए। नेशनल जगत विजन इन मान्यताओं की पुष्टि नहीं करता है।</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>धर्म कला संस्कृति</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 11 Sep 2026 08:43:41 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[अदिती मजुमदार ]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>पोला पर्व आज: बैलों की पूजा से गूंजेगा छत्तीसगढ़, गांव-शहर में दिखेगी लोक परंपरा की झलक</title>
                                    <description><![CDATA[<p class="MsoNormal" style="line-height:normal;"><strong><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;color:#000000;" xml:lang="hi">बिलासपुर</span></strong><span style="font-family:Mangal, serif;color:#000000;"><strong> : </strong><span lang="hi" xml:lang="hi">छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति और खेती-किसानी से गहराई से जुड़ा पारंपरिक पोला पर्व आज पूरे प्रदेश में श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जा रहा है। गांवों से लेकर शहरों तक पर्व की रौनक दिखाई दे रही है। किसान अपने कृषि कार्य में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले बैलों को आज विश्राम देकर उनकी पूजा-अर्चना कर रहे हैं। वहीं घरों में पारंपरिक पकवान बनाए जा रहे हैं और बाजारों में मिट्टी के बैलों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">खिलौनों और पूजा सामग्री की बिक्री से चहल-पहल बढ़ गई है।</span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="line-height:normal;"><strong><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;color:#000000;" xml:lang="hi">बैलों को सजाकर होगी पूजा</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="line-height:normal;"><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;color:#000000;" xml:lang="hi">पोला पर्व का सबसे खास आकर्षण बैलों की पूजा</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.nationaljagatvision.com/chhattisgarh/pola-festival-will-resonate-today-with-the-worship-of-bulls/article-12373"><img src="https://www.nationaljagatvision.com/media/400/2026-09/345070cb222477d1f820cfd03c88a55bb09eda1a.jpeg" alt=""></a><br /><p class="MsoNormal" style="line-height:normal;"><strong><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;color:#000000;" xml:lang="hi">बिलासपुर</span></strong><span style="font-family:Mangal, serif;color:#000000;"><strong> : </strong><span lang="hi" xml:lang="hi">छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति और खेती-किसानी से गहराई से जुड़ा पारंपरिक पोला पर्व आज पूरे प्रदेश में श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जा रहा है। गांवों से लेकर शहरों तक पर्व की रौनक दिखाई दे रही है। किसान अपने कृषि कार्य में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले बैलों को आज विश्राम देकर उनकी पूजा-अर्चना कर रहे हैं। वहीं घरों में पारंपरिक पकवान बनाए जा रहे हैं और बाजारों में मिट्टी के बैलों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">खिलौनों और पूजा सामग्री की बिक्री से चहल-पहल बढ़ गई है।</span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="line-height:normal;"><strong><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;color:#000000;" xml:lang="hi">बैलों को सजाकर होगी पूजा</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="line-height:normal;"><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;color:#000000;" xml:lang="hi">पोला पर्व का सबसे खास आकर्षण बैलों की पूजा और सजावट है। सुबह किसान अपने बैलों को नहलाकर साफ-सुथरा करते हैं। इसके बाद उनके सींगों पर रंग लगाया जाएगा और गले में नई रस्सी</span><span style="font-family:Mangal, serif;color:#000000;">, <span lang="hi" xml:lang="hi">घंटियां और सजावटी सामग्री पहनाई जाएगी। कई जगह बैलों के शरीर पर पारंपरिक रंगों से आकर्षक आकृतियां भी बनाई जाती हैं। सजावट के बाद बैलों की विधि-विधान से पूजा की होगी। घर में बनाए गए पारंपरिक पकवान और विशेष भोजन खिलाया जाएगा। मान्यता है कि सालभर खेतों में किसान का साथ देने वाले पशुधन के प्रति सम्मान और कृतज्ञता व्यक्त करने का यह विशेष दिन है।</span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="line-height:normal;"><strong><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;color:#000000;" xml:lang="hi">बच्चों में मिट्टी के बैलों को लेकर उत्साह</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="line-height:normal;"><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;color:#000000;" xml:lang="hi">पोला पर्व की एक खास परंपरा बच्चों से भी जुड़ी है। बाजारों में मिट्टी से बनाए गए छोटे-छोटे बैल और पोला के खिलौने सजाए गए हैं। अलग-अलग आकार और रंगों में तैयार किए गए मिट्टी के बैल बच्चों को आकर्षित कर रहे हैं। बच्चे अपनी पसंद के मिट्टी के बैल खरीदकर उन्हें रंग-बिरंगे तरीके से सजाते हैं। कई घरों में इनकी पूजा भी होती है। ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी यह परंपरा विशेष उत्साह के साथ निभाई जाती है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="line-height:normal;"><strong><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;color:#000000;" xml:lang="hi">घरों में बन रहे पारंपरिक पकवान</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="line-height:normal;"><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;color:#000000;" xml:lang="hi">पोला पर्व पर छत्तीसगढ़ी घरों में पारंपरिक व्यंजनों की खुशबू भी देखने को मिलती है। चावल</span><span style="font-family:Mangal, serif;color:#000000;">, <span lang="hi" xml:lang="hi">दाल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गुड़</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नारियल सहित स्थानीय सामग्री से विभिन्न पकवान तैयार किए जाते हैं। महिलाएं सुबह से ही पर्व की तैयारियों में जुटी हुई हैं। कई परिवारों में पूजा के लिए विशेष पकवान बनाए जाते हैं और पूजा के बाद परिवार के सभी सदस्य मिलकर भोजन करते हैं। पर्व के दौरान रिश्तेदारों और परिचितों के घर आने-जाने की परंपरा भी कई इलाकों में देखने को मिलती है।</span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="line-height:normal;"><strong><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;color:#000000;" xml:lang="hi">खेती-किसानी और पशुधन के सम्मान का पर्व</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="line-height:normal;"><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;color:#000000;" xml:lang="hi">पोला सिर्फ धार्मिक पर्व नहीं</span><span style="font-family:Mangal, serif;color:#000000;">, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि छत्तीसगढ़ की कृषि संस्कृति का प्रतीक भी है। पारंपरिक खेती में बैलों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण रही है। खेत तैयार करने से लेकर जुताई और अन्य कृषि कार्यों में बैल किसान के प्रमुख साथी रहे हैं। इसी योगदान के सम्मान में पोला के दिन उन्हें काम से पूरी तरह आराम दिया जाता है और उनकी पूजा की जाती है। आधुनिक समय में खेती के तौर-तरीकों में बदलाव आया है और कृषि कार्यो में मशीनों का उपयोग बढ़ा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन छत्तीसगढ़ के ग्रामीण क्षेत्रों में पोला की परंपरा आज भी पूरी श्रद्धा के साथ कायम है।</span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="line-height:normal;"><strong><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;color:#000000;" xml:lang="hi">गांवों में उत्सव जैसा माहौल</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="line-height:normal;"><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;color:#000000;" xml:lang="hi">पोला के अवसर पर ग्रामीण इलाकों में सुबह से ही उत्सव जैसा माहौल बना हुआ है। घरों और आंगनों की साफ-सफाई के साथ सजावट की गई है। किसान अपने पशुधन को सजाकर पूजा की तैयारी में जुटे हैं। बाजारों में भी मिट्टी के बैल</span><span style="font-family:Mangal, serif;color:#000000;">, <span lang="hi" xml:lang="hi">खिलौने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पूजा सामग्री और सजावटी सामान की बिक्री बढ़ गई है। कारीगरों को भी पर्व से अच्छे कारोबार की उम्मीद है। पोला के लिए कई दिन पहले से मिट्टी के बैल और अन्य खिलौने तैयार किए जाते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिन्हें अलग-अलग रंगों और डिजाइनों से सजाया जाता है।</span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="line-height:normal;"><strong><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;color:#000000;" xml:lang="hi">नई पीढ़ी को परंपरा से जोड़ता है पोला</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="line-height:normal;"><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;color:#000000;" xml:lang="hi">बुजुर्गों के अनुसार</span><span style="font-family:Mangal, serif;color:#000000;">, <span lang="hi" xml:lang="hi">पोला पर्व नई पीढ़ी को अपनी मिट्टी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">खेती और लोक संस्कृति से जोड़ने का माध्यम भी है। बच्चों को मिट्टी के बैल देना और उनकी पूजा कराना इस परंपरा को आगे बढ़ाने का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। बैलों की पूजा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मिट्टी के खिलौने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पारंपरिक पकवान और परिवार के साथ मिलकर पर्व मनाने की परंपरा आज भी छत्तीसगढ़ की पहचान को जीवंत बनाए हुए है। पोला पर्व के जरिए एक बार फिर प्रदेश के गांवों में कृषि संस्कृति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पशुधन के प्रति सम्मान और छत्तीसगढ़ी लोक परंपराओं की खूबसूरत झलक देखने को मिल रही है।</span></span><br /><br /><span style="font-family:Mangal, serif;color:#000000;"> </span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>धर्म कला संस्कृति</category>
                                            <category>बिलासपुर</category>
                                            <category>छत्तीसगढ़</category>
                                    

                <link>https://www.nationaljagatvision.com/chhattisgarh/pola-festival-will-resonate-today-with-the-worship-of-bulls/article-12373</link>
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                <pubDate>Thu, 10 Sep 2026 11:14:42 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[स्वाति मिश्रा ]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>Bhadrapada Amavasya 2026: सितंबर में दो दिन रहेगी अमावस्या, जानें व्रत, स्नान-दान और तर्पण की सही तारीख</title>
                                    <description><![CDATA[<p><strong>September Amavasya 2026: </strong>हिंदू पंचांग में अमावस्या तिथि का विशेष धार्मिक महत्व माना जाता है। भाद्रपद मास की अमावस्या को कई जगहों पर पिठोरी अमावस्या और कुशग्रहणी अमावस्या के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन व्रत, पूजा, स्नान, दान और पितरों के निमित्त तर्पण करने की परंपरा है। मान्यता है कि अमावस्या पर किए गए धार्मिक कार्यों से पुण्य की प्राप्ति होती है और पितरों का आशीर्वाद मिलता है।</p>
<p>इस बार सितंबर 2026 में अमावस्या तिथि दो तारीखों को पड़ रही है, जिसकी वजह से लोगों के बीच व्रत और स्नान-दान की तारीख को लेकर असमंजस बना हुआ</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.nationaljagatvision.com/ritual-culture/bhadrapada-amavasya-2026-amavasya-will-last-for-two-days-in/article-12367"><img src="https://www.nationaljagatvision.com/media/400/2026-09/bhadrapada-amavasya-2026.webp" alt=""></a><br /><p><strong>September Amavasya 2026: </strong>हिंदू पंचांग में अमावस्या तिथि का विशेष धार्मिक महत्व माना जाता है। भाद्रपद मास की अमावस्या को कई जगहों पर पिठोरी अमावस्या और कुशग्रहणी अमावस्या के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन व्रत, पूजा, स्नान, दान और पितरों के निमित्त तर्पण करने की परंपरा है। मान्यता है कि अमावस्या पर किए गए धार्मिक कार्यों से पुण्य की प्राप्ति होती है और पितरों का आशीर्वाद मिलता है।</p>
<p>इस बार सितंबर 2026 में अमावस्या तिथि दो तारीखों को पड़ रही है, जिसकी वजह से लोगों के बीच व्रत और स्नान-दान की तारीख को लेकर असमंजस बना हुआ है। पंचांग के अनुसार, अमावस्या तिथि 10 सितंबर से शुरू होकर 11 सितंबर 2026 तक रहेगी। ऐसे में दोनों दिनों के धार्मिक कार्यों को अलग-अलग समझना जरूरी है।</p>
<p><strong>कब शुरू होगी भाद्रपद अमावस्या?</strong><br />पंचांग के अनुसार, भाद्रपद मास की अमावस्या तिथि 10 सितंबर 2026 को सुबह 10 बजकर 33 मिनट से शुरू होगी। वहीं, अमावस्या तिथि का समापन 11 सितंबर 2026 को सुबह 8 बजकर 56 मिनट पर होगा।</p>
<p>अमावस्या तिथि 10 सितंबर को शुरू होने के कारण इस दिन व्रत और पूजा का विधान माना जाएगा, जबकि 11 सितंबर की सुबह तक अमावस्या तिथि रहने के कारण स्नान, दान और पितरों के लिए तर्पण जैसे कार्य किए जा सकते हैं।</p>
<p><strong>10 सितंबर को रखा जाएगा पिठोरी अमावस्या का व्रत</strong><br />इस वर्ष पिठोरी अमावस्या का व्रत 10 सितंबर 2026, गुरुवार को रखा जाएगा। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, महिलाएं इस दिन संतान की लंबी आयु, अच्छे स्वास्थ्य और परिवार की सुख-समृद्धि की कामना से व्रत रखती हैं।</p>
<p>पिठोरी अमावस्या पर माता दुर्गा और 64 योगिनियों की पूजा का भी विशेष महत्व बताया गया है। कुछ क्षेत्रों में महिलाएं आटे से देवी-देवताओं की आकृतियां बनाकर उनकी पूजा करती हैं। इसी परंपरा के कारण इस अमावस्या को पिठोरी अमावस्या कहा जाता है।</p>
<p><strong>11 सितंबर को करें स्नान, दान और तर्पण</strong><br />अमावस्या तिथि 11 सितंबर को सुबह 8 बजकर 56 मिनट तक रहेगी। ऐसे में इस दिन सुबह अमावस्या तिथि के दौरान स्नान, दान और पितरों के लिए तर्पण करना धार्मिक रूप से महत्वपूर्ण माना जाता है।</p>
<p>मान्यता के अनुसार, अमावस्या के दिन पवित्र नदी, सरोवर या तीर्थ में स्नान करने के बाद जरूरतमंद लोगों को अन्न, वस्त्र और अपनी सामर्थ्य के अनुसार अन्य वस्तुओं का दान करना शुभ माना जाता है। यदि तीर्थ स्नान संभव न हो तो घर पर स्नान करके भी श्रद्धापूर्वक पूजा-पाठ और दान किया जा सकता है।</p>
<p><strong>पितरों के लिए क्यों खास है अमावस्या?</strong><br />हिंदू धर्म में अमावस्या तिथि को पितरों के निमित्त किए जाने वाले कर्मों के लिए विशेष माना जाता है। इस दिन पूर्वजों की शांति और उनके आशीर्वाद की कामना से तर्पण और दान करने की परंपरा है।</p>
<p>भाद्रपद अमावस्या पर भी लोग अपने पितरों को याद करते हैं और जल अर्पित करते हैं। जरूरतमंदों को भोजन, अन्न या वस्त्र का दान करने की परंपरा भी कई स्थानों पर प्रचलित है। धार्मिक मान्यता है कि श्रद्धा से किए गए ऐसे कर्मों से पितरों की कृपा प्राप्त होती है।</p>
<p><strong>अमावस्या पर क्या करें?</strong></p>
<ul>
<li>सुबह स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनें।</li>
<li>भगवान की पूजा और ध्यान करें।</li>
<li>सामर्थ्य के अनुसार जरूरतमंदों को दान दें।</li>
<li>पितरों के निमित्त जल से तर्पण करें।</li>
<li>संतान के मंगल और परिवार की सुख-शांति के लिए प्रार्थना करें।</li>
<li>धार्मिक मान्यताओं के अनुसार व्रत रखने वाले लोग सात्विक आहार और संयम का पालन करें।</li>
</ul>
<p><strong>Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी धार्मिक मान्यताओं और सामान्य ज्योतिषीय जानकारियों पर आधारित है। नेशनल जगत विजन इसकी पुष्टि नहीं करता है।</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>धर्म कला संस्कृति</category>
                                    

                <link>https://www.nationaljagatvision.com/ritual-culture/bhadrapada-amavasya-2026-amavasya-will-last-for-two-days-in/article-12367</link>
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                <pubDate>Thu, 10 Sep 2026 09:07:29 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[अदिती मजुमदार ]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>Ganesh Chaturthi 2026: गणेश स्थापना से विसर्जन तक ऐसे चलेगा 10 दिन का गणेशोत्सव, जानें पूजा और परंपराएं</title>
                                    <description><![CDATA[<p><strong>Ganesh Chaturthi 2026: </strong>भगवान गणेश के भक्तों के लिए गणेशोत्सव का इंतजार अब खत्म होने वाला है। भाद्रपद शुक्ल पक्ष की चतुर्थी से शुरू होने वाला यह पर्व देशभर में श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जाता है। इस दौरान घरों और सार्वजनिक पंडालों में गणपति बप्पा की प्रतिमा स्थापित की जाती है। सुबह-शाम पूजा, आरती, भजन और प्रसाद का सिलसिला चलता है। साल 2026 में गणेश चतुर्थी 14 सितंबर को मनाई जाएगी, जबकि गणपति विसर्जन के लिए प्रमुख दिन 25 सितंबर, अनंत चतुर्दशी रहेगा।</p>
<p>गणेशोत्सव की अवधि में अलग-अलग परिवारों और क्षेत्रों में पूजा की परंपराएं अलग हो सकती</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.nationaljagatvision.com/ritual-culture/ganesh-chaturthi-2026-this-is-how-the-10-day-ganeshotsav/article-12339"><img src="https://www.nationaljagatvision.com/media/400/2026-09/ganesh-chaturthi-2026-4.webp" alt=""></a><br /><p><strong>Ganesh Chaturthi 2026: </strong>भगवान गणेश के भक्तों के लिए गणेशोत्सव का इंतजार अब खत्म होने वाला है। भाद्रपद शुक्ल पक्ष की चतुर्थी से शुरू होने वाला यह पर्व देशभर में श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जाता है। इस दौरान घरों और सार्वजनिक पंडालों में गणपति बप्पा की प्रतिमा स्थापित की जाती है। सुबह-शाम पूजा, आरती, भजन और प्रसाद का सिलसिला चलता है। साल 2026 में गणेश चतुर्थी 14 सितंबर को मनाई जाएगी, जबकि गणपति विसर्जन के लिए प्रमुख दिन 25 सितंबर, अनंत चतुर्दशी रहेगा।</p>
<p>गणेशोत्सव की अवधि में अलग-अलग परिवारों और क्षेत्रों में पूजा की परंपराएं अलग हो सकती हैं। कुछ लोग गणपति को डेढ़, तीन, पांच, सात या दस दिन तक घर में रखते हैं। वहीं सार्वजनिक गणेशोत्सव में 10 दिनों तक विशेष आयोजन किए जाते हैं। आइए जानते हैं गणेश चतुर्थी से अनंत चतुर्दशी तक चलने वाले इस उत्सव में आम तौर पर क्या-क्या किया जाता है।</p>
<p><strong>14 सितंबर को गणेश स्थापना</strong><br />गणेश चतुर्थी के दिन घर में गणपति बप्पा की स्थापना की जाती है। सबसे पहले पूजा स्थल की साफ-सफाई कर चौकी सजाई जाती है और उस पर भगवान गणेश की प्रतिमा स्थापित की जाती है। इसके बाद संकल्प, आह्वान और पूजा की जाती है। गणपति को जल, पंचामृत, अक्षत, रोली, फूल और दूर्वा अर्पित किए जाते हैं। इसके बाद मोदक, लड्डू और अन्य सात्विक प्रसाद का भोग लगाकर आरती की जाती है। कई परंपराओं में इसी दिन प्राण-प्रतिष्ठा का विधान भी किया जाता है।</p>
<p><strong>दूसरे दिन भी जारी रहती है बप्पा की आराधना</strong><br />गणेशोत्सव के दूसरे दिन भगवान गणेश की सुबह और शाम पूजा करने की परंपरा है। भक्त गणपति को दूर्वा, फूल, फल और प्रसाद अर्पित करते हैं। परिवार की सुख-शांति और मंगल की कामना करते हुए गणेश मंत्रों का जाप किया जा सकता है।</p>
<p><strong>तीसरे दिन पूजा के साथ आरती</strong><br />तीसरे दिन भी गणपति की नियमित पूजा और आरती की जाती है। भक्त भगवान गणेश को मोदक, लड्डू, फल और अपनी श्रद्धा के अनुसार अन्य प्रसाद चढ़ाते हैं। कई जगहों पर इस दौरान भजन-कीर्तन और धार्मिक कार्यक्रम भी आयोजित किए जाते हैं।</p>
<p><strong>चौथे दिन भजन-कीर्तन का दौर</strong><br />गणेशोत्सव के चौथे दिन घरों और पंडालों में भक्ति का माहौल और गहरा हो जाता है। कई स्थानों पर भजन, कीर्तन और सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। भक्त गणपति मंत्रों का जाप कर उनकी आराधना करते हैं और प्रसाद वितरित करते हैं।</p>
<p><strong>पांचवें दिन विशेष पूजा और कुछ जगह विसर्जन</strong><br />पांचवें दिन भी भगवान गणेश की पूजा और आरती की जाती है। परिवार की सुख-समृद्धि और स्वास्थ्य के लिए प्रार्थना की जाती है। हालांकि, कुछ परिवारों और क्षेत्रों में पांचवें दिन गणपति विसर्जन की परंपरा भी होती है। इसलिए विसर्जन की तारीख स्थानीय परंपरा के अनुसार अलग हो सकती है।</p>
<p><strong>छठे दिन लगाएं सात्विक भोग</strong><br />गणेशोत्सव के छठे दिन भगवान गणेश को घर में तैयार किए गए सात्विक पकवानों का भोग लगाया जा सकता है। मोदक और लड्डू गणपति को प्रिय माने जाते हैं, इसलिए इनका भोग लगाने की परंपरा काफी लोकप्रिय है। पूजा में श्रद्धा और स्वच्छता का विशेष ध्यान रखा जाता है।</p>
<p><strong>सातवें दिन मंत्र जाप की परंपरा</strong><br />सातवें दिन भगवान गणेश की पूजा के साथ मंत्र जाप करना शुभ माना जाता है। भक्त ‘ॐ गं गणपतये नमः’ मंत्र का जाप कर गणपति से परिवार की खुशहाली और बाधाओं को दूर करने की प्रार्थना करते हैं। शाम को आरती के बाद प्रसाद वितरण किया जाता है।</p>
<p><strong>आठवें दिन सुख-शांति की कामना</strong><br />आठवें दिन गणपति की पूजा करते हुए भक्त परिवार के स्वास्थ्य, सुख-शांति और समृद्धि की कामना करते हैं। इस दौरान घर और पूजा स्थल को साफ-सुथरा रखने के साथ भगवान गणेश को फूल, दूर्वा और प्रसाद अर्पित किया जाता है।</p>
<p><strong>नौवें दिन विदाई की तैयारी</strong><br />गणेशोत्सव के नौवें दिन कई परिवार और सार्वजनिक समितियां अगले दिन होने वाले विसर्जन की तैयारियां शुरू कर देती हैं। हालांकि गणपति की पूजा और आरती इस दिन भी जारी रहती है। भक्त बप्पा से परिवार और समाज के मंगल की प्रार्थना करते हैं।</p>
<p><strong>25 सितंबर को अनंत चतुर्दशी और गणपति विसर्जन</strong><br />गणेशोत्सव का प्रमुख समापन दिवस 25 सितंबर 2026 को अनंत चतुर्दशी के दिन होगा। जिन परिवारों और पंडालों में गणपति को 10 दिनों तक विराजमान रखा गया है, वहां इस दिन विशेष पूजा और आरती के बाद गणपति विसर्जन किया जाता है। विसर्जन से पहले भगवान गणेश को फूल, दूर्वा, मोदक और अन्य प्रसाद अर्पित किए जाते हैं। इसके बाद श्रद्धालु गणपति बप्पा को विदाई देते हुए शोभायात्रा के साथ विसर्जन स्थल तक जाते हैं। इस दौरान ‘गणपति बप्पा मोरया, अगले बरस तू जल्दी आ’ के जयकारों से माहौल भक्तिमय हो जाता है।</p>
<p><strong>गणेशोत्सव में सबसे जरूरी क्या है?</strong><br />गणेशोत्सव में पूजा की विधि और परंपराएं क्षेत्र तथा परिवार के अनुसार अलग-अलग हो सकती हैं। इसलिए किसी एक तरीके को सभी के लिए अनिवार्य नहीं माना जाना चाहिए। श्रद्धा, स्वच्छता, सात्विकता और पर्यावरण का ध्यान रखते हुए उत्सव मनाना महत्वपूर्ण है। पर्यावरण संरक्षण के लिए प्राकृतिक और आसानी से घुलने वाली प्रतिमा का इस्तेमाल करना भी बेहतर विकल्प माना जाता है।</p>
<p><strong>Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी धार्मिक मान्यताओं, परंपराओं और सामान्य जानकारियों पर आधारित है। पूजा-विधि और स्थानीय परंपराओं में क्षेत्र के अनुसार अंतर हो सकता है। नेशनल जगत विजन इसकी पुष्टि नहीं करता है।</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>धर्म कला संस्कृति</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 09 Sep 2026 09:08:13 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[अदिती मजुमदार ]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>Vastu Tips For Bed: बेड के नीचे भूलकर भी न रखें ये चीजें, वास्तु में मानी जाती हैं अशुभ</title>
                                    <description><![CDATA[<p><strong>Vastu Tips For Home: </strong>छोटे फ्लैट या घर में सामान रखने की जगह कम होने पर लोग अक्सर बेड के नीचे की खाली जगह को स्टोरेज के लिए इस्तेमाल करते हैं। यहां पुराने कपड़ों से लेकर जूते, बॉक्स और दूसरी घरेलू चीजें रख दी जाती हैं। लेकिन वास्तु शास्त्र की मान्यताओं के अनुसार बेड के नीचे की जगह को लंबे समय तक सामान से भरकर रखना उचित नहीं माना जाता।</p>
<p>वास्तु में बेडरूम को आराम, नींद और मानसिक शांति से जुड़ा स्थान माना गया है। इसलिए इस कमरे की साफ-सफाई और व्यवस्था पर विशेष ध्यान देने की सलाह दी जाती</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.nationaljagatvision.com/ritual-culture/vastu-tips-for-bed-do-not-keep-these-things-under/article-12306"><img src="https://www.nationaljagatvision.com/media/400/2026-09/vastu-tips-for-bed.webp" alt=""></a><br /><p><strong>Vastu Tips For Home: </strong>छोटे फ्लैट या घर में सामान रखने की जगह कम होने पर लोग अक्सर बेड के नीचे की खाली जगह को स्टोरेज के लिए इस्तेमाल करते हैं। यहां पुराने कपड़ों से लेकर जूते, बॉक्स और दूसरी घरेलू चीजें रख दी जाती हैं। लेकिन वास्तु शास्त्र की मान्यताओं के अनुसार बेड के नीचे की जगह को लंबे समय तक सामान से भरकर रखना उचित नहीं माना जाता।</p>
<p>वास्तु में बेडरूम को आराम, नींद और मानसिक शांति से जुड़ा स्थान माना गया है। इसलिए इस कमरे की साफ-सफाई और व्यवस्था पर विशेष ध्यान देने की सलाह दी जाती है। मान्यता है कि बेड के नीचे कुछ खास तरह की चीजें रखने से कमरे का वातावरण प्रभावित हो सकता है। आइए जानते हैं किन सामानों को यहां रखने से बचने की सलाह दी जाती है।</p>
<p><strong>बेड के नीचे न रखें पुराने और बेकार सामान</strong><br />घर में लंबे समय से इस्तेमाल नहीं हो रही चीजों को अक्सर लोग फेंकने के बजाय बेड के नीचे रख देते हैं। वास्तु मान्यताओं में पुराने, टूटे या बेकार सामान को जमा करके रखना शुभ नहीं माना जाता। इसलिए गैरजरूरी वस्तुओं को समय-समय पर छांटकर हटा देना बेहतर माना जाता है।</p>
<p><strong>जूते-चप्पल रखने से बचें</strong><br />जगह की कमी के कारण कई लोग जूते-चप्पल को बेड के नीचे रख देते हैं। वास्तु के अनुसार सोने की जगह के नीचे फुटवियर रखना उचित नहीं माना जाता। इन्हें बेडरूम से अलग किसी निर्धारित स्थान पर व्यवस्थित तरीके से रखना बेहतर माना जाता है।</p>
<p><strong>भारी धातु का सामान न करें स्टोर</strong><br />बेड के नीचे भारी लोहे या अन्य धातु की वस्तुओं को लंबे समय तक रखने से भी वास्तु में बचने की सलाह दी जाती है। खासकर ऐसी चीजें जिनका नियमित इस्तेमाल नहीं होता, उन्हें बेड के नीचे जमा करने के बजाय किसी अन्य स्टोरेज एरिया में रखना बेहतर है।</p>
<p><strong>पुराने जूते और इस्तेमाल में न आने वाली चीजें हटाएं</strong><br />पुराने जूते, खराब बैग या लंबे समय से पड़े ऐसे सामान जिनकी जरूरत नहीं है, उन्हें बेड के नीचे जमा करके न रखें। इससे स्टोरेज एरिया जल्दी अव्यवस्थित हो जाता है और बेड के नीचे सफाई करना भी मुश्किल हो सकता है।</p>
<p><strong>टूटी-फूटी चीजों को भी न रखें</strong><br />खराब घड़ी, टूटे खिलौने, बेकार इलेक्ट्रॉनिक सामान या ऐसी वस्तुएं जो इस्तेमाल के लायक नहीं हैं, उन्हें बेड के नीचे रखना वास्तु की दृष्टि से अच्छा नहीं माना जाता। ऐसी चीजों को या तो ठीक कराएं, उपयोग में लाएं या फिर जरूरत न होने पर हटा दें।</p>
<p><strong>बेड के नीचे जगह रखें साफ और व्यवस्थित</strong><br />वास्तु मान्यताओं के मुताबिक बेड के नीचे का हिस्सा जितना साफ और खाली रहे, उतना बेहतर माना जाता है। व्यावहारिक तौर पर भी यहां धूल और गंदगी आसानी से जमा हो सकती है। इसलिए अगर स्टोरेज के लिए इस जगह का इस्तेमाल करना जरूरी हो, तो रोजमर्रा में काम आने वाली साफ-सुथरी और व्यवस्थित वस्तुओं को ही रखें।</p>
<p><strong>क्यों महत्वपूर्ण माना जाता है बेड के नीचे का स्थान?</strong><br />वास्तु शास्त्र में बेडरूम को व्यक्ति की नींद और मानसिक सुकून से जोड़कर देखा जाता है। इसी वजह से यहां अनावश्यक सामान, गंदगी और अव्यवस्था से बचने की सलाह दी जाती है। हालांकि, वास्तु से जुड़ी ये बातें धार्मिक और पारंपरिक मान्यताओं पर आधारित हैं, इनका कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है।</p>
<p><strong>Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी वास्तु शास्त्र की मान्यताओं और सामान्य जानकारी पर आधारित है। नेशनल जगत विजन इन मान्यताओं की पुष्टि नहीं करता है।</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>धर्म कला संस्कृति</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 08 Sep 2026 09:02:34 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[अदिती मजुमदार ]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>Flat Vastu: फ्लैट में रहते हैं तो इन वास्तु गलतियों से बचें, वरना घर की सुख-शांति हो सकती है प्रभावित</title>
                                    <description><![CDATA[<p><strong>Vastu Tips for Flat: </strong>आज के समय में ज्यादातर लोग अपार्टमेंट या फ्लैट में रहना पसंद करते हैं। जगह सीमित होने के बावजूद लोग अपने घर को सुंदर और आरामदायक बनाने की कोशिश करते हैं। वास्तु शास्त्र में भी घर की बनावट, दिशा और सामान की स्थिति को लेकर कई मान्यताएं बताई गई हैं। माना जाता है कि इन नियमों का ध्यान रखने से घर में सकारात्मक माहौल बना रहता है।</p>
<p>फ्लैट में रहने वाले लोग अक्सर यह सोचते हैं कि वास्तु के नियम केवल स्वतंत्र मकानों पर लागू होते हैं, लेकिन वास्तु मान्यताओं के अनुसार अपार्टमेंट में भी मुख्य</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.nationaljagatvision.com/ritual-culture/flat-vastu-if-you-live-in-a-flat-then-avoid/article-12261"><img src="https://www.nationaljagatvision.com/media/400/2026-09/flat-vastu.webp" alt=""></a><br /><p><strong>Vastu Tips for Flat: </strong>आज के समय में ज्यादातर लोग अपार्टमेंट या फ्लैट में रहना पसंद करते हैं। जगह सीमित होने के बावजूद लोग अपने घर को सुंदर और आरामदायक बनाने की कोशिश करते हैं। वास्तु शास्त्र में भी घर की बनावट, दिशा और सामान की स्थिति को लेकर कई मान्यताएं बताई गई हैं। माना जाता है कि इन नियमों का ध्यान रखने से घर में सकारात्मक माहौल बना रहता है।</p>
<p>फ्लैट में रहने वाले लोग अक्सर यह सोचते हैं कि वास्तु के नियम केवल स्वतंत्र मकानों पर लागू होते हैं, लेकिन वास्तु मान्यताओं के अनुसार अपार्टमेंट में भी मुख्य द्वार, रसोई, बेडरूम और घर की अलग-अलग दिशाओं का ध्यान रखा जा सकता है। हालांकि, हर फ्लैट की संरचना अलग होती है, इसलिए बिना तोड़फोड़ के छोटे बदलावों को प्राथमिकता देना बेहतर माना जाता है।</p>
<p><strong>फ्लैट में किन वास्तु गलतियों से बचें?</strong></p>
<ul>
<li><strong>मुख्य दरवाजे के पास न फैलाएं गंदगी</strong><br />घर का मुख्य द्वार वास्तु में महत्वपूर्ण स्थान माना जाता है। दरवाजे के आसपास गंदगी, कूड़ा या जूते-चप्पलों का बेतरतीब ढेर रखने से बचने की सलाह दी जाती है। प्रवेश द्वार पर पर्याप्त रोशनी और साफ-सफाई रखने को शुभ माना जाता है।</li>
<li><strong>ईशान कोण में भारी सामान रखने से बचें</strong><br />उत्तर-पूर्व दिशा यानी ईशान कोण को वास्तु में विशेष महत्व दिया जाता है। मान्यता के अनुसार इस हिस्से को हल्का और साफ रखना चाहिए। यहां भारी फर्नीचर, कबाड़ या कूड़ेदान रखने से बचने की सलाह दी जाती है।</li>
<li><strong>घर में पानी का रिसाव न होने दें</strong><br />टपकता नल, लीक होता पाइप या लगातार पानी का रिसाव घर की समस्या को बढ़ा सकता है। वास्तु मान्यताओं में इसे आर्थिक नुकसान से जोड़कर देखा जाता है। व्यावहारिक रूप से भी पानी का रिसाव दीवारों और फर्नीचर को नुकसान पहुंचा सकता है, इसलिए ऐसी खराबी को जल्द ठीक कराना जरूरी है।</li>
<li><strong>बेड के सामने शीशा लगाने से बचें</strong><br />वास्तु मान्यताओं के अनुसार बेड के ठीक सामने आईना रखना उचित नहीं माना जाता। इसके अलावा बेडरूम में पूजा स्थल बनाने से भी बचने की सलाह दी जाती है। हालांकि छोटे फ्लैट में जगह की कमी होने पर लोग घर की उपलब्ध जगह के अनुसार व्यवस्था करते हैं।</li>
<li><strong>खराब घड़ी और टूटी चीजें हटाएं</strong><br />घर में लंबे समय से बंद या खराब पड़ी घड़ी और टूटी-फूटी चीजों को रखने से बचना चाहिए। वास्तु में इन्हें नकारात्मकता और रुकी हुई ऊर्जा से जोड़ा जाता है। व्यावहारिक तौर पर भी ऐसी गैरजरूरी वस्तुओं को हटाकर घर को व्यवस्थित रखना बेहतर होता है।</li>
</ul>
<p><strong>बिना तोड़फोड़ के अपनाएं ये वास्तु उपाय</strong></p>
<ul>
<li><strong>मुख्य द्वार</strong><br />वास्तु मान्यताओं में पूर्व, उत्तर और उत्तर-पूर्व दिशा में मुख्य प्रवेश द्वार को शुभ माना जाता है। अगर फ्लैट पहले से बना हुआ है और दरवाजे की दिशा बदलना संभव नहीं है, तो प्रवेश क्षेत्र को साफ, व्यवस्थित और पर्याप्त रोशनी वाला रखा जा सकता है।</li>
<li><strong>रसोई</strong><br />रसोई के लिए दक्षिण-पूर्व यानी आग्नेय दिशा को वास्तु में प्रमुख माना गया है। इसके अलावा उत्तर-पश्चिम यानी वायव्य दिशा को भी विकल्प के रूप में देखा जाता है। खाना बनाते समय पूर्व दिशा की ओर मुंह करना वास्तु मान्यता के अनुसार शुभ माना जाता है।</li>
<li><strong>बेडरूम</strong><br />मास्टर बेडरूम के लिए दक्षिण-पश्चिम दिशा को बेहतर माना जाता है। सोते समय सिर दक्षिण या पूर्व दिशा की ओर रखने की सलाह दी जाती है। कमरे में हल्के और शांत रंगों का इस्तेमाल करने से वातावरण सुकूनभरा बनाया जा सकता है।</li>
<li><strong>खिड़कियां और बालकनी</strong><br />वास्तु के अनुसार उत्तर और पूर्व दिशा की खिड़कियों तथा बालकनी को खुला और साफ रखना अच्छा माना जाता है। इससे घर में प्राकृतिक रोशनी और हवा आती है। वहीं भारी फर्नीचर को दक्षिण या पश्चिम दिशा की ओर रखना वास्तु मान्यताओं में बेहतर माना जाता है।</li>
</ul>
<p><strong>ध्यान रखें</strong><br />फ्लैट में वास्तु से जुड़े बदलाव करते समय घर की वास्तविक संरचना, सुरक्षा और सुविधा को प्राथमिकता देना जरूरी है। हर फ्लैट में दिशा और लेआउट अलग हो सकता है, इसलिए केवल वास्तु के आधार पर बड़े निर्माण कार्य या तोड़फोड़ करने के बजाय छोटे और व्यावहारिक बदलाव किए जा सकते हैं।</p>
<p><strong>Disclaimer: इस लेख में दी गई जानकारी वास्तु शास्त्र की धार्मिक एवं पारंपरिक मान्यताओं पर आधारित है। नेशनल जगत विजन इन मान्यताओं की पुष्टि नहीं करता है।</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>धर्म कला संस्कृति</category>
                                    

                <link>https://www.nationaljagatvision.com/ritual-culture/flat-vastu-if-you-live-in-a-flat-then-avoid/article-12261</link>
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                <pubDate>Mon, 07 Sep 2026 09:06:03 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[मनीशंकर पांडेय]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>Mercury Transit 2026: 7 सितंबर से कन्या राशि में बुध का गोचर, तुला-कुंभ-मीन वालों को रहना होगा सावधान</title>
                                    <description><![CDATA[<p><strong>Budh Gochar 2026:</strong> ज्योतिष शास्त्र में बुध ग्रह को बुद्धि, वाणी, तर्क, व्यापार, शिक्षा और निर्णय क्षमता का कारक माना जाता है। सितंबर 2026 में बुध ग्रह राशि परिवर्तन करने जा रहे हैं। 7 सितंबर 2026 को बुध कन्या राशि में प्रवेश करेंगे। कन्या राशि को बुध की अपनी राशि होने के साथ-साथ उच्च राशि भी माना जाता है। ऐसे में बुध की स्थिति मजबूत मानी जाती है।</p>
<p>हालांकि, गोचर के प्रभाव को हर राशि के लिए अलग-अलग तरीके से देखा जाता है। किसी के लिए यह समय करियर और व्यापार में अवसर लेकर आ सकता है, तो कुछ लोगों</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.nationaljagatvision.com/ritual-culture/mercury-transit-2026-transit-of-mercury-in-virgo-from-september/article-12237"><img src="https://www.nationaljagatvision.com/media/400/2026-09/budh-margi-2026.webp" alt=""></a><br /><p><strong>Budh Gochar 2026:</strong> ज्योतिष शास्त्र में बुध ग्रह को बुद्धि, वाणी, तर्क, व्यापार, शिक्षा और निर्णय क्षमता का कारक माना जाता है। सितंबर 2026 में बुध ग्रह राशि परिवर्तन करने जा रहे हैं। 7 सितंबर 2026 को बुध कन्या राशि में प्रवेश करेंगे। कन्या राशि को बुध की अपनी राशि होने के साथ-साथ उच्च राशि भी माना जाता है। ऐसे में बुध की स्थिति मजबूत मानी जाती है।</p>
<p>हालांकि, गोचर के प्रभाव को हर राशि के लिए अलग-अलग तरीके से देखा जाता है। किसी के लिए यह समय करियर और व्यापार में अवसर लेकर आ सकता है, तो कुछ लोगों को खर्च, निवेश, रिश्तों और मानसिक तनाव से जुड़े मामलों में सावधानी बरतने की सलाह दी जाती है। ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार तुला, कुंभ और मीन राशि के जातकों को इस दौरान कुछ मामलों में विशेष सतर्कता रखनी चाहिए।</p>
<p><strong>तुला राशि: खर्च और निवेश पर रखें नजर</strong><br />तुला राशि के जातकों के लिए बुध का गोचर बारहवें भाव में माना जा रहा है। ज्योतिषीय मान्यता के अनुसार इस दौरान यात्रा, मनोरंजन, ऑनलाइन खरीदारी या विदेश से जुड़े मामलों में खर्च बढ़ सकता है। कुछ लोगों को बाहरी संपर्कों से नए अवसर मिल सकते हैं, लेकिन बढ़ते खर्च का असर बचत पर पड़ सकता है। इसलिए बजट बनाकर चलना और बिना पूरी जानकारी के किसी निवेश में पैसा लगाने से बचना बेहतर रहेगा। कर्ज या अनावश्यक खर्चों को लेकर भी सावधानी बरतने की सलाह दी जाती है।</p>
<p><strong>उपाय: </strong>बुधवार को हरी मूंग या हरी सब्जियों का दान करें और भगवान गणेश की पूजा करें।</p>
<p><strong>कुंभ राशि: पैसों और दस्तावेजों में सावधानी जरूरी</strong><br />कुंभ राशि वालों के लिए बुध का गोचर आठवें भाव में माना जा रहा है। ज्योतिष में यह भाव अचानक होने वाले बदलावों, साझा धन, टैक्स, बीमा और दूसरे वित्तीय मामलों से जोड़ा जाता है। इस दौरान किसी भी आर्थिक फैसले में जल्दबाजी से बचना चाहिए। निवेश, टैक्स, बीमा या कानूनी दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करने से पहले सभी नियम और शर्तें ध्यान से पढ़ें। किसी के कहने पर बिना जांच-पड़ताल के आर्थिक जोखिम लेने से बचना बेहतर होगा।</p>
<p><strong>उपाय:</strong> बुधवार को भगवान गणेश को दूर्वा अर्पित करें और हरी मूंग का दान करें।</p>
<p><strong>मीन राशि: रिश्तों और पार्टनरशिप में संभलकर चलें</strong><br />मीन राशि के जातकों के लिए बुध का गोचर सातवें भाव में माना जा रहा है। यह भाव विवाह, साझेदारी और व्यापारिक संबंधों से जुड़ा माना जाता है। ऐसे में इस अवधि में आपकी बातचीत और व्यवहार का रिश्तों पर खास असर पड़ सकता है। छोटी बातों को लेकर बहस करने या जल्द प्रतिक्रिया देने से गलतफहमी बढ़ सकती है। कारोबारियों को नए प्रस्ताव मिलने की संभावना बताई जाती है, लेकिन किसी भी बिजनेस पार्टनरशिप या समझौते को अंतिम रूप देने से पहले उसकी सभी शर्तों को अच्छी तरह समझ लेना चाहिए।</p>
<p><strong>उपाय: </strong>बुधवार को भगवान गणेश की पूजा करें और हरी मूंग का दान करें।</p>
<p><strong>इन तीन राशियों को किन बातों का रखना चाहिए ध्यान?</strong><br />ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार तुला, कुंभ और मीन राशि के जातकों को बुध के इस गोचर के दौरान खासतौर पर इन बातों का ध्यान रखना चाहिए:</p>
<ul>
<li>बिना जानकारी के बड़ा आर्थिक फैसला लेने से बचें।</li>
<li>निवेश करने से पहले जोखिम और शर्तों की जांच करें।</li>
<li>जरूरी दस्तावेजों को पढ़े बिना हस्ताक्षर न करें।</li>
<li>अनावश्यक खर्चों को नियंत्रित रखें।</li>
<li>बिजनेस पार्टनरशिप में सभी शर्तें पहले से स्पष्ट रखें।</li>
<li>रिश्तों में छोटी बातों को विवाद का कारण न बनने दें।</li>
<li>महत्वपूर्ण फैसलों में जल्दबाजी करने से बचें।</li>
</ul>
<p><strong>Disclaimer: यह लेख ज्योतिषीय मान्यताओं और सामान्य जानकारी पर आधारित है। ग्रहों के गोचर से जुड़े प्रभावों को लेकर अलग-अलग ज्योतिषीय मत हो सकते हैं। इसे निश्चित भविष्यवाणी के रूप में न लें।</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>धर्म कला संस्कृति</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 05 Sep 2026 09:10:16 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[मनीशंकर पांडेय]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>जन्माष्टमी पर आज खुलेगा बांधवगढ़ का अनोखा धाम, साल में सिर्फ एक दिन मिलते हैं श्रीराम-जानकी के दर्शन, होगी विशेष पूजा-अर्चना</title>
                                    <description><![CDATA[<p class="MsoNormal" style="line-height:normal;"><strong><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;color:#000000;" xml:lang="hi">उमरिया</span></strong><span style="font-family:Mangal, serif;color:#000000;"><strong> : </strong><span lang="hi" xml:lang="hi">मध्य प्रदेश के उमरिया जिले में बांधवगढ़ का नाम आते ही घने जंगल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बाघ और ऐतिहासिक किले की तस्वीर सामने आती है। लेकिन इन्हीं जंगलों और पहाड़ियों के बीच आस्था का एक ऐसा धाम भी है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसके कपाट साल में केवल एक दिन श्रद्धालुओं के लिए खुलते हैं। आज श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के अवसर पर बांधवगढ़ किले में स्थित श्रीराम-जानकी मंदिर के दर्शन का विशेष अवसर श्रद्धालुओं को मिलेगा। </span></span><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;color:#000000;" xml:lang="hi">प्रकृति की गोद में बसे इस प्राचीन मंदिर तक पहुंचना किसी सामान्य मंदिर की यात्रा जैसा नहीं है। जंगल और पहाड़ी रास्तों से होकर श्रद्धालुओं को कठिन चढ़ाई</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.nationaljagatvision.com/ritual-culture/the-unique-dham-of-bandhavgarh-will-open-today-on-janmashtami/article-12229"><img src="https://www.nationaljagatvision.com/media/400/2026-09/bandhavdeesh-temple-bandhavgarh-madhya-pradesh-1024x768.jpg" alt=""></a><br /><p class="MsoNormal" style="line-height:normal;"><strong><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;color:#000000;" xml:lang="hi">उमरिया</span></strong><span style="font-family:Mangal, serif;color:#000000;"><strong> : </strong><span lang="hi" xml:lang="hi">मध्य प्रदेश के उमरिया जिले में बांधवगढ़ का नाम आते ही घने जंगल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बाघ और ऐतिहासिक किले की तस्वीर सामने आती है। लेकिन इन्हीं जंगलों और पहाड़ियों के बीच आस्था का एक ऐसा धाम भी है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसके कपाट साल में केवल एक दिन श्रद्धालुओं के लिए खुलते हैं। आज श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के अवसर पर बांधवगढ़ किले में स्थित श्रीराम-जानकी मंदिर के दर्शन का विशेष अवसर श्रद्धालुओं को मिलेगा। </span></span><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;color:#000000;" xml:lang="hi">प्रकृति की गोद में बसे इस प्राचीन मंदिर तक पहुंचना किसी सामान्य मंदिर की यात्रा जैसा नहीं है। जंगल और पहाड़ी रास्तों से होकर श्रद्धालुओं को कठिन चढ़ाई पूरी करनी पड़ती है। रास्ते में चारों ओर घना जंगल</span><span style="font-family:Mangal, serif;color:#000000;">, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऊंची-नीची पहाड़ियां और वन्यजीवों की मौजूदगी इस धार्मिक यात्रा को अलग ही स्वरूप देती है। </span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="line-height:normal;"><strong><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;color:#000000;" xml:lang="hi">साल में सिर्फ एक दिन खुलते हैं कपाट</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="line-height:normal;"><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;color:#000000;" xml:lang="hi"><img src="https://www.nationaljagatvision.com/media/2026-09/44830aef-2440-4e68-86cc-a1aa34095466_1693984198718.jpg" alt="44830aef-2440-4e68-86cc-a1aa34095466_1693984198718" width="1200" height="900"></img></span></p>
<p class="MsoNormal" style="line-height:normal;"><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;color:#000000;" xml:lang="hi">बांधवगढ़ किले के भीतर स्थित श्रीराम-जानकी मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि साल में केवल आज जन्माष्टमी के दिन श्रद्धालुओं को यहां दर्शन का अवसर मिलता है। यही वजह है कि आज के दिन मंदिर पहुंचने वाले भक्तों में विशेष उत्साह देखने को मिल रहा हैं। सुबह से ही श्रद्धालुओं के पहुंचने का सिलसिला शुरू हो गया है। कठिन रास्ते और लंबी पैदल यात्रा के बावजूद लोग भगवान श्रीराम-जानकी के दर्शन के लिए पहाड़ की ओर बढ़ रहे हैं। जन्माष्टमी के अवसर पर मंदिर में विशेष पूजा-अर्चना और धार्मिक आयोजन भी किए जा रहा हैं।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="line-height:normal;"><strong><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;color:#000000;" xml:lang="hi">श्रीराम से जुड़ी है बांधवगढ़ की मान्यता</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="line-height:normal;"><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;color:#000000;" xml:lang="hi">बांधवगढ़ के इतिहास और धार्मिक परंपराओं में भगवान श्रीराम का विशेष स्थान माना जाता है। प्रसिद्ध मान्यता के अनुसार भगवान श्रीराम ने बांधवगढ़ का किला अपने भाई लक्ष्मण को दिया था। इसी वजह से इसे </span><span style="font-family:Mangal, serif;color:#000000;">‘<span lang="hi" xml:lang="hi">बांधवगढ़</span>’ <span lang="hi" xml:lang="hi">नाम मिलने की लोकमान्यता प्रचलित है। किले और मंदिर से जुड़ी ये मान्यताएं आज भी स्थानीय लोगों और श्रद्धालुओं की आस्था का हिस्सा हैं। इतिहास</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">धर्म और प्राकृतिक सौंदर्य का यह मेल बांधवगढ़ को दूसरे धार्मिक स्थलों से अलग पहचान देता है।</span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="line-height:normal;"><strong><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;color:#000000;" xml:lang="hi">बाघों के बीच आस्था की कठिन राह</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="line-height:normal;"><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;color:#000000;" xml:lang="hi">बांधवगढ़ देश के प्रसिद्ध बाघ अभयारण्यों में शामिल है। जंगल में वन्यजीवों की मौजूदगी के कारण मंदिर तक श्रद्धालुओं की आवाजाही भी विशेष व्यवस्था और निगरानी के बीच की गई है। वन विभाग और प्रशासन की ओर से श्रद्धालुओं की सुरक्षा का ध्यान रखा जा रहा है। एक तरफ जंगल का रोमांच और दूसरी तरफ भगवान के दर्शन की श्रद्धा</span><span style="font-family:Mangal, serif;color:#000000;">—<span lang="hi" xml:lang="hi">यही इस यात्रा को खास बना रही है।</span></span></p>
<p class="MsoNormal" style="line-height:normal;"><strong><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;color:#000000;" xml:lang="hi">रीवा राजघराने से भी जुड़ी परंपरा</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="line-height:normal;"><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;color:#000000;" xml:lang="hi">बांधवगढ़ की धार्मिक परंपराओं का संबंध पूर्व रीवा रियासत से भी जुड़ा रहा है। जन्माष्टमी के अवसर पर राजपरिवार के वंशजों द्वारा मंदिर में पूजा-अर्चना किए जाने की परंपरा का भी उल्लेख मिलता है। लंबे समय से चली आ रही इस परंपरा ने मंदिर की धार्मिक महत्ता को और बढ़ाया है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="line-height:normal;"><strong><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;color:#000000;" xml:lang="hi">मन्नत लेकर पहुंच रहे हैं श्रद्धालु</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="line-height:normal;"><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;color:#000000;" xml:lang="hi"><img src="https://www.nationaljagatvision.com/media/2026-09/02uma_6_02092026_611_jpg.jpg" alt="02UMA_6_02092026_611_JPG" width="1370" height="850"></img></span></p>
<p class="MsoNormal" style="line-height:normal;"><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;color:#000000;" xml:lang="hi">स्थानीय मान्यताओं में श्रीराम-जानकी मंदिर को मनोकामना पूरी करने वाला आस्था स्थल माना जाता है। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि सच्चे मन से यहां मांगी गई मन्नत पूरी होती है। यही विश्वास है कि हर वर्ष लोग कठिन चढ़ाई और जंगल के रास्ते की परवाह किए बिना इस धाम तक पहुंचत रहे हैं।</span><br /><br /><span style="font-family:Mangal, serif;color:#000000;"> </span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>धर्म कला संस्कृति</category>
                                    

                <link>https://www.nationaljagatvision.com/ritual-culture/the-unique-dham-of-bandhavgarh-will-open-today-on-janmashtami/article-12229</link>
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                <pubDate>Fri, 04 Sep 2026 16:51:23 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[मनीशंकर पांडेय]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>Plants on Terrace Vastu: छत पर गमले रखने से पहले जान लें वास्तु के ये नियम, इन दिशाओं में पौधे रखना माना जाता है बेहतर</title>
                                    <description><![CDATA[<p><strong>Plants on Roof Vastu:</strong> घर को हरा-भरा और खूबसूरत बनाने के लिए आजकल लोग बालकनी से लेकर छत तक पौधे लगाते हैं। कई लोग अपनी छत को ही छोटे से रूफ गार्डन में बदल देते हैं। हालांकि, वास्तु शास्त्र में घर में पौधे रखने को लेकर कुछ मान्यताएं बताई गई हैं। खासकर छत पर गमले और पौधे रखने के मामले में दिशा और संख्या का ध्यान रखने की सलाह दी जाती है।</p>
<p>वास्तु मान्यताओं के अनुसार, गलत दिशा में या जरूरत से ज्यादा पौधे रखने से घर के ऊर्जा संतुलन पर असर पड़ सकता है। यही वजह है कि अगर</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.nationaljagatvision.com/ritual-culture/plants-on-terrace-vastu-before-placing-pots-on-the-terrace/article-12209"><img src="https://www.nationaljagatvision.com/media/400/2026-09/plants-on-terrace.webp" alt=""></a><br /><p><strong>Plants on Roof Vastu:</strong> घर को हरा-भरा और खूबसूरत बनाने के लिए आजकल लोग बालकनी से लेकर छत तक पौधे लगाते हैं। कई लोग अपनी छत को ही छोटे से रूफ गार्डन में बदल देते हैं। हालांकि, वास्तु शास्त्र में घर में पौधे रखने को लेकर कुछ मान्यताएं बताई गई हैं। खासकर छत पर गमले और पौधे रखने के मामले में दिशा और संख्या का ध्यान रखने की सलाह दी जाती है।</p>
<p>वास्तु मान्यताओं के अनुसार, गलत दिशा में या जरूरत से ज्यादा पौधे रखने से घर के ऊर्जा संतुलन पर असर पड़ सकता है। यही वजह है कि अगर आप भी अपनी छत पर गार्डन बनाने की सोच रहे हैं, तो वास्तु से जुड़े इन नियमों को जान लेना उपयोगी हो सकता है।</p>
<p><strong>क्या छत पर पौधे रखना अशुभ माना जाता है?</strong><br />वास्तु शास्त्र की कुछ मान्यताओं में छत पर बड़ी संख्या में पौधे या भारी गमले रखना उचित नहीं माना जाता। विशेष रूप से पूरी छत को बहुत अधिक गमलों से भर देने से बचने की सलाह दी जाती है। हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि छत पर किसी भी तरह का पौधा नहीं रखा जा सकता। वास्तु के अनुसार पौधों की दिशा, संख्या और व्यवस्था को संतुलित रखना महत्वपूर्ण माना जाता है।</p>
<p><strong>छत का संबंध राहु और पौधों का बुध से</strong><br />ज्योतिषीय मान्यताओं में घर की छत को राहु से जोड़ा जाता है, जबकि हरे पेड़-पौधों का संबंध बुध ग्रह से माना जाता है। बुध को बुद्धि, वाणी, शिक्षा और हरियाली का कारक माना गया है, वहीं राहु को भ्रम और अस्थिरता से जोड़कर देखा जाता है। इसी ज्योतिषीय मान्यता के आधार पर कुछ वास्तु विशेषज्ञ छत पर अत्यधिक हरियाली या पौधों की भीड़ से बचने की सलाह देते हैं। हालांकि, यह धार्मिक और ज्योतिषीय मान्यता है, इसका कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है।</p>
<p><strong>क्या पूरी छत को रूफ गार्डन बनाना सही है?</strong><br />अगर आप छत पर पौधे लगाना चाहते हैं, तो वास्तु मान्यताओं के अनुसार बहुत अधिक संख्या में बड़े और भारी गमले रखने से बचना बेहतर माना जाता है। छोटे और सीमित संख्या में पौधे रखकर छत को व्यवस्थित तरीके से सजाया जा सकता है। वास्तु के अनुसार पौधों को पश्चिम दिशा की ओर रखना बेहतर माना जाता है। गमलों को एक जगह व्यवस्थित ढंग से रखने की सलाह दी जाती है, जिससे छत का बाकी हिस्सा खुला और ज्यादा भारी न लगे।</p>
<p><strong>उत्तर और पूर्व दिशा को रखें खुला</strong><br />वास्तु शास्त्र में उत्तर और पूर्व दिशाओं को विशेष महत्व दिया जाता है। इन दिशाओं को हल्का और खुला रखना शुभ माना जाता है। इसलिए इन स्थानों पर बहुत अधिक संख्या में भारी गमले या अन्य सामान रखने से बचने की सलाह दी जाती है। मान्यता के अनुसार, उत्तर और पूर्व दिशा में अधिक भार या अव्यवस्था होने से सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह प्रभावित हो सकता है। इसे परिवार की प्रगति, शिक्षा और नए अवसरों से भी जोड़कर देखा जाता है।</p>
<p><strong>सूखे और मुरझाए पौधे तुरंत हटाएं</strong><br />अगर छत पर पौधे रखे हैं तो उनकी नियमित देखभाल भी जरूरी है। सूखे, मुरझाए या खराब हो चुके पौधों को लंबे समय तक वहीं पड़े रहने देना वास्तु की दृष्टि से अच्छा नहीं माना जाता। समय-समय पर पौधों की छंटाई करें, सूखे पत्ते हटाएं और खराब पौधों को बदल दें। इससे छत साफ-सुथरी और व्यवस्थित भी बनी रहेगी।</p>
<p><strong>जरूरी बात</strong><br />छत पर पौधे रखना शुभ है या अशुभ, इसे लेकर अलग-अलग वास्तु और ज्योतिषीय मान्यताएं मिलती हैं। इसलिए इसे निश्चित धार्मिक नियम के रूप में नहीं, बल्कि वास्तु संबंधी मान्यता के तौर पर देखना चाहिए। पौधों की संख्या और दिशा तय करते समय छत की संरचना, पानी की निकासी और सुरक्षा का भी ध्यान रखना जरूरी है।</p>
<p><strong>Disclaimer: इस लेख में दी गई जानकारी वास्तु और ज्योतिषीय मान्यताओं तथा सामान्य जानकारियों पर आधारित है। इन मान्यताओं का कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। नेशनल जगत विजन इसकी पुष्टि नहीं करता है।</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>धर्म कला संस्कृति</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 04 Sep 2026 09:19:12 +0530</pubDate>
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