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                <title>हेल्थ - National Jagat Vision</title>
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                            <item>
                <title>Dengue Symptoms: क्या बिना बुखार के भी हो सकता है डेंगू? जानिए ऐसे लक्षण जिन्हें नजरअंदाज करना पड़ सकता है भारी</title>
                                    <description><![CDATA[<p>मानसून के मौसम में बुखार, बदन दर्द, उल्टी, कमजोरी या पेट खराब होने जैसी समस्याएं बढ़ जाती हैं। ऐसे लक्षण सामने आने पर अक्सर डेंगू की आशंका होने लगती है। आमतौर पर डेंगू को तेज बुखार, सिरदर्द और मांसपेशियों या जोड़ों में दर्द से जोड़कर देखा जाता है, लेकिन हर संक्रमित व्यक्ति में एक जैसे लक्षण दिखाई दें, यह जरूरी नहीं है।</p>
<p>कुछ लोगों में डेंगू का संक्रमण बेहद हल्के लक्षणों के साथ हो सकता है, जबकि कुछ मामलों में लक्षण असामान्य रूप में भी सामने आ सकते हैं। इसलिए केवल बुखार की मौजूदगी या गैर-मौजूदगी के आधार पर डेंगू</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.nationaljagatvision.com/health/dengue-symptoms-can-dengue-occur-even-without-fever-know-such/article-12416"><img src="https://www.nationaljagatvision.com/media/400/2026-09/atypical-dengue-can-occur-without-fever-doctors-explain-symptoms.webp" alt=""></a><br /><p>मानसून के मौसम में बुखार, बदन दर्द, उल्टी, कमजोरी या पेट खराब होने जैसी समस्याएं बढ़ जाती हैं। ऐसे लक्षण सामने आने पर अक्सर डेंगू की आशंका होने लगती है। आमतौर पर डेंगू को तेज बुखार, सिरदर्द और मांसपेशियों या जोड़ों में दर्द से जोड़कर देखा जाता है, लेकिन हर संक्रमित व्यक्ति में एक जैसे लक्षण दिखाई दें, यह जरूरी नहीं है।</p>
<p>कुछ लोगों में डेंगू का संक्रमण बेहद हल्के लक्षणों के साथ हो सकता है, जबकि कुछ मामलों में लक्षण असामान्य रूप में भी सामने आ सकते हैं। इसलिए केवल बुखार की मौजूदगी या गैर-मौजूदगी के आधार पर डेंगू को पूरी तरह खारिज करना सही नहीं माना जाता।</p>
<p><strong>क्या बिना बुखार के डेंगू हो सकता है?</strong><br />डेंगू संक्रमण का सबसे आम लक्षण बुखार है, लेकिन हर व्यक्ति में बीमारी एक जैसी नहीं होती। कुछ संक्रमित लोगों में बहुत हल्के लक्षण हो सकते हैं या कोई स्पष्ट लक्षण भी नहीं दिख सकता। कुछ मामलों में बुखार प्रमुख लक्षण नहीं होता और मरीज कमजोरी, शरीर दर्द या पेट से जुड़ी परेशानियों की शिकायत कर सकता है।</p>
<p>हालांकि, सिर्फ कमजोरी, उल्टी या पेट दर्द होने का मतलब डेंगू होना नहीं है। इन लक्षणों के कई अन्य कारण भी हो सकते हैं। यदि आपके इलाके में डेंगू के मामले बढ़ रहे हैं और अचानक ऐसे लक्षण दिखाई देते हैं, तो डॉक्टर से सलाह लेना बेहतर है।</p>
<p><strong>क्या है एटिपिकल डेंगू?</strong><br />जब डेंगू संक्रमण में सामान्य लक्षणों के बजाय असामान्य या अलग तरह के लक्षण प्रमुखता से दिखाई देते हैं, तो इसे आम बोलचाल में एटिपिकल डेंगू कहा जाता है। ऐसे मामलों में मरीज को पेट से जुड़ी समस्याएं अधिक परेशान कर सकती हैं।</p>
<p><strong>संभावित लक्षणों में शामिल हैं:</strong></p>
<ul>
<li>लगातार उल्टी या मतली</li>
<li>पेट में दर्द</li>
<li>दस्त या पाचन संबंधी परेशानी</li>
<li>अत्यधिक कमजोरी या थकान</li>
<li>सिरदर्द</li>
<li>आंखों के आसपास या आंखों के पीछे दर्द</li>
<li>मांसपेशियों और जोड़ों में दर्द</li>
<li>भूख कम लगना</li>
<li>त्वचा पर लाल चकत्ते या दाने</li>
</ul>
<p>दुर्लभ और गंभीर परिस्थितियों में डेंगू शरीर के महत्वपूर्ण अंगों को भी प्रभावित कर सकता है। इसलिए असामान्य लक्षणों को हल्के में नहीं लेना चाहिए।</p>
<p><strong>बुखार उतरने के बाद भी क्यों जरूरी है सावधानी?</strong><br />डेंगू को लेकर एक आम गलतफहमी है कि बुखार कम होते ही मरीज खतरे से बाहर आ जाता है। वास्तव में बीमारी के कुछ मामलों में बुखार कम होने के आसपास का समय भी महत्वपूर्ण हो सकता है। इसी अवधि में गंभीर डेंगू के संकेत विकसित हो सकते हैं। इसलिए मरीज का बुखार कम होने के बाद भी उसकी स्थिति पर नजर रखना जरूरी है। शरीर में पानी की कमी, कमजोरी, रक्तस्राव या अन्य गंभीर लक्षण दिखाई देने पर तुरंत चिकित्सकीय सहायता लेनी चाहिए।</p>
<p><strong>ये लक्षण दिखें तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें</strong><br />डेंगू की आशंका के दौरान कुछ चेतावनी संकेतों को बिल्कुल नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। जैसे:</p>
<ul>
<li>तेज या लगातार पेट दर्द</li>
<li>बार-बार उल्टी</li>
<li>सांस लेने में परेशानी</li>
<li>नाक या मसूड़ों से खून आना</li>
<li>उल्टी या मल में खून आना</li>
<li>अत्यधिक बेचैनी या असामान्य सुस्ती</li>
<li>अचानक कमजोरी बढ़ना</li>
<li>शरीर में पानी की कमी के संकेत</li>
</ul>
<p>ऐसे लक्षण गंभीर बीमारी की ओर इशारा कर सकते हैं और इनमें तत्काल चिकित्सकीय मूल्यांकन जरूरी हो सकता है।</p>
<p><strong>केवल प्लेटलेट्स देखकर डेंगू की गंभीरता तय नहीं होती</strong><br />डेंगू के दौरान प्लेटलेट्स की संख्या कम हो सकती है, लेकिन केवल प्लेटलेट काउंट देखकर बीमारी की गंभीरता तय करना सही तरीका नहीं है। डॉक्टर मरीज के लक्षण, ब्लड टेस्ट, रक्तस्राव के संकेत, पानी की स्थिति और अन्य चिकित्सकीय मानकों को देखकर बीमारी का आकलन करते हैं। इसलिए रिपोर्ट में प्लेटलेट्स कम देखकर खुद से दवा लेना या घबराना उचित नहीं है। इसी तरह सामान्य प्लेटलेट्स होने पर भी गंभीर लक्षणों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।</p>
<p><strong>डेंगू की आशंका हो तो क्या करें?</strong><br />अगर आपके आसपास डेंगू के मामले सामने आ रहे हैं और आपको अचानक कमजोरी, उल्टी, शरीर में दर्द, पेट की परेशानी या त्वचा पर दाने जैसे लक्षण महसूस होते हैं, तो डॉक्टर से सलाह लें। जरूरत पड़ने पर चिकित्सक उचित जांच की सलाह दे सकते हैं।</p>
<p>डेंगू में पर्याप्त तरल पदार्थ लेना महत्वपूर्ण हो सकता है, लेकिन इलाज और दवाओं का चुनाव डॉक्टर की सलाह के अनुसार ही करना चाहिए। किसी भी दवा को, खासकर दर्द या बुखार की दवा को, खुद से लेने से पहले चिकित्सकीय सलाह लेना बेहतर है।</p>
<p>डेंगू का सबसे आम लक्षण बुखार जरूर है, लेकिन हर संक्रमित व्यक्ति में एक जैसे लक्षण दिखाई दें, यह जरूरी नहीं। कुछ मामलों में लक्षण बेहद हल्के या असामान्य हो सकते हैं। खासकर डेंगू के प्रकोप वाले मौसम में लगातार कमजोरी, उल्टी, पेट दर्द, शरीर दर्द या रक्तस्राव जैसे लक्षणों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।</p>
<p><strong>डिस्क्लेमर: यह लेख केवल सामान्य स्वास्थ्य जानकारी के उद्देश्य से है। लक्षणों के आधार पर डेंगू की पुष्टि नहीं की जा सकती। डेंगू की जांच और उपचार के लिए योग्य डॉक्टर की सलाह और आवश्यक चिकित्सकीय जांच जरूरी है। गंभीर लक्षण होने पर तुरंत चिकित्सा सहायता लें।</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>हेल्थ</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 12 Sep 2026 10:54:00 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[अदिती मजुमदार ]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>घर में खाना बनाने वाली महिलाओं के लिए भी जरूरी है सावधानी, किचन का धुआं बन सकता है सांसों के लिए परेशानी</title>
                                    <description><![CDATA[<p>फेफड़ों के कैंसर का नाम आते ही सबसे पहले धूम्रपान का ख्याल आता है, लेकिन केवल धूम्रपान करने वाले लोगों में ही इसका खतरा हो, ऐसा नहीं है। धूम्रपान से दूर रहने वाले लोगों में भी लंबे समय तक वायु प्रदूषण, सेकेंड हैंड स्मोक और कुछ तरह के धुएं या रसायनों के संपर्क जैसे कारक फेफड़ों के स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकते हैं। ऐसे में घर की रसोई में रोजाना कई घंटे खाना बनाने वाली महिलाओं के लिए किचन के धुएं और खराब वेंटिलेशन को लेकर सावधानी बरतना जरूरी है।</p>
<p><strong>खाना पकाते समय निकलने वाला धुआं क्यों चिंता का विषय</strong></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.nationaljagatvision.com/health/caution-is-also-necessary-for-women-who-cook-at-home/article-12390"><img src="https://www.nationaljagatvision.com/media/400/2026-09/doctor-explains-how-cooking-oil-can-cause-lung-cancer-in-women.webp" alt=""></a><br /><p>फेफड़ों के कैंसर का नाम आते ही सबसे पहले धूम्रपान का ख्याल आता है, लेकिन केवल धूम्रपान करने वाले लोगों में ही इसका खतरा हो, ऐसा नहीं है। धूम्रपान से दूर रहने वाले लोगों में भी लंबे समय तक वायु प्रदूषण, सेकेंड हैंड स्मोक और कुछ तरह के धुएं या रसायनों के संपर्क जैसे कारक फेफड़ों के स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकते हैं। ऐसे में घर की रसोई में रोजाना कई घंटे खाना बनाने वाली महिलाओं के लिए किचन के धुएं और खराब वेंटिलेशन को लेकर सावधानी बरतना जरूरी है।</p>
<p><strong>खाना पकाते समय निकलने वाला धुआं क्यों चिंता का विषय है?</strong><br />जब तेल को बहुत अधिक तापमान पर गर्म किया जाता है, खासकर तलने या डीप फ्राई करने के दौरान, तो उससे धुआं और हवा में मौजूद बेहद छोटे कण निकल सकते हैं। बंद या कम वेंटिलेशन वाली रसोई में इनका स्तर बढ़ सकता है। ऐसे प्रदूषकों के लगातार संपर्क में आने से आंखों, गले और सांस की नली में जलन जैसी समस्याएं हो सकती हैं।</p>
<p>हालांकि, यह दावा करना सही नहीं है कि कुकिंग ऑयल का धुआं अकेले फेफड़ों के कैंसर का कारण बनता है। फेफड़ों के कैंसर का जोखिम कई अलग-अलग कारणों से प्रभावित हो सकता है। इनमें तंबाकू का सेवन, सेकेंड हैंड स्मोक, वायु प्रदूषण, कुछ औद्योगिक या व्यावसायिक पदार्थों का संपर्क और आनुवंशिक कारक शामिल हैं।</p>
<p><strong>रसोई में धुएं से बचने के लिए क्या करें?</strong><br />रसोई में खाना बनाते समय धुएं को जमा होने देने के बजाय उसे बाहर निकालना सबसे जरूरी है। इसके लिए कुछ आसान सावधानियां अपनाई जा सकती हैं:</p>
<ul>
<li>खाना बनाते समय खिड़की या दरवाजा खुला रखें।</li>
<li>एग्जॉस्ट फैन या किचन चिमनी का इस्तेमाल करें।</li>
<li>तेल को जरूरत से ज्यादा गर्म न करें।</li>
<li>तेल से लगातार धुआं निकलने लगे तो आंच कम कर दें।</li>
<li>डीप फ्राई या तड़का लगाते समय किचन में पर्याप्त वेंटिलेशन रखें।</li>
<li>खराब या बंद एग्जॉस्ट सिस्टम को लंबे समय तक इस्तेमाल न करें।</li>
<li>रसोई में धुएं और जलने की गंध को लगातार जमा न होने दें।</li>
</ul>
<p><strong>किन लक्षणों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए?</strong></p>
<p>लगातार बनी रहने वाली खांसी, सांस लेने में परेशानी, सीने में दर्द, आवाज में बदलाव, बार-बार सांस से जुड़ा संक्रमण, बिना किसी स्पष्ट कारण वजन कम होना या खांसी के साथ खून आना जैसे लक्षण दिखाई दें तो डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है। इनमें से कई लक्षण सामान्य संक्रमण या दूसरी स्वास्थ्य समस्याओं में भी दिखाई दे सकते हैं। इसलिए केवल इन लक्षणों के आधार पर कैंसर की आशंका नहीं लगानी चाहिए। लेकिन अगर समस्या लंबे समय तक बनी रहती है या लगातार बढ़ रही है, तो चिकित्सकीय जांच कराना बेहतर होता है।</p>
<p><strong>धूम्रपान नहीं करने वालों को भी क्यों रहना चाहिए सतर्क?</strong><br />धूम्रपान से बचना फेफड़ों के स्वास्थ्य के लिए सबसे महत्वपूर्ण सावधानियों में से एक है, लेकिन इसके अलावा घर के अंदर और बाहर का वायु प्रदूषण तथा लंबे समय तक अलग-अलग प्रकार के धुएं के संपर्क में रहना भी श्वसन तंत्र को प्रभावित कर सकता है। इसलिए रोजाना कई घंटे रसोई में रहने वाली महिलाओं के लिए किचन में पर्याप्त हवा का आवागमन बनाए रखना महत्वपूर्ण है। इसका फायदा केवल खाना बनाने वाले व्यक्ति को ही नहीं, बल्कि घर के अन्य सदस्यों को भी मिल सकता है।</p>
<p>किचन में खाना पकाने के दौरान निकलने वाले धुएं को पूरी तरह नजरअंदाज नहीं करना चाहिए, लेकिन इसे फेफड़ों के कैंसर का निश्चित या अकेला कारण बताना भी वैज्ञानिक रूप से सही नहीं होगा। बेहतर वेंटिलेशन, धुएं को बाहर निकालने की उचित व्यवस्था और अत्यधिक गर्म तेल से बचाव श्वसन स्वास्थ्य के लिए उपयोगी सावधानियां हैं।</p>
<p><strong>डिस्क्लेमर: यह लेख सामान्य स्वास्थ्य जानकारी के लिए है। किचन के धुएं और फेफड़ों के कैंसर के जोखिम के बीच संबंध कई कारकों पर निर्भर करता है। किसी भी लगातार या गंभीर लक्षण की स्थिति में योग्य डॉक्टर से जांच और सलाह लें।</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>हेल्थ</category>
                                    

                <link>https://www.nationaljagatvision.com/health/caution-is-also-necessary-for-women-who-cook-at-home/article-12390</link>
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                <pubDate>Fri, 11 Sep 2026 10:54:07 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[अदिती मजुमदार ]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>बहुत गर्म चाय-कॉफी से बढ़ सकता है कैंसर का खतरा? रिसर्च में सामने आया चौंकाने वाला कनेक्शन</title>
                                    <description><![CDATA[<p>चाय और कॉफी भारत में रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा हैं। सुबह की शुरुआत हो या काम के बीच थकान दूर करनी हो, ज्यादातर लोग गर्म चाय या कॉफी पीना पसंद करते हैं। लेकिन अगर आपको बेहद गर्म चाय या कॉफी पीने की आदत है, तो इसे लेकर थोड़ी सावधानी बरतना जरूरी है। कुछ शोधों में बहुत गर्म पेय पदार्थों और भोजन की नली (Esophagus) के कैंसर के बढ़े हुए जोखिम के बीच संबंध पाया गया है। इसका कारण अत्यधिक गर्म पेय से भोजन नली की अंदरूनी परत को बार-बार होने वाली गर्मी की चोट माना जाता है।</p>
<p><strong>कितनी गर्म</strong></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.nationaljagatvision.com/health/very-hot-tea-and-coffee-can-increase-the-risk-of/article-12366"><img src="https://www.nationaljagatvision.com/media/400/2026-09/study-finds-how-very-hot-tea-and-coffee-drinking-habit-can-cause-esophageal-cancer-risk.webp" alt=""></a><br /><p>चाय और कॉफी भारत में रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा हैं। सुबह की शुरुआत हो या काम के बीच थकान दूर करनी हो, ज्यादातर लोग गर्म चाय या कॉफी पीना पसंद करते हैं। लेकिन अगर आपको बेहद गर्म चाय या कॉफी पीने की आदत है, तो इसे लेकर थोड़ी सावधानी बरतना जरूरी है। कुछ शोधों में बहुत गर्म पेय पदार्थों और भोजन की नली (Esophagus) के कैंसर के बढ़े हुए जोखिम के बीच संबंध पाया गया है। इसका कारण अत्यधिक गर्म पेय से भोजन नली की अंदरूनी परत को बार-बार होने वाली गर्मी की चोट माना जाता है।</p>
<p><strong>कितनी गर्म चाय-कॉफी से बचना चाहिए?</strong><br />चाय या कॉफी तैयार करते समय उसका तापमान काफी अधिक हो सकता है। कप में डालने के बाद भी पेय लंबे समय तक बहुत गर्म रह सकता है। कुछ शोधों में करीब 65 डिग्री सेल्सियस से अधिक तापमान वाले पेय को लेकर सावधानी बरतने की बात कही गई है। हालांकि, किसी एक तापमान को हर व्यक्ति के लिए कैंसर की निश्चित सीमा मानना सही नहीं होगा। विशेषज्ञों की सलाह है कि चाय या कॉफी को कुछ देर ठंडा होने दें और तभी पिएं, जब वह आराम से पीने लायक तापमान पर आ जाए। केवल गर्म चाय या कॉफी पीने से कैंसर होना तय नहीं है, लेकिन लंबे समय तक बेहद गर्म पेय पीने की आदत जोखिम को प्रभावित कर सकती है।</p>
<p><strong>बड़ी स्टडी में सामने आया गर्म पेय का कनेक्शन</strong><br />ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी से जुड़े शोध में बड़ी संख्या में लोगों के स्वास्थ्य और पेय पदार्थों के सेवन से जुड़े आंकड़ों का विश्लेषण किया गया। शोधकर्ताओं ने गर्म पेय पदार्थों के सेवन और इसोफेजियल कैंसर के जोखिम के बीच संबंध पर गौर किया। ऐसे शोधों से यह संकेत मिलता है कि बहुत अधिक तापमान वाले पेय पदार्थ भोजन नली को नुकसान पहुंचा सकते हैं और लंबे समय में कैंसर के जोखिम को प्रभावित कर सकते हैं। हालांकि, इस तरह की स्टडी किसी व्यक्ति के लिए यह साबित नहीं करती कि गर्म चाय या कॉफी पीने से सीधे कैंसर होगा। कैंसर के जोखिम में उम्र, तंबाकू और शराब का सेवन, मोटापा, खानपान और अन्य कई कारक भी भूमिका निभाते हैं।</p>
<p><strong>दूसरी रिसर्च में लोगों को कितना गर्म लगा पेय?</strong><br />एक अन्य अध्ययन में वयस्कों को अलग-अलग तापमान पर ब्लैक कॉफी पीने के लिए दी गई। अध्ययन में पाया गया कि ज्यादातर प्रतिभागियों को करीब 70 डिग्री सेल्सियस या उससे अधिक तापमान वाली कॉफी बहुत गर्म लगी। इससे यह संकेत मिलता है कि लोग अपनी सुविधा के अनुसार भी यह पहचान सकते हैं कि पेय पीने के लिए कितना गर्म है। इसलिए चाय या कॉफी को तुरंत गर्म-गर्म पीने के बजाय कुछ समय इंतजार करना बेहतर विकल्प हो सकता है। खासतौर पर अगर पेय पीते समय जीभ या मुंह में जलन महसूस हो रही हो, तो उसे और ठंडा होने देना चाहिए।</p>
<p><strong>बहुत गर्म पेय भोजन नली को कैसे प्रभावित कर सकता है?</strong><br />भोजन की नली यानी इसोफेगस हमारे मुंह से पेट तक भोजन पहुंचाने का काम करती है। बेहद गर्म पेय बार-बार पीने से इसकी अंदरूनी परत को गर्मी से चोट पहुंच सकती है। अगर लंबे समय तक ऐसी आदत बनी रहती है, तो इससे होने वाली बार-बार की जलन और क्षति कैंसर के जोखिम से जुड़ी हो सकती है। कुछ अन्य अध्ययनों में भी बहुत गर्म पेय पदार्थों और इसोफेजियल कैंसर के बीच संबंध की ओर संकेत किया गया है। हालांकि, इस संबंध को समझने के लिए अभी और शोध की जरूरत है।</p>
<p><strong>कितने तापमान पर पीना बेहतर है?</strong><br />गर्म पेय को किसी तय तापमान पर ही पीना जरूरी नहीं है। आसान नियम यह है कि चाय या कॉफी को तब तक ठंडा होने दें, जब तक वह आराम से पीने लायक न हो और मुंह या गले में जलन महसूस न हो। इसके अलावा तंबाकू और शराब से दूरी, संतुलित खानपान, स्वस्थ वजन और नियमित शारीरिक गतिविधि जैसी आदतें भी कैंसर के जोखिम को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। अगर लंबे समय से निगलने में परेशानी, लगातार सीने में जलन, अपच, सीने या गले में दर्द या बिना वजह वजन कम होने जैसे लक्षण दिखाई दें, तो डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>हेल्थ</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 10 Sep 2026 10:42:46 +0530</pubDate>
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                <title>जुनेजा आई हॉस्पिटल में डॉक्टर की गुंडागर्दी, इलाज कराने आए मरीज को बेइज्जत कर अस्पताल से निकाला*</title>
                                    <description><![CDATA[<p>बिलासपुर।शहर के सी.एम.डी. चौक स्थित अपोलो सिटी सेण्टर के ऊपर संचालित जुनेजा सुपर स्पेशलिटी आई हॉस्पिटल में मरीजों के साथ अभद्रता और अस्पताल से जबरन बाहर निकलने का मामला सामने आया है। मामले को देख कर ऐसा लगता है कि इस 'सुपर स्पेशलिटी' अस्पताल में आंखों के इलाज के साथ मरीजों की 'सुपर' बेइज्जती की सुविधा एकदम मुफ्त दी जा रही है। </p>
<p>आरोप है कि अस्पताल के डॉ. राकेश जुनेजा पर इलाज कराने आई वृद्ध महिला तथा उनके बेटे के साथ दुर्व्यवहार करने, चिल्लाने तथा उन्हें उंगली दिखाते हुए बेइज्जत कर अस्पताल से बाहर निकाल दिया । मामले की शिकायत</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.nationaljagatvision.com/crime/doctors-hooliganism-in-juneja-eye-hospital-patient-who-came-for/article-12370"><img src="https://www.nationaljagatvision.com/media/400/2026-09/image_search_1788964246062.jpg" alt=""></a><br /><p>बिलासपुर।शहर के सी.एम.डी. चौक स्थित अपोलो सिटी सेण्टर के ऊपर संचालित जुनेजा सुपर स्पेशलिटी आई हॉस्पिटल में मरीजों के साथ अभद्रता और अस्पताल से जबरन बाहर निकलने का मामला सामने आया है। मामले को देख कर ऐसा लगता है कि इस 'सुपर स्पेशलिटी' अस्पताल में आंखों के इलाज के साथ मरीजों की 'सुपर' बेइज्जती की सुविधा एकदम मुफ्त दी जा रही है। </p>
<p>आरोप है कि अस्पताल के डॉ. राकेश जुनेजा पर इलाज कराने आई वृद्ध महिला तथा उनके बेटे के साथ दुर्व्यवहार करने, चिल्लाने तथा उन्हें उंगली दिखाते हुए बेइज्जत कर अस्पताल से बाहर निकाल दिया । मामले की शिकायत पीड़ित के परिजनों ने मुख्यमंत्री, स्वास्थ्य सेवाएं संचालक, जिला प्रशासन तथा जिला चिकित्सा कार्यालय बिलासपुर से करते हुए कठोर कार्रवाई की मांग की है।</p>
<p>शिकायतकर्ता आफताब अहमद खान ने बताया कि वे अपनी माता श्रीमती मखमूर जहाँ के मोतियाबिंद के ऑपरेशन की काउंसलिंग के लिए 2 तथा 3 सितंबर को जुनेजा सुपर स्पेशलिटी आई हॉस्पिटल गए थे। वहां काउंसलर द्वारा बताया गया कि अस्पताल में मोतियाबिंद का ऑपरेशन प्रतिदिन होता है। उन्हें दूसरे दिन सुबह 10 बजे आने के लिए कहा गया।</p>
<p>तय समय के अनुसार 4 सितंबर को सुबह 10 बजे आफताब अपनी बुजुर्ग माँ को लेकर ऑपरेशन के लिए पुनः जुनेजा अस्पताल पहुंचे। जैसे ही वे दोनों रिसेप्शन के सामने बैठे, अंदर से डॉ. राकेश जुनेजा की अपने ही स्टाफ पर जोर-जोर से चिल्लाने की आवाज बाहर आने लगी। शिकायत के अनुसार, जैसे ही डॉ. जुनेजा रिसेप्शन के पास बाहर आए, उन्होंने आफताब व उनकी माता को उंगली दिखाते हुए बहुत अभद्र रवैये के साथ तीन बार बाहर जाने के लिए कहा।</p>
<p>जब आफताब ने डॉ. जुनेजा को आराम से बात करने को कहा तथा बताया कि वे वहां इलाज करवाने आए हैं, तो डॉक्टर ने कहा, "चप्पल बाहर उतार कर आ।" डॉक्टर की यह तीखी भाषा सुनकर वृद्ध मां घबरा गईं। इस पर आफताब ने बोला, "व्हाट इज दिस बिहेवियर? क्या आप अपने सभी पेशेंट्स से ऐसे बात करते हो?" इसके जवाब में डॉ. जुनेजा ने कहा कि मेरा समय खराब मत करो मेरी मीटिंग/वीसी है। मरीज सामने इलाज की आस में खड़ा था, लेकिन डॉक्टर साहब के लिए उनका वीआईपी रुतबा और मीटिंग इतनी अहम थी कि उन्हें मरीज की तकलीफ और उम्र का भी लिहाज नहीं रहा।</p>
<p>आफताब ने भी जवाब दिया कि दूरदराज से लोग इलाज कराने आते हैं, मीटिंग/वीसी होना मरीज की समस्या नहीं है। इतना सुनते ही डॉ. जुनेजा चिल्लाते हुए अस्पताल से बाहर चले गए।</p>
<p>आफताब अहमद खान ने अपनी शिकायत में बताया है कि इस घटना की पुष्टि के लिए अस्पताल में लगे सी.सी.टी.वी. फुटेज निकलवाए जा सकते हैं। उन्होंने प्रशासन से मांग की है कि मरीजों के साथ इस तरह के दुर्व्यवहार के लिए डॉ. राकेश जुनेजा पर जुर्माना लगाया जाए या उनका लाइसेंस निरस्त करते हुए कठोरतम दंडात्मक कार्रवाई की जाए।</p>
<p>उन्होंने अपने शिकायत पत्र में लिखा है कि दूरदराज से हजारों की संख्या में मरीज यहां इलाज कराने आते हैं। यहां इलाज कराने आने का यह मतलब कतई नहीं है कि मरीज अपना आत्मसम्मान बेच दे या पूरे अस्पताल के सामने अपनी बेइज्जती करवाए। ऐसी कार्रवाई होनी चाहिए जिससे भविष्य में किसी अन्य पेशेंट को इस असहज स्थिति का सामना न करना पड़े। शिकायत पत्र के साथ 4 सितंबर 2026 को इलाज हेतु भेजे गई मेडिकल कार्ड की जानकारी भी संलग्न की गई है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>अपराध</category>
                                            <category>बिलासपुर</category>
                                            <category>छत्तीसगढ़</category>
                                            <category>हेल्थ</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 09 Sep 2026 20:01:14 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[मनीशंकर पांडेय]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>Cancer Cases in India: भारतीय पुरुषों में इन 4 कैंसर का खतरा ज्यादा, AIIMS डॉक्टर ने बताए प्रमुख कारण और चेतावनी संकेत</title>
                                    <description><![CDATA[<p><strong>Cancer in Indian Men:</strong> भारत में कैंसर के मामले लगातार एक बड़ी स्वास्थ्य चुनौती बने हुए हैं। पुरुषों में कुछ खास प्रकार के कैंसर अधिक देखने को मिलते हैं, जिनमें मुंह, फेफड़े, कोलोरेक्टल और पेट का कैंसर प्रमुख हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक तंबाकू और शराब का सेवन, धूम्रपान, अस्वास्थ्यकर खानपान, मोटापा, प्रदूषण और कुछ मामलों में पारिवारिक इतिहास जैसे कारक जोखिम बढ़ा सकते हैं। हालांकि, किसी व्यक्ति में कैंसर होने का कारण केवल एक ही वजह नहीं होती और हर व्यक्ति का जोखिम अलग हो सकता है।</p>
<p>कैंसर के मामलों में सबसे महत्वपूर्ण बात इसकी समय पर पहचान और उचित</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.nationaljagatvision.com/health/cancer-cases-in-india-indian-men-are-more-at-risk/article-12338"><img src="https://www.nationaljagatvision.com/media/400/2026-09/most-common-cancers-in-indian-men-aiims-doctor-shares.webp" alt=""></a><br /><p><strong>Cancer in Indian Men:</strong> भारत में कैंसर के मामले लगातार एक बड़ी स्वास्थ्य चुनौती बने हुए हैं। पुरुषों में कुछ खास प्रकार के कैंसर अधिक देखने को मिलते हैं, जिनमें मुंह, फेफड़े, कोलोरेक्टल और पेट का कैंसर प्रमुख हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक तंबाकू और शराब का सेवन, धूम्रपान, अस्वास्थ्यकर खानपान, मोटापा, प्रदूषण और कुछ मामलों में पारिवारिक इतिहास जैसे कारक जोखिम बढ़ा सकते हैं। हालांकि, किसी व्यक्ति में कैंसर होने का कारण केवल एक ही वजह नहीं होती और हर व्यक्ति का जोखिम अलग हो सकता है।</p>
<p>कैंसर के मामलों में सबसे महत्वपूर्ण बात इसकी समय पर पहचान और उचित जांच है। शुरुआती चरण में बीमारी का पता चलने पर कई प्रकार के कैंसर का इलाज अधिक प्रभावी हो सकता है। ऐसे में पुरुषों को शरीर में लंबे समय तक बने रहने वाले असामान्य लक्षणों को नजरअंदाज करने के बजाय डॉक्टर से सलाह लेने की जरूरत है।</p>
<p><strong>भारतीय पुरुषों में किन कैंसर का खतरा ज्यादा?</strong><br />विशेषज्ञों के मुताबिक भारतीय पुरुषों में मुंह का कैंसर प्रमुख कैंसर में शामिल है। इसके अलावा फेफड़ों, कोलोरेक्टल यानी बड़ी आंत और पेट के कैंसर के मामले भी चिंता का विषय हैं। मुंह के कैंसर का जोखिम खासतौर पर तंबाकू, गुटखा, पान-मसाला, सुपारी और धूम्रपान जैसी आदतों से बढ़ सकता है। वहीं फेफड़ों के कैंसर के मामले में धूम्रपान के साथ लंबे समय तक वायु प्रदूषण और पैसिव स्मोकिंग का संपर्क भी जोखिम को प्रभावित कर सकता है।</p>
<p><strong>क्यों बढ़ रहा है कैंसर का खतरा?</strong><br />कैंसर के पीछे कई अलग-अलग कारण हो सकते हैं। कुछ जोखिम कारक व्यक्ति की जीवनशैली से जुड़े होते हैं, जबकि कुछ में उम्र, आनुवंशिक कारण और पारिवारिक इतिहास की भूमिका हो सकती है।</p>
<ul>
<li><strong>मुंह का कैंसर: </strong>तंबाकू, गुटखा, पान-मसाला, सुपारी और शराब जैसे कारक जोखिम बढ़ा सकते हैं।</li>
<li><strong>फेफड़ों का कैंसर: </strong>धूम्रपान इसका प्रमुख जोखिम कारक है। इसके अलावा वायु प्रदूषण और लंबे समय तक दूसरे लोगों के धुएं के संपर्क में रहना भी जोखिम बढ़ा सकता है।</li>
<li><strong>कोलोरेक्टल कैंसर: </strong>कम फाइबर वाली डाइट, ज्यादा प्रोसेस्ड मीट, शारीरिक गतिविधि की कमी और मोटापा कुछ लोगों में जोखिम बढ़ा सकते हैं। हालांकि, इन कारकों का होना कैंसर होने की गारंटी नहीं है।</li>
<li><strong>पेट का कैंसर: </strong>हेलिकोबैक्टर पाइलोरी संक्रमण, कुछ खानपान संबंधी आदतें, धूम्रपान और पारिवारिक इतिहास जैसे कारक जोखिम को प्रभावित कर सकते हैं।</li>
</ul>
<p><strong>किन पुरुषों को अधिक सावधान रहने की जरूरत?</strong><br />उम्र बढ़ने के साथ कई कैंसर का जोखिम बढ़ सकता है। इसके अलावा तंबाकू या शराब का सेवन, मोटापा, शारीरिक गतिविधि की कमी, असंतुलित खानपान, पारिवारिक इतिहास और लंबे समय तक कुछ पर्यावरणीय जोखिमों के संपर्क में रहने वाले लोगों को विशेष सावधानी बरतनी चाहिए। इसका मतलब यह नहीं है कि इन जोखिम कारकों वाले हर व्यक्ति को कैंसर होगा। लेकिन ऐसे लोगों के लिए अपनी जीवनशैली सुधारना और जरूरत पड़ने पर डॉक्टर से स्क्रीनिंग या जांच के बारे में सलाह लेना महत्वपूर्ण है।</p>
<p><strong>इन लक्षणों को बिल्कुल नजरअंदाज न करें</strong><br />कुछ लक्षण कई सामान्य बीमारियों में भी हो सकते हैं, लेकिन अगर वे लंबे समय तक बने रहें या लगातार बढ़ते जाएं तो डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है।</p>
<ul>
<li>मुंह में ऐसा घाव जो लंबे समय तक ठीक न हो</li>
<li>आवाज में लगातार बदलाव या भारीपन</li>
<li>लंबे समय तक बनी रहने वाली खांसी</li>
<li>निगलने में परेशानी</li>
<li>मल में खून आना</li>
<li>bowel habits में लगातार बदलाव</li>
<li>बिना किसी स्पष्ट कारण के वजन कम होना</li>
<li>लगातार पेट दर्द या अपच</li>
<li>शरीर में लंबे समय तक बनी रहने वाली असामान्य गांठ</li>
</ul>
<p><strong>कैंसर से बचाव के लिए क्या करें?</strong><br />कैंसर के हर मामले को पूरी तरह रोकना संभव नहीं है, लेकिन कई जोखिम कारकों को कम किया जा सकता है। इसके लिए तंबाकू और गुटखा छोड़ना, धूम्रपान से दूरी बनाना, शराब का सेवन सीमित या बंद करना, वजन को स्वस्थ सीमा में रखना और नियमित शारीरिक गतिविधि को जीवनशैली का हिस्सा बनाना महत्वपूर्ण है। खानपान में फल, सब्जियां, साबुत अनाज और पर्याप्त फाइबर को शामिल करें तथा अत्यधिक प्रोसेस्ड और अस्वास्थ्यकर भोजन से बचें। परिवार में कैंसर का इतिहास है या कोई लगातार असामान्य लक्षण दिखाई दे रहा है, तो डॉक्टर से समय पर सलाह लेना बेहतर है।</p>
<p><strong>जरूरी बात: कैंसर से जुड़े किसी भी लक्षण को देखकर खुद से निष्कर्ष न निकालें। सही बीमारी का पता लगाने के लिए चिकित्सकीय जांच जरूरी होती है।</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>हेल्थ</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 09 Sep 2026 10:48:27 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[अदिती मजुमदार ]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>Acidity Relief: बार-बार होती है एसिडिटी? रोजमर्रा की ये 3 आदतें दे सकती हैं राहत</title>
                                    <description><![CDATA[<p><strong>Acidity Problem: </strong>पेट में जलन, खट्टी डकार या खाने के बाद बेचैनी जैसी समस्या कभी-कभार हो तो इसे आमतौर पर सामान्य माना जाता है। लेकिन अगर ये परेशानी बार-बार होने लगे या लंबे समय तक बनी रहे, तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। खानपान, खाने का समय, ज्यादा मसालेदार या तला हुआ भोजन और कुछ लोगों में चाय-कॉफी जैसी चीजें एसिडिटी के लक्षणों को बढ़ा सकती हैं।</p>
<p>ऐसे में केवल बार-बार दवा लेने के बजाय अपनी रोजमर्रा की आदतों पर भी ध्यान देना जरूरी है। सेलिब्रिटी न्यूट्रिशनिस्ट श्वेता शाह ने एसिडिटी से परेशान लोगों के लिए कुछ आसान आदतें सुझाई</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.nationaljagatvision.com/health/acidity-relief-acidity-occurs-again-and-again-these-3-daily/article-12305"><img src="https://www.nationaljagatvision.com/media/400/2026-09/acidity-relief-tips.webp" alt=""></a><br /><p><strong>Acidity Problem: </strong>पेट में जलन, खट्टी डकार या खाने के बाद बेचैनी जैसी समस्या कभी-कभार हो तो इसे आमतौर पर सामान्य माना जाता है। लेकिन अगर ये परेशानी बार-बार होने लगे या लंबे समय तक बनी रहे, तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। खानपान, खाने का समय, ज्यादा मसालेदार या तला हुआ भोजन और कुछ लोगों में चाय-कॉफी जैसी चीजें एसिडिटी के लक्षणों को बढ़ा सकती हैं।</p>
<p>ऐसे में केवल बार-बार दवा लेने के बजाय अपनी रोजमर्रा की आदतों पर भी ध्यान देना जरूरी है। सेलिब्रिटी न्यूट्रिशनिस्ट श्वेता शाह ने एसिडिटी से परेशान लोगों के लिए कुछ आसान आदतें सुझाई हैं। हालांकि, इन उपायों का असर हर व्यक्ति में अलग हो सकता है और लगातार लक्षण रहने पर डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है।</p>
<p><strong>आखिर क्यों होती है एसिडिटी?</strong><br />जब पेट का एसिड ऊपर की ओर भोजन नली में आने लगता है, तो सीने में जलन और खट्टी डकार जैसी परेशानी हो सकती है। इसे एसिड रिफ्लक्स कहा जाता है। इसके साथ मुंह में खट्टा या खराब स्वाद, पेट में भारीपन और कभी-कभी मतली जैसे लक्षण भी महसूस हो सकते हैं। बहुत ज्यादा या देर रात खाना, तला-भुना भोजन, मसालेदार चीजें, अधिक वजन और खाने के तुरंत बाद लेटने जैसी आदतें कुछ लोगों में समस्या बढ़ा सकती हैं।</p>
<p><strong>सुबह भीगे मुनक्के से करें दिन की शुरुआत</strong><br />न्यूट्रिशनिस्ट की सलाह में सुबह भीगे हुए मुनक्के लेने का सुझाव शामिल है। मुनक्का फाइबर समेत कुछ पोषक तत्वों का स्रोत है और इसे संतुलित डाइट का हिस्सा बनाया जा सकता है। हालांकि, मुनक्का एसिडिटी का निश्चित इलाज नहीं है। अगर इसे खाने के बाद जलन या परेशानी बढ़ती है, तो इसका सेवन बंद कर दें।</p>
<p><strong>खाने के बाद सौंफ लेना हो सकता है मददगार</strong><br />सौंफ का इस्तेमाल लंबे समय से भोजन के बाद पाचन से जुड़ी परेशानी में किया जाता रहा है। खाने के बाद थोड़ी मात्रा में सौंफ चबाने की आदत कुछ लोगों को पेट फूलने या भारीपन से राहत देने में मदद कर सकती है। लेकिन अगर आपको लगातार एसिड रिफ्लक्स रहता है, तो सिर्फ सौंफ पर निर्भर रहने के बजाय इसके मूल कारण की जांच कराना ज्यादा जरूरी है।</p>
<p><strong>शीतली या शीतकारी प्राणायाम</strong><br />न्यूट्रिशनिस्ट ने एसिडिटी से परेशान लोगों को शीतली या शीतकारी प्राणायाम जैसे ब्रीदिंग एक्सरसाइज करने की सलाह भी दी है। इसे आरामदायक तरीके से और सही तकनीक सीखकर करना बेहतर है। अगर प्राणायाम करते समय चक्कर, सांस लेने में परेशानी या किसी तरह की असहजता महसूस हो तो तुरंत रोक दें।</p>
<p><strong>खाना खाने के बाद 10 मिनट टहलें</strong><br />एसिडिटी को कंट्रोल करने के लिए सबसे आसान आदतों में से एक है खाना खाने के बाद कुछ देर हल्की वॉक करना। भोजन के तुरंत बाद बिस्तर पर लेटने से बचें। रात के खाने और सोने के बीच पर्याप्त अंतर रखना भी कई लोगों के लिए फायदेमंद हो सकता है। कुछ लोग भोजन के बाद थोड़ी देर वज्रासन में बैठना भी पसंद करते हैं। हालांकि, अगर घुटनों या किसी अन्य समस्या के कारण यह मुद्रा असहज लगे तो इसे न करें।</p>
<p><strong>सिर्फ घरेलू नुस्खों पर निर्भर न रहें</strong><br />अगर एसिडिटी कभी-कभार होती है तो खानपान और लाइफस्टाइल में बदलाव मदद कर सकते हैं। लेकिन लगातार या बार-बार होने वाली एसिडिटी को सिर्फ घरेलू उपायों से दबाते रहना सही नहीं है। अगर सीने में बार-बार जलन, निगलने में परेशानी, लगातार उल्टी, बिना वजह वजन कम होना, खून की उल्टी या काले रंग का मल जैसे लक्षण दिखाई दें, तो जल्द डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>हेल्थ</category>
                                    

                <link>https://www.nationaljagatvision.com/health/acidity-relief-acidity-occurs-again-and-again-these-3-daily/article-12305</link>
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                <pubDate>Tue, 08 Sep 2026 10:38:28 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[अदिती मजुमदार ]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>Sea Buckthorn Nutrition: पोषक तत्वों का पावरहाउस है सी बकथॉर्न, जानें इसमें कितने विटामिन-मिनरल और कैसे करें सेवन</title>
                                    <description><![CDATA[<p><strong>Sea Buckthorn Nutrition: </strong>सी बकथॉर्न एक छोटा, नारंगी रंग का फल है, जो कांटेदार झाड़ी पर उगता है। इसे भारत में हिमालयन बेरी, लेह बेरी, ब्रह्मफल और वंडर बेरी जैसे नामों से भी जाना जाता है। यह मुख्य रूप से ठंडे और ऊंचाई वाले इलाकों में पाया जाता है। भारत में लद्दाख, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड जैसे क्षेत्रों में इसकी खेती और प्राकृतिक रूप से उपलब्धता देखने को मिलती है। पिछले कुछ समय में सी बकथॉर्न को लेकर लोगों की दिलचस्पी बढ़ी है। इसकी वजह इसमें मौजूद विटामिन, मिनरल्स, फैटी एसिड और एंटीऑक्सीडेंट कंपाउंड हैं। इसका स्वाद खट्टा होता है</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.nationaljagatvision.com/health/sea-buckthorn-nutrition-sea-buckthorn-is-a-powerhouse-of-nutrients/article-12260"><img src="https://www.nationaljagatvision.com/media/400/2026-09/sea-buckthorn-juce-.webp" alt=""></a><br /><p><strong>Sea Buckthorn Nutrition: </strong>सी बकथॉर्न एक छोटा, नारंगी रंग का फल है, जो कांटेदार झाड़ी पर उगता है। इसे भारत में हिमालयन बेरी, लेह बेरी, ब्रह्मफल और वंडर बेरी जैसे नामों से भी जाना जाता है। यह मुख्य रूप से ठंडे और ऊंचाई वाले इलाकों में पाया जाता है। भारत में लद्दाख, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड जैसे क्षेत्रों में इसकी खेती और प्राकृतिक रूप से उपलब्धता देखने को मिलती है। पिछले कुछ समय में सी बकथॉर्न को लेकर लोगों की दिलचस्पी बढ़ी है। इसकी वजह इसमें मौजूद विटामिन, मिनरल्स, फैटी एसिड और एंटीऑक्सीडेंट कंपाउंड हैं। इसका स्वाद खट्टा होता है और फल के अलावा इसकी पत्तियों से हर्बल चाय भी तैयार की जाती है।</p>
<p><strong>सी बकथॉर्न में कौन-कौन से विटामिन पाए जाते हैं?</strong><br />सी बकथॉर्न को विटामिन C का अच्छा स्रोत माना जाता है। उपलब्ध पोषण संबंधी आंकड़ों के अनुसार, 100 ग्राम सी बकथॉर्न में लगभग 275 मिलीग्राम विटामिन C पाया जा सकता है। इसके अलावा इसमें विटामिन E, कैरोटीनॉयड और अन्य पोषक तत्व भी मौजूद होते हैं। हालांकि, अलग-अलग किस्म, खेती की परिस्थितियों और फल की प्रोसेसिंग के कारण पोषक तत्वों की मात्रा में अंतर हो सकता है। इसलिए किसी एक आंकड़े को हर सी बकथॉर्न उत्पाद पर लागू नहीं किया जा सकता।</p>
<p><strong>मिनरल्स और बायोएक्टिव कंपाउंड भी मौजूद</strong><br />सी बकथॉर्न में पोटेशियम, कैल्शियम, मैग्नीशियम, फॉस्फोरस, आयरन, जिंक, मैंगनीज और कॉपर जैसे मिनरल्स पाए जाते हैं। इसके अलावा इसमें कई अमीनो एसिड और जैव सक्रिय यौगिक भी मौजूद होते हैं। रिसर्च में सी बकथॉर्न में कैरोटीनॉयड, पॉलीफेनोल, फेनोलिक एसिड और फ्लेवोनॉयड जैसे एंटीऑक्सीडेंट कंपाउंड पाए गए हैं। इसकी खासियतों में अलग-अलग प्रकार के फैटी एसिड की मौजूदगी भी शामिल है।</p>
<p><strong>Omega-7 की वजह से भी चर्चा में रहता है सी बकथॉर्न</strong><br />सी बकथॉर्न में पामिटोलेइक एसिड (Omega-7) पाया जाता है, जो इसे दूसरे कई फलों से अलग बनाता है। इसके अलावा इसमें Omega-3, Omega-6 और Omega-9 फैटी एसिड भी पाए जा सकते हैं। Omega-7 और अन्य फैटी एसिड पर त्वचा और मेटाबॉलिक हेल्थ से जुड़े संभावित प्रभावों को लेकर शोध हुआ है, लेकिन इसे किसी बीमारी का इलाज या निश्चित बचाव मानना सही नहीं है।</p>
<p><strong>स्किन हेल्थ के लिए कितना फायदेमंद?</strong><br />सी बकथॉर्न में मौजूद विटामिन C, विटामिन E और कैरोटीनॉयड जैसे एंटीऑक्सीडेंट शरीर को ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस से बचाने में भूमिका निभाते हैं। इसके तेल में मौजूद फैटी एसिड के कारण इसे कॉस्मेटिक और स्किन-केयर उत्पादों में भी इस्तेमाल किया जाता है। हालांकि, सी बकथॉर्न खाने से झुर्रियां खत्म होने या त्वचा हमेशा जवां रहने जैसे दावों को वैज्ञानिक रूप से निश्चित नहीं माना जा सकता।</p>
<p><strong>हार्ट और मेटाबॉलिक हेल्थ से जुड़ी संभावनाएं</strong><br />सी बकथॉर्न में मौजूद बायोएक्टिव कंपाउंड और फैटी एसिड को लेकर हृदय और मेटाबॉलिक स्वास्थ्य पर संभावित प्रभावों का अध्ययन किया गया है। कुछ शुरुआती शोधों में इसके संभावित लाभ दिखाई दिए हैं, लेकिन इंसानों में इसके प्रभावों को लेकर अभी और मजबूत शोध की जरूरत है। इसलिए इसे संतुलित डाइट का हिस्सा माना जा सकता है, लेकिन कोलेस्ट्रॉल, डायबिटीज या किसी अन्य बीमारी की दवा का विकल्प नहीं समझना चाहिए।</p>
<p><strong>सी बकथॉर्न का सेवन कैसे करें?</strong><br />सी बकथॉर्न को अलग-अलग तरीकों से डाइट में शामिल किया जा सकता है:</p>
<ul>
<li>इसका जूस बनाकर पी सकते हैं।</li>
<li>स्मूदी या शेक में पल्प मिलाया जा सकता है।</li>
<li>पाउडर को दही, ओट्स या दलिया में मिलाया जा सकता है।</li>
<li>पल्प को गुनगुने पानी के साथ लिया जा सकता है।</li>
<li>सूखी बेरीज का भी सेवन किया जा सकता है।</li>
</ul>
<p>इसका स्वाद काफी खट्टा होता है, इसलिए शुरुआत में कम मात्रा से लेना बेहतर है। बाजार में उपलब्ध जूस या पाउडर खरीदते समय यह भी देखें कि उसमें अतिरिक्त चीनी कितनी है।</p>
<p><strong>क्या सी बकथॉर्न सभी के लिए सुरक्षित है?</strong><br />आम तौर पर खाद्य मात्रा में सी बकथॉर्न का सेवन किया जाता है, लेकिन हर व्यक्ति की जरूरत और स्वास्थ्य स्थिति अलग होती है। अगर आप नियमित दवाएं लेते हैं, गर्भवती हैं, स्तनपान करा रही हैं या किसी स्वास्थ्य समस्या से जूझ रहे हैं, तो इसे नियमित रूप से लेने से पहले डॉक्टर या योग्य डाइटीशियन से सलाह लेना बेहतर है।</p>
<p><strong>Disclaimer: यह लेख सामान्य पोषण संबंधी जानकारी पर आधारित है। सी बकथॉर्न किसी बीमारी का इलाज या दवा का विकल्प नहीं है। किसी स्वास्थ्य समस्या, एलर्जी या नियमित दवा के मामले में सेवन से पहले विशेषज्ञ की सलाह लें।</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>हेल्थ</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 07 Sep 2026 10:37:22 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[मनीशंकर पांडेय]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>आयुष्मान योजना: प्राइवेट अस्पतालों की मनमानी, रेफर करने के बाद भी कागजों में भर्ती हैं मरीज</title>
                                    <description><![CDATA[<p>रायगढ़। जिले में प्राइवेट अस्पतालों की कार्यप्रणाली लोगों में निरंतर संदेह पैदा कर रही है। आयुष्मान योजना के तहत जमकर मनमानी चल रही है। नियमानुसार देखा जाए तो किसी भी मरीज के भर्ती होने पर क्लेम ओपन किया जाता है। साथ ही डिस्चार्ज या रेफर करने के दौरान ही क्लेम को बंद करना होता है। लेकिन प्राइवेट अस्पतालों में ऐसा नहीं हो रहा है। प्रबंधन की लापरवाही से रेफर मरीज जैसे ही दूसरे अस्पताल पहुंचते हैं, वे परेशान होते हैं।</p>
<p><strong>पद्मावती अस्पताल की लापरवाही आई सामने</strong></p>
<p>पिछले दिनों खरसिया के पद्मावती अस्पताल का मामला सामने आया। जुर्डा निवासी जगतराम उपचार</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.nationaljagatvision.com/crime/ayushman-yojana-patients-are-admitted-on-paper-even-after-arbitrary/article-12282"><img src="https://www.nationaljagatvision.com/media/400/2026-09/image_search_1788754553496.jpg" alt=""></a><br /><p>रायगढ़। जिले में प्राइवेट अस्पतालों की कार्यप्रणाली लोगों में निरंतर संदेह पैदा कर रही है। आयुष्मान योजना के तहत जमकर मनमानी चल रही है। नियमानुसार देखा जाए तो किसी भी मरीज के भर्ती होने पर क्लेम ओपन किया जाता है। साथ ही डिस्चार्ज या रेफर करने के दौरान ही क्लेम को बंद करना होता है। लेकिन प्राइवेट अस्पतालों में ऐसा नहीं हो रहा है। प्रबंधन की लापरवाही से रेफर मरीज जैसे ही दूसरे अस्पताल पहुंचते हैं, वे परेशान होते हैं।</p>
<p><strong>पद्मावती अस्पताल की लापरवाही आई सामने</strong></p>
<p>पिछले दिनों खरसिया के पद्मावती अस्पताल का मामला सामने आया। जुर्डा निवासी जगतराम उपचार के लिए वहां भर्ती हुआ। अस्पताल में उपचार के दौरान उसका आयुष्मान योजना के तहत क्लेम ओपन किया गया। कुछ दिनों बाद जगतराम को मेडिकल कॉलेज रायगढ़ रेफर कर दिया गया।</p>
<p>मरीज मेडिकल कॉलेज पहुंचा, वहां उपचार शुरू हुआ। लेकिन जब योजना का लाभ देने के लिए खाता चेक किया गया, तो पता चला कि पद्मावती अस्पताल ने क्लेम के लिए ओपन किए गए आयुष्मान को क्लोज नहीं किया है।</p>
<p><strong>परिजनों को करनी पड़ी भारी मशक्कत</strong></p>
<p>मरीज के परिजनों को योजना का लाभ लेने के लिए काफी मशक्कत करनी पड़ी। जब परिजनों ने पद्मावती अस्पताल में शिकायत की, तब जाकर वहां आयुष्मान का खाता क्लोज हुआ। इसके बाद ही मेडिकल कॉलेज में योजना का लाभ मिलना शुरू हुआ। जो मरीज रेफर होते हैं, उनका यह हाल है। ऐसे में जिन मरीजों को उपचार के बाद छुट्टी दे दी जाती है, ऐसे मरीजों का भी आयुष्मान के तहत खाता खुला रहता होगा।</p>
<p><strong>नाम के नोडल अधिकारी, मॉनिटरिंग है जीरो</strong></p>
<p>राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन जिला कार्यक्रम प्रबंधन इकाई के तहत योजना की मॉनिटरिंग को लेकर जिला नोडल अधिकारी नियुक्त किया गया है। लेकिन प्राइवेट अस्पतालों की मॉनिटरिंग जीरो है। शिकायत के लिए नोडल अधिकारी को फोन लगाने पर केवल मोबाइल की घंटी बजती रहती है। ऐसा प्रतीत होता है कि अधिकारी महोदय को अपने कार्यालय में फोन उठाने की फुर्सत नहीं है या यह काम उनके प्रभार में ही नहीं आता।</p>
<h6>रेफर या डिस्चार्ज करने के दौरान ही आयुष्मान क्लोज करने का प्रावधान है। अगर ऐसा नहीं हो रहा है तो गलत है। इसकी जांच कराई जाएगी।</h6>
<p> <strong>अनिल जगत, सीएमएचओ, रायगढ़</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>अपराध</category>
                                            <category>छत्तीसगढ़</category>
                                            <category>हेल्थ</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 07 Sep 2026 09:46:26 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[मनीशंकर पांडेय]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>बच्चों को 2 साल तक कम दें चीनी? स्टडी में सामने आया चौंकाने वाला कनेक्शन, जानें एक्सपर्ट की राय</title>
                                    <description><![CDATA[<p><strong>Sugar Intake in Children:</strong> नवजात बच्चे के खान-पान को लेकर माता-पिता के मन में कई सवाल होते हैं। इनमें एक बड़ा सवाल यह भी रहता है कि बच्चे को मीठी चीजें कब से दी जानी चाहिए। हाल ही में प्रकाशित एक अध्ययन ने जीवन के शुरुआती वर्षों में चीनी के सेवन और आगे चलकर स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभाव के बीच संभावित संबंध की ओर ध्यान खींचा है। अध्ययन में शुरुआती जीवन में कम चीनी मिलने और बाद के वर्षों में कुछ मेटाबॉलिक बीमारियों के कम जोखिम के बीच संबंध पाया गया। हालांकि, इसे सीधे तौर पर यह साबित करने</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.nationaljagatvision.com/health/give-children-less-time-till-2-years-shocking-connection-revealed/article-12236"><img src="https://www.nationaljagatvision.com/media/400/2026-09/less-suga-first-two-years-childhood-cancer-risk-study.webp" alt=""></a><br /><p><strong>Sugar Intake in Children:</strong> नवजात बच्चे के खान-पान को लेकर माता-पिता के मन में कई सवाल होते हैं। इनमें एक बड़ा सवाल यह भी रहता है कि बच्चे को मीठी चीजें कब से दी जानी चाहिए। हाल ही में प्रकाशित एक अध्ययन ने जीवन के शुरुआती वर्षों में चीनी के सेवन और आगे चलकर स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभाव के बीच संभावित संबंध की ओर ध्यान खींचा है। अध्ययन में शुरुआती जीवन में कम चीनी मिलने और बाद के वर्षों में कुछ मेटाबॉलिक बीमारियों के कम जोखिम के बीच संबंध पाया गया। हालांकि, इसे सीधे तौर पर यह साबित करने वाला निष्कर्ष नहीं माना जा सकता कि दो साल तक चीनी न देने से कैंसर निश्चित रूप से नहीं होगा। बच्चे के शुरुआती आहार में चीनी की मात्रा को सीमित रखना फिर भी विशेषज्ञों की सामान्य सलाह के अनुरूप है।</p>
<p><strong>क्या कहती है स्टडी?</strong><br />रिसर्चर्स ने जीवन के शुरुआती करीब 1000 दिनों में चीनी की उपलब्धता और लंबे समय में स्वास्थ्य के बीच संबंध को समझने की कोशिश की। इसके लिए ब्रिटेन में चीनी राशनिंग के दौर को एक प्राकृतिक प्रयोग की तरह देखा गया। सितंबर 1953 में ब्रिटेन में चीनी की राशनिंग लागू थी, जिससे लोगों की चीनी की खपत सीमित रही। बाद में जब राशनिंग समाप्त हुई तो चीनी का सेवन तेजी से बढ़ गया। शोधकर्ताओं ने इस बदलाव के आसपास जन्मे करीब 64 हजार वयस्कों के स्वास्थ्य संबंधी आंकड़ों की तुलना की। अध्ययन में पाया गया कि जिन लोगों को जीवन के शुरुआती दौर में अपेक्षाकृत कम चीनी मिली थी, उनमें आगे चलकर कुछ मेटाबॉलिक बीमारियों का जोखिम कम दिखाई दिया। हालांकि, ऐसे ऐतिहासिक डेटा से कारण और प्रभाव को पूरी तरह साबित करना मुश्किल होता है।</p>
<p><strong>क्या चीनी कम करने से कैंसर का खतरा भी घटता है?</strong><br />इस रिसर्च को कैंसर से जोड़कर देखा जा रहा है, लेकिन यहां सावधानी जरूरी है। किसी व्यक्ति में कैंसर का जोखिम केवल चीनी के सेवन से तय नहीं होता। उम्र, जेनेटिक्स, वजन, शारीरिक गतिविधि, धूम्रपान, शराब, पर्यावरण और कई अन्य कारक भी इसमें भूमिका निभाते हैं। इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि दो साल तक बच्चे को चीनी न देने से भविष्य में कैंसर से बचाव की गारंटी मिल जाती है। रिसर्च के निष्कर्षों को शुरुआती जीवन में बेहतर खान-पान की अहमियत के संदर्भ में समझना ज्यादा उचित है।</p>
<p><strong>बच्चों के लिए ज्यादा चीनी क्यों चिंता का विषय है?</strong><br />विशेषज्ञों के अनुसार, बचपन से ही बहुत ज्यादा मीठा खाने या मीठे पेय लेने की आदत आगे चलकर अधिक कैलोरी सेवन, वजन बढ़ने और मेटाबॉलिक समस्याओं से जुड़ सकती है। लंबे समय में इससे टाइप-2 डायबिटीज जैसी बीमारियों का जोखिम बढ़ सकता है। खासकर शुगर वाले ड्रिंक, पैकेज्ड स्नैक्स, मिठाइयां और अत्यधिक मीठे खाद्य पदार्थ बच्चों की नियमित डाइट का हिस्सा नहीं बनने चाहिए।</p>
<p><strong>क्या बच्चों को बिल्कुल मीठा नहीं देना चाहिए?</strong><br />बच्चे को जीवनभर मिठाई, चॉकलेट या अन्य मीठी चीजों से पूरी तरह दूर रखना जरूरी नहीं है। ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि मीठे की मात्रा और आवृत्ति नियंत्रित रहे। रोजाना मीठे पेय या ज्यादा चीनी वाले पैकेज्ड फूड देना और कभी-कभार सीमित मात्रा में मिठाई देना एक जैसी बात नहीं है। बच्चे की उम्र और स्वास्थ्य के अनुसार डाइट तय करना बेहतर रहता है।</p>
<p><strong>बच्चों की डाइट में क्या शामिल करें?</strong><br />माता-पिता बच्चों को उम्र के अनुसार पौष्टिक और विविध आहार देने पर ध्यान दें। डाइट में फल, सब्जियां, दालें, दूध या उपयुक्त डेयरी विकल्प, साबुत अनाज और पर्याप्त प्रोटीन जैसे खाद्य पदार्थ शामिल किए जा सकते हैं। साथ ही बच्चों को कम उम्र से ही सक्रिय रहने और नियमित शारीरिक गतिविधि की आदत डालना भी जरूरी है।</p>
<p><strong>सबसे जरूरी बात</strong><br />बचपन में ज्यादा चीनी की आदत से बचना स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद हो सकता है, लेकिन किसी एक स्टडी के आधार पर यह दावा करना उचित नहीं है कि दो साल तक चीनी न खाने से कैंसर या अन्य बीमारियों से निश्चित सुरक्षा मिलती है। खासकर नवजात और शिशुओं के खान-पान में कोई बदलाव करने से पहले बाल रोग विशेषज्ञ या योग्य पोषण विशेषज्ञ की सलाह लेना बेहतर है।</p>
<p><strong>Disclaimer: यह लेख उपलब्ध रिसर्च और सामान्य स्वास्थ्य जानकारी पर आधारित है। यह किसी बीमारी की रोकथाम या इलाज की गारंटी नहीं देता। शिशु और बच्चे की डाइट उसकी उम्र, विकास और स्वास्थ्य स्थिति के अनुसार विशेषज्ञ की सलाह से तय करें।</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>हेल्थ</category>
                                    

                <link>https://www.nationaljagatvision.com/health/give-children-less-time-till-2-years-shocking-connection-revealed/article-12236</link>
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                <pubDate>Sat, 05 Sep 2026 10:30:24 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[मनीशंकर पांडेय]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>PCOD और प्रेग्नेंसी: PCOD के बावजूद बनी मां, आयुर्वेदिक इलाज के बाद नेचुरली कंसीव करने की बताई कहानी</title>
                                    <description><![CDATA[<p><strong>PCOD and Pregnancy:</strong> मां बनना कई महिलाओं के लिए जिंदगी का बेहद खास अनुभव होता है, लेकिन गर्भधारण का सफर हर किसी के लिए आसान नहीं होता। हार्मोनल असंतुलन और ओव्यूलेशन से जुड़ी समस्याओं की वजह से कुछ महिलाओं को गर्भधारण करने में परेशानी हो सकती है। PCOD (Polycystic Ovary Disorder) भी ऐसी ही स्थितियों में से एक है, जो पीरियड्स और ओव्यूलेशन को प्रभावित कर सकती है। ऐसी ही कहानी विजयलक्ष्मी की बताई जा रही है, जिन्हें PCOD की समस्या थी और गर्भधारण को लेकर चिंता बनी हुई थी। परिवार और आसपास के लोगों के सवालों के बावजूद उन्होंने</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.nationaljagatvision.com/health/pcod-and-pregnancy-became-a-mother-despite-pcod/article-12208"><img src="https://www.nationaljagatvision.com/media/400/2026-09/woman-was-facing-pcod-then-concive-baby-by-ayurvedic-treatment.webp" alt=""></a><br /><p><strong>PCOD and Pregnancy:</strong> मां बनना कई महिलाओं के लिए जिंदगी का बेहद खास अनुभव होता है, लेकिन गर्भधारण का सफर हर किसी के लिए आसान नहीं होता। हार्मोनल असंतुलन और ओव्यूलेशन से जुड़ी समस्याओं की वजह से कुछ महिलाओं को गर्भधारण करने में परेशानी हो सकती है। PCOD (Polycystic Ovary Disorder) भी ऐसी ही स्थितियों में से एक है, जो पीरियड्स और ओव्यूलेशन को प्रभावित कर सकती है। ऐसी ही कहानी विजयलक्ष्मी की बताई जा रही है, जिन्हें PCOD की समस्या थी और गर्भधारण को लेकर चिंता बनी हुई थी। परिवार और आसपास के लोगों के सवालों के बावजूद उन्होंने उम्मीद नहीं छोड़ी। उनके अनुसार, आयुर्वेदिक उपचार और चिकित्सकीय मार्गदर्शन के बाद उन्होंने प्राकृतिक रूप से गर्भधारण किया।</p>
<p><strong>PCOD होने का मतलब मां बनना मुश्किल नहीं</strong><br />विशेषज्ञों के मुताबिक PCOD एक हार्मोनल स्थिति है, जिसमें अनियमित पीरियड्स, वजन में बदलाव और ओव्यूलेशन से जुड़ी दिक्कतें हो सकती हैं। कुछ महिलाओं में ओव्यूलेशन नियमित न होने के कारण गर्भधारण में परेशानी आ सकती है। हालांकि, PCOD का मतलब यह नहीं है कि महिला मां नहीं बन सकती। कई महिलाएं जीवनशैली में बदलाव, वजन प्रबंधन और जरूरत के अनुसार चिकित्सकीय उपचार के बाद गर्भधारण करने में सफल होती हैं।</p>
<p><strong>आयुर्वेदिक इलाज को लेकर क्या कहा गया?</strong><br />डॉ. के अनुसार, विजयलक्ष्मी के मामले में आयुर्वेदिक उपचार और चिकित्सकीय मार्गदर्शन के बाद उन्हें गर्भधारण की खुशी मिली। यह अनुभव उनके लिए लंबे समय से चले आ रहे इंतजार के बाद बड़ी राहत और खुशी लेकर आया। हालांकि, किसी एक महिला के अनुभव को सभी महिलाओं पर लागू नहीं किया जा सकता। PCOD का उपचार व्यक्ति की स्थिति, लक्षणों और प्रजनन संबंधी जरूरतों के आधार पर अलग हो सकता है।</p>
<p><strong>गर्भधारण में PCOD के अलावा भी कई कारण</strong><br />गर्भधारण में परेशानी सिर्फ PCOD की वजह से हो, यह जरूरी नहीं है। इसके पीछे ओव्यूलेशन से जुड़ी समस्या, फैलोपियन ट्यूब में ब्लॉकेज, एंडोमेट्रियोसिस, उम्र और पुरुष पार्टनर से जुड़े कारण भी हो सकते हैं। इसलिए लंबे समय तक प्रयास के बावजूद गर्भधारण न होने पर केवल खुद से किसी एक कारण को जिम्मेदार मानने के बजाय स्त्री रोग विशेषज्ञ या फर्टिलिटी विशेषज्ञ से जांच और सलाह लेना जरूरी है।</p>
<p><strong>सही समय पर इलाज और विशेषज्ञ की सलाह जरूरी</strong><br />PCOD का पता चलना मां बनने की उम्मीद खत्म होने जैसा नहीं है। सही जांच के बाद समस्या की वजह समझना और उसके अनुसार उपचार लेना महत्वपूर्ण है। संतुलित खान-पान, नियमित शारीरिक गतिविधि, पर्याप्त नींद और वजन को स्वस्थ सीमा में बनाए रखना भी कई महिलाओं के लिए फायदेमंद हो सकता है।</p>
<p>विजयलक्ष्मी की कहानी उम्मीद जरूर देती है, लेकिन हर महिला का शरीर और मेडिकल इतिहास अलग होता है। इसलिए आयुर्वेदिक या किसी भी उपचार को शुरू करने से पहले योग्य डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है। गर्भधारण की योजना बना रही महिलाओं को अपनी स्थिति के अनुसार व्यक्तिगत चिकित्सकीय मार्गदर्शन लेना चाहिए।</p>
<p><strong>Disclaimer: यह लेख सामान्य स्वास्थ्य जानकारी और बताए गए अनुभव पर आधारित है। किसी एक व्यक्ति के उपचार परिणाम को सभी लोगों के लिए समान नहीं माना जा सकता। PCOD, बांझपन या गर्भधारण से जुड़ी समस्या में कोई भी उपचार शुरू करने से पहले योग्य चिकित्सक या विशेषज्ञ से सलाह लें।</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>हेल्थ</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 04 Sep 2026 10:48:10 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[मनीशंकर पांडेय]]></dc:creator>
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                <title>Vitamin B12 &amp; D Deficiency: हर वक्त थकान और हड्डियों में दर्द को न करें नजरअंदाज, जानें B12-D की कमी के संकेत और बचाव</title>
                                    <description><![CDATA[<p><strong>नई दिल्ली। </strong>भारत में पोषण से जुड़ी समस्या अब केवल कम खाना या कुपोषण तक सीमित नहीं रह गई है। बदलती दिनचर्या, खान-पान में असंतुलन और पर्याप्त माइक्रोन्यूट्रिएंट्स न मिलने की वजह से कई लोगों में विटामिन और मिनरल्स की कमी देखने को मिल रही है। इनमें विटामिन B12 और विटामिन D की कमी विशेष रूप से चर्चा में रहती है। अलग-अलग अध्ययनों में भारतीय आबादी के विभिन्न समूहों में इन दोनों पोषक तत्वों का स्तर कम पाए जाने की बात सामने आई है। हालांकि, इन कमियों की व्यापकता हर अध्ययन, आयु वर्ग और आबादी के अनुसार अलग हो सकती</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.nationaljagatvision.com/health/vitamin-b12-d-deficiency-do-not-ignore-fatigue-and-bone/article-12184"><img src="https://www.nationaljagatvision.com/media/400/2026-09/nutrition-week-2026-why-indians-facing-vitamin-b12-and-d-deficiency-reasons-in-hindi.webp" alt=""></a><br /><p><strong>नई दिल्ली। </strong>भारत में पोषण से जुड़ी समस्या अब केवल कम खाना या कुपोषण तक सीमित नहीं रह गई है। बदलती दिनचर्या, खान-पान में असंतुलन और पर्याप्त माइक्रोन्यूट्रिएंट्स न मिलने की वजह से कई लोगों में विटामिन और मिनरल्स की कमी देखने को मिल रही है। इनमें विटामिन B12 और विटामिन D की कमी विशेष रूप से चर्चा में रहती है। अलग-अलग अध्ययनों में भारतीय आबादी के विभिन्न समूहों में इन दोनों पोषक तत्वों का स्तर कम पाए जाने की बात सामने आई है। हालांकि, इन कमियों की व्यापकता हर अध्ययन, आयु वर्ग और आबादी के अनुसार अलग हो सकती है। इसलिए केवल किसी एक आंकड़े के आधार पर पूरे देश की आबादी के बारे में निष्कर्ष निकालना उचित नहीं है।</p>
<p><strong>Vitamin B12 की कमी क्यों हो सकती है?</strong><br />विटामिन B12 शरीर में लाल रक्त कोशिकाओं के निर्माण, DNA सिंथेसिस और नर्वस सिस्टम के सामान्य कामकाज के लिए महत्वपूर्ण है। इसकी कमी कई कारणों से हो सकती है। खासकर लंबे समय तक पर्याप्त B12 युक्त खाद्य पदार्थ न लेने वाले लोगों में इसका जोखिम बढ़ सकता है। शाकाहारी या पूरी तरह प्लांट-बेस्ड डाइट लेने वाले लोगों को अपने B12 सेवन पर विशेष ध्यान देने की जरूरत हो सकती है, क्योंकि प्राकृतिक रूप से B12 मुख्य रूप से पशु-आधारित खाद्य पदार्थों में पाया जाता है। B12 की कमी होने पर लगातार थकान, कमजोरी, चक्कर, हाथ-पैर में झनझनाहट, ध्यान लगाने में परेशानी जैसे लक्षण दिखाई दे सकते हैं। गंभीर या लंबे समय तक बनी कमी एनीमिया और तंत्रिका संबंधी समस्याओं से जुड़ी हो सकती है।</p>
<p><strong>Vitamin D की कमी से हड्डियों पर असर</strong><br />विटामिन D शरीर में कैल्शियम के अवशोषण और हड्डियों व मांसपेशियों के स्वास्थ्य में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। भारत में पर्याप्त धूप उपलब्ध होने के बावजूद कई लोगों में विटामिन D का स्तर कम पाया जाता है। इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं, जैसे दिन का अधिकतर समय घर या ऑफिस के अंदर बिताना, धूप में कम निकलना, शरीर को ज्यादा ढककर रखना और भोजन से पर्याप्त विटामिन D न मिलना। इसकी कमी कुछ लोगों में हड्डियों और मांसपेशियों से जुड़ी परेशानियों का कारण बन सकती है। एक भारतीय मेटा-एनालिसिस में विटामिन D की कमी की व्यापकता करीब 61% और विटामिन B12 की कमी करीब 53% बताई गई थी। हालांकि, अलग-अलग अध्ययनों में इस्तेमाल किए गए मानकों और अध्ययन समूहों के कारण आंकड़ों में काफी अंतर देखा जा सकता है।</p>
<p><strong>सिर्फ थकान को देखकर न मान लें विटामिन की कमी</strong><br />थकान, कमजोरी या शरीर में दर्द जैसे लक्षण कई दूसरी वजहों से भी हो सकते हैं। इसलिए केवल लक्षणों के आधार पर खुद से विटामिन B12 या D की कमी का निष्कर्ष निकालना सही नहीं है। अगर ऐसे लक्षण लगातार बने हुए हैं, तो डॉक्टर से सलाह लेकर जरूरत के अनुसार ब्लड टेस्ट कराया जा सकता है। जांच रिपोर्ट के आधार पर ही सप्लीमेंट या उपचार की जरूरत तय करना बेहतर रहता है।</p>
<p><strong>डाइट और लाइफस्टाइल पर दें ध्यान</strong><br />विटामिन B12 के लिए दूध, दही, अंडे, मछली और अन्य B12 युक्त खाद्य पदार्थों को डाइट में शामिल किया जा सकता है। पूरी तरह शाकाहारी लोगों के लिए फोर्टिफाइड फूड या सप्लीमेंट की जरूरत डॉक्टर या डाइटीशियन की सलाह के अनुसार तय की जा सकती है।</p>
<p>विटामिन D के लिए सुरक्षित तरीके से धूप लेना और डाइट में इसके स्रोत शामिल करना मददगार हो सकता है। अगर शरीर में कमी की पुष्टि हो जाए, तो डॉक्टर की सलाह से सप्लीमेंट लिया जा सकता है। बिना जांच या चिकित्सकीय सलाह के हाई-डोज सप्लीमेंट लेना उचित नहीं है।</p>
<p>कुल मिलाकर, विटामिन B12 और D की कमी को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। संतुलित आहार, उचित धूप, जरूरत पड़ने पर जांच और विशेषज्ञ की सलाह के जरिए इन पोषक तत्वों के स्तर को बेहतर बनाए रखने की दिशा में कदम उठाया जा सकता है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>हेल्थ</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 03 Sep 2026 10:51:15 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[मनीशंकर पांडेय]]></dc:creator>
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                <title>Morning Yoga Tips: सुबह उठते ही योगासन करने की न करें जल्दबाजी, पहले शरीर को ऐसे करें तैयार</title>
                                    <description><![CDATA[<p><strong>नई दिल्ली।</strong> योग को स्वस्थ जीवनशैली का अहम हिस्सा माना जाता है। नियमित योगासन शरीर को सक्रिय रखने के साथ मानसिक शांति और एकाग्रता बढ़ाने में भी मदद कर सकते हैं। लेकिन सुबह नींद से जागने के तुरंत बाद कठिन योगासन शुरू कर देना हर किसी के लिए सही नहीं होता। खासकर योग की शुरुआत करने वालों को शरीर को पहले तैयार करना चाहिए, ताकि मांसपेशियों में खिंचाव या चोट का जोखिम कम रहे। अगर आप सुबह योग करने की शुरुआत कर रहे हैं तो कुछ आसान तैयारियों को अपनी दिनचर्या में शामिल कर सकते हैं। इससे शरीर धीरे-धीरे एक्टिव</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.nationaljagatvision.com/health/morning-yoga-tips-do-not-rush-to-do-yoga-as/article-12159"><img src="https://www.nationaljagatvision.com/media/400/2026-09/how-to-prepare-your-body-for-yoga-malasana-.webp" alt=""></a><br /><p><strong>नई दिल्ली।</strong> योग को स्वस्थ जीवनशैली का अहम हिस्सा माना जाता है। नियमित योगासन शरीर को सक्रिय रखने के साथ मानसिक शांति और एकाग्रता बढ़ाने में भी मदद कर सकते हैं। लेकिन सुबह नींद से जागने के तुरंत बाद कठिन योगासन शुरू कर देना हर किसी के लिए सही नहीं होता। खासकर योग की शुरुआत करने वालों को शरीर को पहले तैयार करना चाहिए, ताकि मांसपेशियों में खिंचाव या चोट का जोखिम कम रहे। अगर आप सुबह योग करने की शुरुआत कर रहे हैं तो कुछ आसान तैयारियों को अपनी दिनचर्या में शामिल कर सकते हैं। इससे शरीर धीरे-धीरे एक्टिव होगा और योगासन करना भी सहज महसूस होगा।</p>
<p><strong>सबसे पहले नित्य कर्म से हों फ्री</strong><br />सुबह योग करने से पहले शौच आदि से निवृत्त होना बेहतर माना जाता है। खाली पेट योग करने से कई लोगों को आसन और प्राणायाम करने में अधिक सहजता महसूस होती है। इसके बाद शरीर को एक्टिव करने के लिए सामान्य या गुनगुने पानी से स्नान किया जा सकता है। हालांकि, हर व्यक्ति की दिनचर्या और शारीरिक जरूरत अलग होती है, इसलिए किसी विशेष योग अभ्यास को अपनाने से पहले अपनी सुविधा का ध्यान रखना जरूरी है।</p>
<p><strong>सुबह पानी पीना न भूलें</strong><br />जागने के बाद पानी पीने की आदत अच्छी दिनचर्या का हिस्सा हो सकती है। यदि आप योग करने वाले हैं तो पहले पर्याप्त समय देकर शरीर को सहज होने दें। पानी पीने के तुरंत बाद कठिन योगासन या प्राणायाम शुरू करने से बचें। योग को आमतौर पर खाली पेट करना सुविधाजनक माना जाता है। भोजन करने के तुरंत बाद योगासन करने के बजाय उचित अंतर रखना बेहतर रहता है।</p>
<p><strong>योग से पहले करें हल्का वार्मअप</strong><br />सुबह उठने के बाद शरीर और मांसपेशियों में थोड़ी जकड़न महसूस हो सकती है। ऐसे में सीधे कठिन आसनों की शुरुआत करने के बजाय हल्के वार्मअप से शुरुआत करें। इसके लिए गर्दन को धीरे-धीरे दाएं-बाएं और ऊपर-नीचे घुमाएं। इसके बाद कंधों, कलाइयों और कोहनियों को हल्के तरीके से मूव करें। कमर, कूल्हों, घुटनों और टखनों को भी धीरे-धीरे चलाकर शरीर को योग के लिए तैयार किया जा सकता है। ध्यान रखें कि किसी भी मूवमेंट में दर्द या असहजता महसूस हो तो उसे जबरदस्ती न करें।</p>
<p><strong>शरीर के साथ मन को भी करें तैयार</strong><br />योग सिर्फ शरीर की एक्सरसाइज नहीं है, बल्कि इसमें मानसिक एकाग्रता भी महत्वपूर्ण होती है। इसलिए अभ्यास शुरू करने से पहले शांत और हवादार जगह चुनें। कुछ मिनट आराम से बैठकर आंखें बंद करें और अपनी सांसों पर ध्यान केंद्रित करें। धीरे-धीरे सांस लेने और छोड़ने से मन को अभ्यास के लिए तैयार करने में मदद मिल सकती है। इसके बाद अपनी क्षमता के अनुसार हल्के आसनों से शुरुआत करें।</p>
<p><strong>शुरुआत में कठिन आसनों से बचें</strong><br />अगर आप योग में नए हैं तो शरीर को तुरंत ज्यादा स्ट्रेच करने की कोशिश न करें। हर व्यक्ति की लचक और शारीरिक क्षमता अलग होती है। इसलिए शुरुआत आसान आसनों से करें और धीरे-धीरे अभ्यास का स्तर बढ़ाएं। अगर आपको पहले से कोई चोट, दर्द या अन्य स्वास्थ्य संबंधी समस्या है, तो योग शुरू करने से पहले विशेषज्ञ या प्रशिक्षित योग शिक्षक की सलाह लेना बेहतर है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>हेल्थ</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 02 Sep 2026 10:41:20 +0530</pubDate>
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