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                <title>हेल्थ - National Jagat Vision</title>
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                <description>हेल्थ RSS Feed</description>
                
                            <item>
                <title>डेंगू में प्लेटलेट्स कब घटने लगती हैं? जानिए कब बढ़ता है खतरा और किन लक्षणों को न करें नजरअंदाज</title>
                                    <description><![CDATA[<p><strong>नई दिल्ली:</strong> मानसून के साथ डेंगू के मामले भी तेजी से बढ़ने लगते हैं। यह बीमारी एडीज (Aedes) मच्छर के काटने से फैलती है और शुरुआती दिनों में तेज बुखार, सिरदर्द, शरीर में दर्द और कमजोरी जैसे लक्षण दिखाई देते हैं। डेंगू का नाम आते ही सबसे बड़ा सवाल प्लेटलेट्स को लेकर होता है। हालांकि, डॉक्टरों का कहना है कि सिर्फ प्लेटलेट्स की संख्या देखकर बीमारी की गंभीरता का अंदाजा नहीं लगाया जा सकता।</p>
<p><strong>कब कम होने लगती हैं प्लेटलेट्स?</strong><br />डेंगू में प्लेटलेट्स आमतौर पर बीमारी के तीसरे से सातवें दिन के बीच घटने लगती हैं। यह वही समय होता</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.nationaljagatvision.com/health/when-do-platelets-start-decreasing-in-dengue-know-when-the/article-11359"><img src="https://www.nationaljagatvision.com/media/400/2026-07/dengue-and-platelets.webp" alt=""></a><br /><p><strong>नई दिल्ली:</strong> मानसून के साथ डेंगू के मामले भी तेजी से बढ़ने लगते हैं। यह बीमारी एडीज (Aedes) मच्छर के काटने से फैलती है और शुरुआती दिनों में तेज बुखार, सिरदर्द, शरीर में दर्द और कमजोरी जैसे लक्षण दिखाई देते हैं। डेंगू का नाम आते ही सबसे बड़ा सवाल प्लेटलेट्स को लेकर होता है। हालांकि, डॉक्टरों का कहना है कि सिर्फ प्लेटलेट्स की संख्या देखकर बीमारी की गंभीरता का अंदाजा नहीं लगाया जा सकता।</p>
<p><strong>कब कम होने लगती हैं प्लेटलेट्स?</strong><br />डेंगू में प्लेटलेट्स आमतौर पर बीमारी के तीसरे से सातवें दिन के बीच घटने लगती हैं। यह वही समय होता है जब कई मरीजों का बुखार उतरने लगता है। इसी अवधि को बीमारी का क्रिटिकल फेज माना जाता है, इसलिए इस दौरान मरीज की नियमित निगरानी और डॉक्टर की सलाह के अनुसार जांच कराना जरूरी होता है।</p>
<p><strong>सामान्य प्लेटलेट्स कितनी होती हैं?</strong><br />एक स्वस्थ व्यक्ति में प्लेटलेट्स की सामान्य संख्या 1.5 लाख से 4.5 लाख प्रति माइक्रोलिटर खून होती है। डेंगू में यह संख्या कम हो सकती है, लेकिन इसका मतलब हमेशा गंभीर स्थिति नहीं होता। डॉक्टर प्लेटलेट्स के साथ-साथ मरीज के लक्षण, ब्लड प्रेशर और अन्य जांच रिपोर्टों का भी मूल्यांकन करते हैं।</p>
<p><strong>इन चेतावनी संकेतों को बिल्कुल न करें नजरअंदाज</strong><br />अगर डेंगू के दौरान निम्न में से कोई भी लक्षण दिखाई दें तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें</p>
<ul>
<li>लगातार तेज पेट दर्द</li>
<li>बार-बार उल्टी होना</li>
<li>नाक या मसूड़ों से खून आना</li>
<li>त्वचा पर लाल या नीले धब्बे दिखना</li>
<li>सांस लेने में परेशानी</li>
<li>अत्यधिक कमजोरी, चक्कर या सुस्ती महसूस होना</li>
<li>पेशाब या मल में खून आना</li>
</ul>
<p>ये संकेत गंभीर डेंगू की ओर इशारा कर सकते हैं और समय पर इलाज बेहद जरूरी होता है।</p>
<p><strong>क्या सिर्फ प्लेटलेट्स कम होना ही चिंता की बात है?</strong><br />नहीं। कई मरीजों में प्लेटलेट्स कम होने के बावजूद कोई गंभीर समस्या नहीं होती, जबकि कुछ मामलों में प्लेटलेट्स अपेक्षाकृत अधिक होने पर भी स्थिति बिगड़ सकती है। इसलिए इलाज का फैसला केवल प्लेटलेट्स की संख्या के आधार पर नहीं किया जाता।</p>
<p><strong>प्लेटलेट्स कम होने पर क्या करें?</strong><br />डेंगू होने पर सबसे जरूरी है कि शरीर में पानी की कमी न होने दें। पर्याप्त मात्रा में पानी, ओआरएस, नारियल पानी, सूप और अन्य तरल पदार्थ लें। डॉक्टर की सलाह के अनुसार समय-समय पर CBC और अन्य जांच कराएं तथा बिना चिकित्सकीय सलाह के कोई दवा न लें। यदि खून बहना, तेज पेट दर्द, लगातार उल्टी, सांस लेने में तकलीफ या बेहोशी जैसे लक्षण दिखाई दें, तो तुरंत अस्पताल पहुंचें। समय पर इलाज मिलने से डेंगू की गंभीर जटिलताओं से बचाव संभव है.</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>हेल्थ</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 30 Jul 2026 10:25:07 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[मनीशंकर पांडेय]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>Fatty Liver Reverse: क्या रात का खाना छोड़ने से ठीक हो सकता है फैटी लिवर? डॉक्टर ने बताया सच</title>
                                    <description><![CDATA[<p><strong>Fatty Liver Disease </strong>भारत में तेजी से बढ़ती स्वास्थ्य समस्याओं में से एक बन चुकी है। विशेषज्ञों के अनुसार, खराब खानपान, बढ़ता मोटापा और निष्क्रिय जीवनशैली इसकी प्रमुख वजहें हैं। ऐसे में कई लोग मानते हैं कि रात का खाना (Dinner) छोड़ देने से फैटी लिवर जल्दी ठीक हो सकता है, लेकिन क्या यह दावा सच है? आइए जानते हैं डॉक्टर की राय।</p>
<p><strong>भारत में कितनी बड़ी है फैटी लिवर की समस्या?</strong><br />विभिन्न अध्ययनों के अनुसार, भारत में लगभग 38–39% वयस्कों में फैटी लिवर की आशंका पाई गई है। यह अनुमान देश के अलग-अलग राज्यों में किए गए करीब 50</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.nationaljagatvision.com/health/fatty-liver-reverse-can-skipping-dinner-cure-fatty-liver-doctor/article-11330"><img src="https://www.nationaljagatvision.com/media/400/2026-07/skipping-dinner-can-reverse-fatty-liver-myth-or-fact-know-by-doctor.webp" alt=""></a><br /><p><strong>Fatty Liver Disease </strong>भारत में तेजी से बढ़ती स्वास्थ्य समस्याओं में से एक बन चुकी है। विशेषज्ञों के अनुसार, खराब खानपान, बढ़ता मोटापा और निष्क्रिय जीवनशैली इसकी प्रमुख वजहें हैं। ऐसे में कई लोग मानते हैं कि रात का खाना (Dinner) छोड़ देने से फैटी लिवर जल्दी ठीक हो सकता है, लेकिन क्या यह दावा सच है? आइए जानते हैं डॉक्टर की राय।</p>
<p><strong>भारत में कितनी बड़ी है फैटी लिवर की समस्या?</strong><br />विभिन्न अध्ययनों के अनुसार, भारत में लगभग 38–39% वयस्कों में फैटी लिवर की आशंका पाई गई है। यह अनुमान देश के अलग-अलग राज्यों में किए गए करीब 50 शोधों पर आधारित है। विशेषज्ञों का मानना है कि करोड़ों लोग किसी न किसी स्तर के फैटी लिवर से प्रभावित हैं। फैटी लिवर आमतौर पर तीन चरणों में विकसित होता है। समय पर इलाज और जीवनशैली में बदलाव न होने पर यह स्थिति लिवर फाइब्रोसिस और आगे चलकर लिवर सिरोसिस जैसी गंभीर बीमारी का रूप ले सकती है।</p>
<p><strong>क्या डिनर छोड़ने से फैटी लिवर रिवर्स हो सकता है?</strong><br />विशेषज्ञों का कहना है कि रात का खाना छोड़ देने से फैटी लिवर रिवर्स हो जाता है, इस बात का कोई ठोस वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है। डॉक्टरों के अनुसार, भोजन छोड़ने के बजाय संतुलित मात्रा में और सही समय पर खाना अधिक फायदेमंद होता है। देर रात खाना खाने से अधिक भूख लग सकती है, जिससे जरूरत से ज्यादा कैलोरी का सेवन होता है और फैटी लिवर की समस्या बढ़ सकती है। इसलिए कोशिश करें कि रात का भोजन समय पर और हल्का हो तथा पूरे दिन की कैलोरी को संतुलित तरीके से छोटे-छोटे हिस्सों में लिया जाए।</p>
<p><strong>फैटी लिवर को रिवर्स करने के लिए अपनाएं ये आदतें</strong></p>
<ul>
<li><strong>वजन नियंत्रित रखें</strong><br />यदि आपका वजन सामान्य से अधिक है, तो उसे धीरे-धीरे कम करने की कोशिश करें। विशेषज्ञों के मुताबिक, शरीर के कुल वजन का 7 से 10 प्रतिशत तक कम होना लिवर में जमा फैट, सूजन और शुरुआती फाइब्रोसिस में सुधार ला सकता है।</li>
<li><strong>नियमित शारीरिक गतिविधि करें</strong><br />हर सप्ताह 150 से 300 मिनट तक मध्यम स्तर की फिजिकल एक्टिविटी करने की सलाह दी जाती है। इसके साथ स्ट्रेंथ ट्रेनिंग को भी अपनी दिनचर्या में शामिल करें, क्योंकि यह मांसपेशियों को मजबूत बनाने और मेटाबॉलिज्म बेहतर करने में मदद करती है।</li>
<li><strong>मीठे और प्रोसेस्ड फूड से दूरी बनाएं</strong><br />कोल्ड ड्रिंक्स, पैकेज्ड फूड, मिठाइयां और हाई-फ्रक्टोज वाले खाद्य पदार्थ लिवर में फैट जमा होने का खतरा बढ़ाते हैं। फैटी लिवर को नियंत्रित करने के लिए इनका सेवन सीमित करना जरूरी है।</li>
<li><strong>पर्याप्त प्रोटीन लें</strong><br />हर भोजन में दाल, पनीर, लो-फैट डेयरी, अंडे, मछली या सोया जैसे प्रोटीन स्रोत शामिल करें। पर्याप्त प्रोटीन वजन घटाने के साथ-साथ मांसपेशियों को सुरक्षित रखने में भी मदद करता है।</li>
</ul>
<p>फैटी लिवर को ठीक करने के लिए सिर्फ रात का खाना छोड़ देना कोई प्रभावी उपाय नहीं है। संतुलित आहार, समय पर भोजन, नियमित व्यायाम, वजन नियंत्रण और स्वस्थ जीवनशैली अपनाकर इस समस्या को काफी हद तक नियंत्रित और शुरुआती चरण में रिवर्स किया जा सकता है। यदि आपको लंबे समय से फैटी लिवर की समस्या है, तो किसी गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट या लिवर विशेषज्ञ से सलाह लेना सबसे बेहतर विकल्प है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>हेल्थ</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 29 Jul 2026 10:56:03 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[मनीशंकर पांडेय]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>Weight Loss Tips: क्या सिर्फ डाइटिंग से घट सकता है वजन? एक्सपर्ट ने बताया हेल्दी वेट लॉस का सही फॉर्मूला</title>
                                    <description><![CDATA[<p>वजन कम करने के लिए ज्यादातर लोग सबसे पहले डाइटिंग का सहारा लेते हैं। हालांकि, क्या सिर्फ कम खाना या डाइट फॉलो करना ही वजन घटाने के लिए पर्याप्त है? हेल्थ एक्सपर्ट्स का मानना है कि शुरुआती दौर में केवल डाइट से कुछ हद तक वजन कम हो सकता है, लेकिन लंबे समय तक स्वस्थ और टिकाऊ वेट लॉस के लिए संतुलित खानपान के साथ नियमित शारीरिक गतिविधि भी उतनी ही जरूरी है।</p>
<p>विशेषज्ञों के अनुसार, सफल वेट लॉस सिर्फ कैलोरी कम करने का नाम नहीं है। इसमें मेटाबॉलिज्म, हार्मोनल बैलेंस, मसल्स मास, अच्छी नींद, स्ट्रेस मैनेजमेंट, गट हेल्थ और</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.nationaljagatvision.com/health/weight-loss-tips-can-weight-be-reduced-only-by-dieting/article-11301"><img src="https://www.nationaljagatvision.com/media/400/2026-07/without-exercise-only-dieting-can-help-in-weight-loss-know-by-expert-1.webp" alt=""></a><br /><p>वजन कम करने के लिए ज्यादातर लोग सबसे पहले डाइटिंग का सहारा लेते हैं। हालांकि, क्या सिर्फ कम खाना या डाइट फॉलो करना ही वजन घटाने के लिए पर्याप्त है? हेल्थ एक्सपर्ट्स का मानना है कि शुरुआती दौर में केवल डाइट से कुछ हद तक वजन कम हो सकता है, लेकिन लंबे समय तक स्वस्थ और टिकाऊ वेट लॉस के लिए संतुलित खानपान के साथ नियमित शारीरिक गतिविधि भी उतनी ही जरूरी है।</p>
<p>विशेषज्ञों के अनुसार, सफल वेट लॉस सिर्फ कैलोरी कम करने का नाम नहीं है। इसमें मेटाबॉलिज्म, हार्मोनल बैलेंस, मसल्स मास, अच्छी नींद, स्ट्रेस मैनेजमेंट, गट हेल्थ और नियमित एक्सरसाइज जैसे कई पहलुओं की अहम भूमिका होती है।</p>
<p><strong>सिर्फ डाइट नहीं, एक्सरसाइज भी है जरूरी</strong><br />एक्सपर्ट्स का कहना है कि वजन घटाने के लिए कैलोरी डिफिसिट जरूरी है, लेकिन क्रैश डाइटिंग से बचना चाहिए। सही वेट लॉस के लिए इन बातों का ध्यान रखना बेहद जरूरी है</p>
<ul>
<li>हर मील में पर्याप्त और उच्च गुणवत्ता वाला प्रोटीन शामिल करें।</li>
<li>सप्ताह में 2 से 4 दिन स्ट्रेंथ ट्रेनिंग करें।</li>
<li>रोजाना 7,000 से 10,000 कदम चलने की कोशिश करें।</li>
<li>हर रात 7 से 8 घंटे की गुणवत्तापूर्ण नींद लें।</li>
<li>तनाव को नियंत्रित रखने के लिए मेडिटेशन या अन्य रिलैक्सेशन तकनीकों को अपनाएं।</li>
</ul>
<p>विशेषज्ञों का कहना है कि यदि केवल डाइट पर ध्यान दिया जाए और प्रोटीन व एक्सरसाइज को नजरअंदाज किया जाए, तो शरीर में फैट के साथ-साथ मसल्स भी कम होने लगती हैं। इससे मेटाबॉलिज्म धीमा पड़ सकता है और भविष्य में दोबारा वजन बढ़ने का खतरा भी बढ़ जाता है।</p>
<p><strong>मेटाबॉलिक और गट हेल्थ पर भी दें ध्यान</strong><br />एक्सपर्ट्स के अनुसार, वजन कम करने का लक्ष्य सिर्फ तराजू पर दिखने वाला आंकड़ा कम करना नहीं होना चाहिए, बल्कि मेटाबॉलिक हेल्थ और गट हेल्थ को बेहतर बनाना भी जरूरी है। लगातार बनी रहने वाली क्रोनिक गट इंफ्लामेशन पाचन तंत्र, इंसुलिन रेजिस्टेंस, हार्मोनल असंतुलन और वजन नियंत्रण को प्रभावित कर सकती है। यही नहीं, यह लंबे समय में टाइप-2 डायबिटीज, हृदय रोग और कुछ प्रकार के कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों के खतरे को भी बढ़ा सकती है। इसी वजह से विशेषज्ञ पर्सनलाइज्ड न्यूट्रिशन, गट हीलिंग, एंटी-इंफ्लामेटरी फूड्स और सस्टेनेबल लाइफस्टाइल अपनाने की सलाह देते हैं, ताकि व्यक्ति सिर्फ वजन ही नहीं घटाए, बल्कि संपूर्ण स्वास्थ्य भी बेहतर बना सके।</p>
<p><strong>हेल्दी वेट लॉस का सफल फॉर्मूला</strong><br />विशेषज्ञों के मुताबिक, लंबे समय तक वजन नियंत्रित रखने और फिट रहने के लिए इन आदतों को अपनी दिनचर्या का हिस्सा बनाएं </p>
<ul>
<li>संतुलित और पौष्टिक आहार</li>
<li>पर्याप्त प्रोटीन का सेवन</li>
<li>स्वस्थ गट हेल्थ</li>
<li>नियमित स्ट्रेंथ ट्रेनिंग</li>
<li>रोजाना शारीरिक गतिविधि</li>
<li>7–8 घंटे की अच्छी नींद</li>
<li>तनाव पर नियंत्रण</li>
<li>निरंतरता और अनुशासन</li>
</ul>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>हेल्थ</category>
                                    

                <link>https://www.nationaljagatvision.com/health/weight-loss-tips-can-weight-be-reduced-only-by-dieting/article-11301</link>
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                <pubDate>Tue, 28 Jul 2026 10:51:39 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[मनीशंकर पांडेय]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>Kidney Disease and Heart Health: किडनी की बीमारी क्यों बढ़ा देती है हार्ट अटैक का खतरा? जानिए दोनों अंगों का गहरा संबंध</title>
                                    <description><![CDATA[<p><strong>Kidney Disease and Heart Health: </strong>किडनी और दिल शरीर के दो ऐसे महत्वपूर्ण अंग हैं, जो एक-दूसरे के कामकाज से गहराई से जुड़े होते हैं। किडनी का मुख्य काम शरीर से विषैले तत्व, अतिरिक्त पानी और नमक को बाहर निकालकर खून को साफ रखना है। साथ ही यह ब्लड प्रेशर को नियंत्रित रखने में भी अहम भूमिका निभाती है। लेकिन जब किडनी ठीक से काम करना बंद कर देती है, तो इसका असर केवल किडनी तक सीमित नहीं रहता, बल्कि दिल की सेहत भी गंभीर रूप से प्रभावित हो सकती है।</p>
<p>स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, क्रोनिक किडनी डिजीज (CKD) से</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.nationaljagatvision.com/health/kidney-disease-and-heart-health-why-kidney-disease-increases-the/article-11266"><img src="https://www.nationaljagatvision.com/media/400/2026-07/doctor-shares-reasons-why-chronic-kidney-dieases-effect-on-heart-health.webp" alt=""></a><br /><p><strong>Kidney Disease and Heart Health: </strong>किडनी और दिल शरीर के दो ऐसे महत्वपूर्ण अंग हैं, जो एक-दूसरे के कामकाज से गहराई से जुड़े होते हैं। किडनी का मुख्य काम शरीर से विषैले तत्व, अतिरिक्त पानी और नमक को बाहर निकालकर खून को साफ रखना है। साथ ही यह ब्लड प्रेशर को नियंत्रित रखने में भी अहम भूमिका निभाती है। लेकिन जब किडनी ठीक से काम करना बंद कर देती है, तो इसका असर केवल किडनी तक सीमित नहीं रहता, बल्कि दिल की सेहत भी गंभीर रूप से प्रभावित हो सकती है।</p>
<p>स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, क्रोनिक किडनी डिजीज (CKD) से जूझ रहे लोगों में हार्ट अटैक, हार्ट फेलियर और स्ट्रोक जैसी हृदय संबंधी बीमारियों का खतरा सामान्य लोगों की तुलना में काफी अधिक होता है। इसलिए किडनी की बीमारी को केवल एक अंग की समस्या मानना बड़ी भूल हो सकती है।</p>
<p><strong>किडनी खराब होने पर दिल पर क्यों बढ़ता है दबाव?</strong><br />जब किडनी खून को सही तरीके से फिल्टर नहीं कर पाती, तो शरीर में अतिरिक्त पानी, नमक और विषैले पदार्थ जमा होने लगते हैं। इससे ब्लड प्रेशर बढ़ सकता है और दिल को खून पंप करने के लिए सामान्य से अधिक मेहनत करनी पड़ती है। लंबे समय तक यह स्थिति बनी रहने पर हृदय की मांसपेशियां कमजोर होने लगती हैं, जिससे हार्ट फेलियर और हार्ट अटैक का जोखिम बढ़ जाता है।</p>
<p>इसके अलावा किडनी की बीमारी शरीर में इलेक्ट्रोलाइट और मिनरल्स का संतुलन भी बिगाड़ सकती है, जो दिल की धड़कनों को प्रभावित कर सकता है। कई मरीजों में एनीमिया और शरीर में सूजन भी विकसित हो जाती है, जिससे हृदय पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है।</p>
<p><strong>किन लोगों को सबसे ज्यादा सावधान रहने की जरूरत है?</strong><br />विशेषज्ञों का कहना है कि डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर, मोटापा या पहले से किडनी की बीमारी से पीड़ित लोगों में हृदय रोगों का खतरा अधिक होता है। ऐसे लोगों को नियमित रूप से किडनी फंक्शन टेस्ट, ब्लड प्रेशर और हार्ट हेल्थ की जांच कराते रहना चाहिए, ताकि किसी भी समस्या का समय रहते पता चल सके।</p>
<p><strong>किडनी खराब होने के शुरुआती संकेत</strong><br />किडनी की बीमारी शुरुआती चरण में अक्सर बिना किसी स्पष्ट लक्षण के बढ़ती है, इसलिए इसे "साइलेंट डिजीज" भी कहा जाता है। हालांकि समय के साथ कुछ संकेत दिखाई दे सकते हैं, जैसे</p>
<ul>
<li>पैरों, टखनों या चेहरे पर सूजन</li>
<li>बार-बार या बहुत कम पेशाब आना</li>
<li>पेशाब में झाग या खून दिखाई देना</li>
<li>लगातार हाई ब्लड प्रेशर</li>
<li>भूख कम लगना और थकान महसूस होना</li>
<li>त्वचा में खुजली</li>
<li>शरीर में कमजोरी या सांस फूलना</li>
</ul>
<p>इनमें से कोई भी लक्षण लगातार दिखाई दे तो डॉक्टर से तुरंत सलाह लेनी चाहिए।</p>
<p><strong>किडनी और दिल को स्वस्थ रखने के आसान उपाय</strong><br />दोनों अंगों को स्वस्थ रखने के लिए संतुलित जीवनशैली बेहद जरूरी है। विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि</p>
<ul>
<li>संतुलित और फाइबर युक्त आहार लें।</li>
<li>पर्याप्त मात्रा में पानी पिएं। (पानी की सही मात्रा व्यक्ति की उम्र, मौसम और स्वास्थ्य स्थिति पर निर्भर करती है। यदि</li>
<li>किडनी या हार्ट की बीमारी है, तो पानी की मात्रा डॉक्टर की सलाह के अनुसार ही तय करें।)</li>
<li>ताजे फल और पानी से भरपूर सब्जियों को भोजन में शामिल करें।</li>
<li>धूम्रपान और तंबाकू से दूरी बनाए रखें।</li>
<li>बिना डॉक्टर की सलाह के लंबे समय तक दर्द निवारक दवाओं (Painkillers) का सेवन न करें।</li>
<li>नियमित व्यायाम करें और वजन नियंत्रित रखें।</li>
<li>ब्लड प्रेशर और ब्लड शुगर को नियंत्रण में रखें।</li>
<li>डॉक्टर द्वारा दी गई दवाएं समय पर लें और नियमित स्वास्थ्य जांच कराते रहें।</li>
</ul>
<p>विशेषज्ञों के मुताबिक, किडनी और दिल दोनों की सेहत एक-दूसरे से जुड़ी होती है। इसलिए यदि किडनी की बीमारी का समय रहते इलाज और सही देखभाल की जाए, तो गंभीर हृदय रोगों के खतरे को भी काफी हद तक कम किया जा सकता है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>हेल्थ</category>
                                    

                <link>https://www.nationaljagatvision.com/health/kidney-disease-and-heart-health-why-kidney-disease-increases-the/article-11266</link>
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                <pubDate>Mon, 27 Jul 2026 10:43:23 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[मनीशंकर पांडेय]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>बस्तर में मलेरिया से 10 दिन में 3 स्कूली बच्चों की मौत, बजट मंजूर होने के बाद भी 2 साल से नहीं बंटी मच्छरदानियां</title>
                                    <description><![CDATA[<p>जगदलपुर/कांकेर. स्वास्थ्य विभाग कागजों पर बस्तर को मलेरिया मुक्त बनाने के लिए अभियान का 14वां चरण चला रहा है। वहीं, जमीनी हकीकत कुछ और ही कहानी कह रही है। इलाके में संक्रमण थम नहीं रहा है और लगातार मौतें हो रही हैं। कांकेर में बीते 10 दिनों के भीतर तीन स्कूली बच्चों की जान जा चुकी है। यह स्थिति तब है, जब मलेरिया रोकने का सबसे मुख्य हथियार, मेडिकेटेड मच्छरदानी, पिछले दो साल से वहां बांटी ही नहीं गई है। हैरानी की बात यह है कि केंद्र सरकार से बजट मंजूर हुए लंबा वक्त बीत चुका है, फिर भी खरीदी</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.nationaljagatvision.com/chhattisgarh/in-bastar-3-school-children-died-of-malaria-in-10/article-11283"><img src="https://www.nationaljagatvision.com/media/400/2026-07/20260727_094351.jpg" alt=""></a><br /><p>जगदलपुर/कांकेर. स्वास्थ्य विभाग कागजों पर बस्तर को मलेरिया मुक्त बनाने के लिए अभियान का 14वां चरण चला रहा है। वहीं, जमीनी हकीकत कुछ और ही कहानी कह रही है। इलाके में संक्रमण थम नहीं रहा है और लगातार मौतें हो रही हैं। कांकेर में बीते 10 दिनों के भीतर तीन स्कूली बच्चों की जान जा चुकी है। यह स्थिति तब है, जब मलेरिया रोकने का सबसे मुख्य हथियार, मेडिकेटेड मच्छरदानी, पिछले दो साल से वहां बांटी ही नहीं गई है। हैरानी की बात यह है कि केंद्र सरकार से बजट मंजूर हुए लंबा वक्त बीत चुका है, फिर भी खरीदी की टेंडर प्रक्रिया शुरू नहीं हो पाई है।</p>
<p>इस साल जनवरी से लेकर अब तक संभाग में 8426 लोग मलेरिया से पीड़ित हो चुके हैं। कांकेर जिले के मर्दापोटी बालक आश्रम में पढ़ने वाले चौथी कक्षा के छात्र सुभाष कुमेटी (9) की रविवार सुबह इलाज के दौरान मौत हो गई। जिले में पिछले दो दिन में मलेरिया से दो बच्चों की जान गई है। तीनों मृतक स्कूली बच्चे हैं। सुभाष की तबीयत बिगड़ने पर परिजन पहले उसे अस्पताल ले जाने के बजाय गांव में झाड़-फूंक कराने ले गए। गंभीर हालत में दोपहर करीब 3:30 बजे उसे अस्पताल पहुंचाया गया, लेकिन तब तक काफी देर हो चुकी थी। मर्दापोटी आश्रम में 22 से 24 जुलाई के बीच हुई स्वास्थ्य जांच में 9 छात्र मलेरिया पॉजिटिव मिले थे। इनमें से तामेश्वर भास्कर (7) और विक्रम मंडावी (8) की हालत गंभीर होने पर उन्हें रायपुर रेफर किया गया। नवीन कुमेटी का इलाज एमसीएच अलबेलापारा में जारी है। लगातार हो रही मौतों के बाद सहायक आयुक्त जया मनु और जिला स्वास्थ्य अधिकारी की टीम ने आश्रम पहुंचकर बच्चों का दोबारा टेस्ट कराया है।</p>
<p>सरकारी सिस्टम की लेटलतीफी का आलम यह है कि मानसून के साथ जुलाई-अगस्त से दिसंबर तक बस्तर में मलेरिया का पीक सीजन रहता है। पहले संभाग में 3-3 साल के रोटेशन पर हर साल औसतन 17 लाख मेडिकेटेड मच्छरदानियां बांटी जाती थीं। हर साल किसी न किसी जिले को सप्लाई जरूर मिलती थी, लेकिन बीते दो वर्षों से यह कोटा पूरी तरह शून्य बना हुआ है। प्रकोप का सीजन आ चुका है और अब तक यह सर्वे तक नहीं हुआ कि किस गांव या जिले में कितनी मच्छरदानियों की जरूरत है। स्वास्थ्य विभाग के मलेरिया कंसल्टेंट एन. चिन्मय दास का कहना है कि इस साल सीजीएमएससी (छत्तीसगढ़ मेडिकल सर्विसेस कार्पोरेशन) के जरिए खरीदी होनी है, जिसकी कागजी प्रक्रिया चल रही है। टेंडर और खरीदी के बाद बांटने में तीन-चार महीने गुजर जाएंगे, यानी इस पूरे सीजन में मच्छरदानी नहीं बंट सकेगी।</p>
<p>मरीजों के प्रकार देखें तो दो परजीवियों वाले मिक्स मलेरिया (डबल अटैक) के 254 पॉजिटिव केस मिले हैं। कुल 8,426 मरीजों में 7,021 पी. फाल्सीपेरम और 1,168 पी. विवैक्स से पीड़ित हैं। जिलेवार स्थिति देखें तो बीजापुर सबसे ज्यादा प्रभावित है, जहां 3173 मरीज मिले हैं। इसके बाद सुकमा में 1686, दंतेवाड़ा में 1344, नारायणपुर में 896, बस्तर में 809, कोंडागांव में 329 और कांकेर में 189 मरीज सामने आए हैं। दंतेवाड़ा के जिला मलेरिया अधिकारी देश दीपक बताते हैं कि मलेरिया किसी भी रूप में हो, शरीर के लिए खतरनाक होता है। मिक्स मलेरिया भी गंभीर चुनौती है, हालांकि राहत की बात है कि मरीजों की संख्या में धीरे-धीरे कमी आ रही है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>छत्तीसगढ़</category>
                                            <category>हेल्थ</category>
                                            <category>प्रशासनिक </category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 27 Jul 2026 09:44:18 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[मनीशंकर पांडेय]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>High Cholesterol क्यों बढ़ता है? रोज की ये गलत आदतें बना सकती हैं हार्ट डिजीज का कारण, जानें एक्सपर्ट की सलाह</title>
                                    <description><![CDATA[<p><strong>High Cholesterol Causes: </strong>शरीर में कोलेस्ट्रॉल एक जरूरी वसा (Fat) है, लेकिन जब एलडीएल (LDL) यानी बैड कोलेस्ट्रॉल का स्तर बढ़ने लगता है, तो यह हृदय और रक्त वाहिकाओं के लिए गंभीर खतरा बन सकता है। लंबे समय तक हाई कोलेस्ट्रॉल रहने पर धमनियों में चर्बी जमा होने लगती है, जिससे हार्ट अटैक, स्ट्रोक और अन्य हृदय रोगों का जोखिम बढ़ सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि हाई कोलेस्ट्रॉल अचानक नहीं बढ़ता, बल्कि हमारी रोजमर्रा की कुछ गलत आदतें धीरे-धीरे इसकी वजह बनती हैं। आइए जानते हैं कि किन कारणों से बैड कोलेस्ट्रॉल बढ़ सकता है और इससे बचने</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.nationaljagatvision.com/health/why-does-high-cholesterol-increase-these-bad-daily-habits-can/article-11247"><img src="https://www.nationaljagatvision.com/media/400/2026-07/doctor-shares-high-cholesterol-increasing-mistakes-in-hindi.webp" alt=""></a><br /><p><strong>High Cholesterol Causes: </strong>शरीर में कोलेस्ट्रॉल एक जरूरी वसा (Fat) है, लेकिन जब एलडीएल (LDL) यानी बैड कोलेस्ट्रॉल का स्तर बढ़ने लगता है, तो यह हृदय और रक्त वाहिकाओं के लिए गंभीर खतरा बन सकता है। लंबे समय तक हाई कोलेस्ट्रॉल रहने पर धमनियों में चर्बी जमा होने लगती है, जिससे हार्ट अटैक, स्ट्रोक और अन्य हृदय रोगों का जोखिम बढ़ सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि हाई कोलेस्ट्रॉल अचानक नहीं बढ़ता, बल्कि हमारी रोजमर्रा की कुछ गलत आदतें धीरे-धीरे इसकी वजह बनती हैं। आइए जानते हैं कि किन कारणों से बैड कोलेस्ट्रॉल बढ़ सकता है और इससे बचने के लिए क्या करना चाहिए।</p>
<p><strong>हाई कोलेस्ट्रॉल क्यों बढ़ता है?</strong><br />डॉ. के अनुसार, खराब खानपान और निष्क्रिय जीवनशैली हाई कोलेस्ट्रॉल के सबसे बड़े कारणों में शामिल हैं।</p>
<p>उनके मुताबिक, इन आदतों से LDL कोलेस्ट्रॉल बढ़ सकता है</p>
<ul>
<li>तला-भुना और ऑयली भोजन का अधिक सेवन</li>
<li>जंक फूड और प्रोसेस्ड फूड खाना</li>
<li>ट्रांस फैट और रिफाइंड फूड्स का ज्यादा सेवन</li>
<li>मीठे पेय और अधिक चीनी वाले खाद्य पदार्थ</li>
<li>लंबे समय तक शारीरिक गतिविधि न करना</li>
</ul>
<p><strong>ये गलतियां भी बढ़ाती हैं जोखिम</strong><br />डॉ. के अनुसार, केवल खानपान ही नहीं बल्कि कुछ अन्य जीवनशैली संबंधी आदतें भी कोलेस्ट्रॉल बढ़ाने में भूमिका निभाती हैं, जैसे</p>
<ul>
<li>घंटों तक लगातार बैठे रहना</li>
<li>बढ़ता हुआ वजन या मोटापा</li>
<li>धूम्रपान</li>
<li>शराब का अधिक सेवन</li>
<li>पर्याप्त नींद न लेना</li>
<li>नियमित व्यायाम का अभाव</li>
</ul>
<p><strong>किन बीमारियों में बढ़ सकता है कोलेस्ट्रॉल?</strong><br />कुछ स्वास्थ्य समस्याएं भी हाई कोलेस्ट्रॉल का कारण बन सकती हैं, जिनमें डायबिटीज, हाइपोथायरॉयडिज्म (थायरॉयड की कमी), किडनी से जुड़ी कुछ बीमारियां, पारिवारिक या आनुवंशिक (Genetic) कारण शामिल हैं। विशेषज्ञ बताते हैं कि हाई कोलेस्ट्रॉल अक्सर शुरुआती चरण में कोई स्पष्ट लक्षण नहीं देता। इसलिए जोखिम वाले लोगों को समय-समय पर लिपिड प्रोफाइल टेस्ट कराते रहना चाहिए।</p>
<p><strong>कोलेस्ट्रॉल कंट्रोल करने के लिए क्या करें?</strong><br />हाई कोलेस्ट्रॉल को नियंत्रित रखने के लिए विशेषज्ञ ये उपाय अपनाने की सलाह देते हैं</p>
<ul>
<li>संतुलित और फाइबर युक्त आहार लें।</li>
<li>तले हुए, प्रोसेस्ड और ट्रांस फैट वाले खाद्य पदार्थ कम खाएं।</li>
<li>रोजाना कम से कम 30 मिनट व्यायाम या तेज चाल से पैदल चलें।</li>
<li>स्वस्थ वजन बनाए रखें।</li>
<li>धूम्रपान और अत्यधिक शराब से बचें।</li>
<li>डॉक्टर की सलाह के अनुसार दवाएं और नियमित जांच जारी रखें।</li>
</ul>
<p><strong>Disclaimer: यह लेख केवल सामान्य स्वास्थ्य जानकारी के उद्देश्य से है। यदि आपका कोलेस्ट्रॉल स्तर बढ़ा हुआ है या आपको हृदय रोग का जोखिम है, तो स्वयं इलाज करने के बजाय योग्य चिकित्सक से परामर्श लेकर जांच और उपचार कराएं।</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>हेल्थ</category>
                                    

                <link>https://www.nationaljagatvision.com/health/why-does-high-cholesterol-increase-these-bad-daily-habits-can/article-11247</link>
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                <pubDate>Sat, 25 Jul 2026 10:44:57 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[मनीशंकर पांडेय]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>पीरियड्स में ठंडा पानी पीना सही या गलत? जानिए क्या है सच, एक्सपर्ट ने तोड़ा बड़ा मिथक</title>
                                    <description><![CDATA[<p><strong>Periods and Cold Water Myth: </strong>पीरियड्स को लेकर समाज में कई तरह की मान्यताएं प्रचलित हैं। इनमें से एक आम धारणा यह भी है कि मासिक धर्म के दौरान ठंडा पानी या ठंडी चीजें खाने-पीने से ब्लड फ्लो रुक सकता है या दर्द बढ़ सकता है। लेकिन क्या इसका कोई वैज्ञानिक आधार है? स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि इस धारणा का समर्थन करने वाला कोई ठोस वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है। आइए जानते हैं कि पीरियड्स के दौरान ठंडा पानी पीना सुरक्षित है या नहीं।</p>
<p><strong>क्या कहती हैं एक्सपर्ट?</strong><br />विशेषज्ञों के अनुसार, पीरियड्स के दौरान ठंडा पानी पीने से</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.nationaljagatvision.com/health/is-drinking-cold-water-during-periods-right-or-wrong-know/article-11226"><img src="https://www.nationaljagatvision.com/media/400/2026-07/drinking-cold-water-during-periods-in-myth-or-fact.webp" alt=""></a><br /><p><strong>Periods and Cold Water Myth: </strong>पीरियड्स को लेकर समाज में कई तरह की मान्यताएं प्रचलित हैं। इनमें से एक आम धारणा यह भी है कि मासिक धर्म के दौरान ठंडा पानी या ठंडी चीजें खाने-पीने से ब्लड फ्लो रुक सकता है या दर्द बढ़ सकता है। लेकिन क्या इसका कोई वैज्ञानिक आधार है? स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि इस धारणा का समर्थन करने वाला कोई ठोस वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है। आइए जानते हैं कि पीरियड्स के दौरान ठंडा पानी पीना सुरक्षित है या नहीं।</p>
<p><strong>क्या कहती हैं एक्सपर्ट?</strong><br />विशेषज्ञों के अनुसार, पीरियड्स के दौरान ठंडा पानी पीने से मासिक धर्म रुकता है या दर्द बढ़ता है, ऐसा साबित करने वाला कोई वैज्ञानिक साक्ष्य नहीं है।पीरियड्स के दौरान होने वाली ऐंठन और दर्द मुख्य रूप से हार्मोनल बदलाव और गर्भाशय (Uterus) की मांसपेशियों के सिकुड़ने की वजह से होता है। इस प्रक्रिया में प्रोस्टाग्लैंडिन (Prostaglandins) नामक रसायन महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, जो गर्भाशय में संकुचन बढ़ाकर दर्द का कारण बन सकते हैं।</p>
<p><strong>पीरियड्स में हाइड्रेट रहना क्यों जरूरी है?</strong><br />डॉक्टरों के अनुसार, मासिक धर्म के दौरान शरीर को पर्याप्त मात्रा में पानी मिलना बेहद जरूरी है। पर्याप्त पानी पीने से</p>
<ul>
<li>शरीर में पानी की कमी नहीं होती।</li>
<li>थकान और कमजोरी कम महसूस हो सकती है।</li>
<li>सिरदर्द और डिहाइड्रेशन का जोखिम घट सकता है।</li>
<li>शरीर बेहतर तरीके से काम करता है।</li>
</ul>
<p>यदि आपको ठंडा पानी पीने में कोई परेशानी नहीं होती, तो अपनी सुविधा के अनुसार सामान्य या ठंडा पानी पी सकती हैं।</p>
<p><strong>कब गुनगुना पानी बेहतर विकल्प हो सकता है?</strong><br />हर महिला का शरीर अलग-अलग प्रतिक्रिया देता है। कुछ महिलाओं को ठंडा पानी पीने के बाद पेट में भारीपन, गैस या ब्लोटिंग महसूस हो सकती है। ऐसी स्थिति में गुनगुना पानी अधिक आरामदायक लग सकता है। हालांकि, यह व्यक्तिगत अनुभव पर निर्भर करता है, न कि किसी वैज्ञानिक नियम पर।</p>
<p><strong>पीरियड्स के दौरान रखें इन बातों का ध्यान</strong></p>
<ul>
<li>दिनभर पर्याप्त मात्रा में पानी पिएं।</li>
<li>संतुलित और पौष्टिक आहार लें।</li>
<li>जरूरत के अनुसार आराम करें।</li>
<li>हल्की-फुल्की शारीरिक गतिविधि या वॉक करें, यदि स्वास्थ्य अनुमति दे।</li>
<li>अत्यधिक दर्द, बहुत ज्यादा ब्लीडिंग या बार-बार अनियमित पीरियड्स होने पर स्त्री रोग विशेषज्ञ से सलाह लें।</li>
</ul>
<p><strong>Disclaimer: यह लेख सामान्य स्वास्थ्य जानकारी के उद्देश्य से तैयार किया गया है। इसे चिकित्सकीय सलाह का विकल्प न मानें। यदि पीरियड्स के दौरान लगातार गंभीर दर्द, अत्यधिक रक्तस्राव या अन्य असामान्य लक्षण हों, तो योग्य डॉक्टर से परामर्श अवश्य लें।</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>हेल्थ</category>
                                    

                <link>https://www.nationaljagatvision.com/health/is-drinking-cold-water-during-periods-right-or-wrong-know/article-11226</link>
                <guid>https://www.nationaljagatvision.com/health/is-drinking-cold-water-during-periods-right-or-wrong-know/article-11226</guid>
                <pubDate>Fri, 24 Jul 2026 10:47:43 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[मनीशंकर पांडेय]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>40 की उम्र से पहले ही घटने लगी हैं मांसपेशियां? कहीं यह Sarcopenia तो नहीं, जानें लक्षण, कारण और बचाव</title>
                                    <description><![CDATA[<p><strong>Sarcopenia Symptoms &amp; Prevention:</strong> बढ़ती उम्र के साथ मांसपेशियों (Muscles) का धीरे-धीरे कम होना सामान्य माना जाता है। लेकिन यदि 30–40 वर्ष की उम्र में ही मांसपेशियां कमजोर होने लगें, ताकत घटने लगे या रोजमर्रा के काम कठिन महसूस होने लगें, तो यह सार्कोपेनिया (Sarcopenia) नामक बीमारी का संकेत हो सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार, यह समस्या पहले मुख्य रूप से बुजुर्गों में देखी जाती थी, लेकिन अब खराब खानपान, शारीरिक निष्क्रियता, डायबिटीज और अनियमित जीवनशैली के कारण कम उम्र के लोगों में भी इसके मामले बढ़ रहे हैं।</p>
<p><strong>क्या है Sarcopenia?</strong><br />सार्कोपेनिया एक ऐसी चिकित्सीय स्थिति है, जिसमें शरीर</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.nationaljagatvision.com/health/muscles-have-started-decreasing-even-before-the-age-of-40/article-11204"><img src="https://www.nationaljagatvision.com/media/400/2026-07/facts-about-sarcopenia-affects-muscles-health-diabetes-in-small-age-health-tips.webp" alt=""></a><br /><p><strong>Sarcopenia Symptoms &amp; Prevention:</strong> बढ़ती उम्र के साथ मांसपेशियों (Muscles) का धीरे-धीरे कम होना सामान्य माना जाता है। लेकिन यदि 30–40 वर्ष की उम्र में ही मांसपेशियां कमजोर होने लगें, ताकत घटने लगे या रोजमर्रा के काम कठिन महसूस होने लगें, तो यह सार्कोपेनिया (Sarcopenia) नामक बीमारी का संकेत हो सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार, यह समस्या पहले मुख्य रूप से बुजुर्गों में देखी जाती थी, लेकिन अब खराब खानपान, शारीरिक निष्क्रियता, डायबिटीज और अनियमित जीवनशैली के कारण कम उम्र के लोगों में भी इसके मामले बढ़ रहे हैं।</p>
<p><strong>क्या है Sarcopenia?</strong><br />सार्कोपेनिया एक ऐसी चिकित्सीय स्थिति है, जिसमें शरीर की मांसपेशियों का द्रव्यमान (Muscle Mass), ताकत और कार्यक्षमता धीरे-धीरे कम होने लगती है। इस शब्द का पहली बार 1989 में डॉ. इरविन रोसेनबर्ग ने इस्तेमाल किया था और वर्ष 2016 में इसे आधिकारिक तौर पर एक बीमारी के रूप में मान्यता दी गई। भारत में भी Geriatric Society of India ने इसके समय पर पहचान और इलाज के लिए दिशानिर्देश जारी किए हैं, ताकि लोगों में मांसपेशियों की कमजोरी का जल्द पता लगाया जा सके।</p>
<p><strong>कम उम्र में क्यों बढ़ रहे हैं मामले?</strong><br />विशेषज्ञों के अनुसार, Sarcopenia के पीछे कई कारण हो सकते हैं, जिनमें प्रमुख हैं</p>
<ul>
<li>प्रोटीन की कमी वाला आहार</li>
<li>शारीरिक गतिविधि और स्ट्रेंथ ट्रेनिंग का अभाव</li>
<li>लंबे समय तक बैठकर काम करने की आदत</li>
<li>टाइप-1 और टाइप-2 डायबिटीज</li>
<li>बढ़ती उम्र</li>
<li>कुछ मामलों में लंबे समय तक स्टेरॉयड का उपयोग</li>
</ul>
<p><strong>डायबिटीज वाले लोगों में क्यों बढ़ जाता है खतरा?</strong><br />डायबिटीज से पीड़ित लोगों में Sarcopenia का जोखिम अधिक माना जाता है।</p>
<ul>
<li>टाइप-1 डायबिटीज में इंसुलिन की कमी के कारण मांसपेशियों का निर्माण प्रभावित हो सकता है।</li>
<li>टाइप-2 डायबिटीज में इंसुलिन रेजिस्टेंस विकसित होने से शरीर मांसपेशियों को सही ढंग से बनाए नहीं रख पाता।</li>
</ul>
<p>विशेषज्ञों के मुताबिक, लंबे समय तक ब्लड शुगर बढ़ी रहने से नई मांसपेशियां बनने की प्रक्रिया धीमी हो सकती है, जबकि पुरानी मांसपेशियों का टूटना बढ़ सकता है। इससे कमजोरी, संतुलन में कमी और शारीरिक क्षमता प्रभावित हो सकती है।</p>
<p><strong>एक्सपर्ट क्या कहते हैं?</strong><br />डॉ. के अनुसार, शरीर में मांसपेशियां लगातार टूटती और दोबारा बनती रहती हैं। इस प्रक्रिया के लिए हर दिन पर्याप्त और अच्छी गुणवत्ता वाला प्राकृतिक प्रोटीन जरूरी है। उनका कहना है कि अधिकांश लोग अपनी दैनिक जरूरत के अनुसार प्रोटीन नहीं ले पाते। यदि लंबे समय तक ऐसा होता रहे, तो मांसपेशियां धीरे-धीरे कमजोर होने लगती हैं। उन्होंने यह भी बताया कि आजकल घंटों बैठकर काम करने और स्ट्रेंथ एक्सरसाइज न करने की वजह से भी मांसपेशियों का उपयोग कम हो जाता है, जिससे Sarcopenia का खतरा बढ़ सकता है।</p>
<p><strong>कैसे करें बचाव?</strong><br />विशेषज्ञों के अनुसार, कुछ आसान आदतें अपनाकर Sarcopenia के जोखिम को काफी हद तक कम किया जा सकता है</p>
<ul>
<li>रोजाना पर्याप्त मात्रा में प्राकृतिक प्रोटीन लें, जैसे दाल, दूध, पनीर, अंडे, अंकुरित अनाज और दही।</li>
<li>सप्ताह में कम से कम 2–3 दिन स्ट्रेंथ ट्रेनिंग या रेजिस्टेंस एक्सरसाइज करें।</li>
<li>लंबे समय तक लगातार बैठने से बचें और नियमित रूप से सक्रिय रहें।</li>
<li>डायबिटीज या अन्य पुरानी बीमारियों को नियंत्रण में रखें।</li>
<li>बिना डॉक्टर की सलाह के स्टेरॉयड या प्रोटीन सप्लीमेंट का सेवन न करें।</li>
</ul>
<p><strong>ध्यान दें: यदि कम उम्र में लगातार मांसपेशियां कमजोर हो रही हों, वजन घट रहा हो, चलने-फिरने में कठिनाई महसूस हो रही हो या रोजमर्रा के काम करने में परेशानी हो रही हो, तो स्वयं अनुमान लगाने के बजाय किसी फिजिशियन या एंडोक्राइनोलॉजिस्ट से सलाह लेकर उचित जांच कराना बेहतर है।</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>हेल्थ</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 23 Jul 2026 10:43:01 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[मनीशंकर पांडेय]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>ऑनलाइन खरीदी आर्टिफिशियल ज्वेलरी बन सकती है सेहत का खतरा! जांच में मिला 9,000 गुना ज्यादा जहरीला मेटल</title>
                                    <description><![CDATA[<p><strong>Artificial Jewellery Health Risk: </strong>ऑनलाइन शॉपिंग के बढ़ते चलन के बीच एक चौंकाने वाली रिपोर्ट सामने आई है। ब्रिटेन (यूके) में हुई जांच में कुछ ऑनलाइन और स्थानीय बाजारों में बिक रही आर्टिफिशियल ज्वेलरी में कैडमियम (Cadmium) जैसे जहरीले धातु की मात्रा तय सीमा से हजारों गुना अधिक पाई गई। विशेषज्ञों का कहना है कि लंबे समय तक ऐसे हैवी मेटल के संपर्क में रहने से कैंसर समेत कई गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं का खतरा बढ़ सकता है। हालांकि, यह मामला यूके में हुई जांच से जुड़ा है और इसे भारत में बिकने वाले सभी उत्पादों पर लागू नहीं माना जा</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.nationaljagatvision.com/health/artificial-jewelery-purchased-online-can-become-a-health-hazard-investigation/article-11181"><img src="https://www.nationaljagatvision.com/media/400/2026-07/online-jewelry-containing-9000-times-limit-of-cancer-causes-cadmium.webp" alt=""></a><br /><p><strong>Artificial Jewellery Health Risk: </strong>ऑनलाइन शॉपिंग के बढ़ते चलन के बीच एक चौंकाने वाली रिपोर्ट सामने आई है। ब्रिटेन (यूके) में हुई जांच में कुछ ऑनलाइन और स्थानीय बाजारों में बिक रही आर्टिफिशियल ज्वेलरी में कैडमियम (Cadmium) जैसे जहरीले धातु की मात्रा तय सीमा से हजारों गुना अधिक पाई गई। विशेषज्ञों का कहना है कि लंबे समय तक ऐसे हैवी मेटल के संपर्क में रहने से कैंसर समेत कई गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं का खतरा बढ़ सकता है। हालांकि, यह मामला यूके में हुई जांच से जुड़ा है और इसे भारत में बिकने वाले सभी उत्पादों पर लागू नहीं माना जा सकता। फिर भी यह रिपोर्ट ऑनलाइन ज्वेलरी खरीदते समय सतर्क रहने की जरूरत जरूर बताती है।</p>
<p><strong>जांच में क्या सामने आया?</strong><br />एक जांच रिपोर्ट के अनुसार, कुछ लोकप्रिय ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर बिक रही अंगूठियां, नेकलेस और इयररिंग्स में कैडमियम की मात्रा कानूनी सीमा से 9,000 गुना तक अधिक पाई गई। यूके के नियमों के मुताबिक, आर्टिफिशियल ज्वेलरी में कैडमियम की अधिकतम सीमा 0.01% निर्धारित है। लेकिन जांच में एक ऐसी अंगूठी मिली जिसे 925 सिल्वर बताकर बेचा जा रहा था, जबकि उसमें चांदी की जगह लगभग 92% कैडमियम मौजूद था। इसी तरह एक ब्रेसलेट में भी निर्धारित सीमा से करीब 3,300 गुना अधिक कैडमियम पाया गया। जांच के बाद इन उत्पादों को बाजार से वापस (Recall) मंगाया गया।</p>
<p><strong>कैडमियम क्यों है खतरनाक?</strong><br />यूके हेल्थ सिक्योरिटी एजेंसी (UKHSA) के अनुसार, लंबे समय तक कैडमियम के संपर्क में रहने से शरीर पर गंभीर प्रभाव पड़ सकते हैं। यह धातु</p>
<ul>
<li>कुछ प्रकार के कैंसर के खतरे को बढ़ा सकती है।</li>
<li>किडनी और लिवर को नुकसान पहुंचा सकती है।</li>
<li>हड्डियों को कमजोर कर ऑस्टियोपोरोसिस जैसी समस्या का जोखिम बढ़ा सकती है।</li>
</ul>
<p>किंग्स कॉलेज लंदन के प्रोफेसर क्रिस्टर होगस्ट्रैंड के अनुसार, लंबे समय तक हैवी मेटल के संपर्क में रहने से स्वास्थ्य पर गंभीर दुष्प्रभाव पड़ सकते हैं।</p>
<p><strong>इयररिंग्स में क्यों ज्यादा माना जाता है खतरा?</strong><br />विशेषज्ञों के मुताबिक, इयररिंग्स लंबे समय तक त्वचा और कान के छेद के सीधे संपर्क में रहती हैं। यदि इनमें जहरीले धातु मौजूद हों, तो त्वचा में एलर्जी, जलन या लंबे समय तक संपर्क की स्थिति में स्वास्थ्य संबंधी जोखिम बढ़ सकता है। हालांकि, किसी व्यक्ति में नुकसान की मात्रा इस बात पर भी निर्भर करती है कि वह कितने समय तक और किस स्तर पर ऐसे पदार्थों के संपर्क में रहता है।</p>
<p><strong>ऑनलाइन ज्वेलरी खरीदते समय रखें ये सावधानियां</strong></p>
<ul>
<li>केवल भरोसेमंद और प्रमाणित ब्रांड या विक्रेता से ही ज्वेलरी खरीदें।</li>
<li>प्रोडक्ट की मटेरियल डिटेल्स और सेफ्टी सर्टिफिकेशन जरूर जांचें।</li>
<li>बेहद सस्ती कीमत पर बिक रहे अज्ञात ब्रांड के उत्पाद खरीदने से बचें।</li>
<li>त्वचा में एलर्जी, खुजली या जलन होने पर तुरंत उसका इस्तेमाल बंद करें।</li>
<li>बच्चों के लिए आर्टिफिशियल ज्वेलरी खरीदते समय अतिरिक्त सावधानी बरतें।</li>
</ul>
<p><strong>ध्यान दें: यह रिपोर्ट यूके में हुई जांच पर आधारित है। इससे यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि सभी ऑनलाइन या भारत में बिकने वाली आर्टिफिशियल ज्वेलरी में इसी तरह की मिलावट होती है। खरीदारी करते समय विश्वसनीय विक्रेता और गुणवत्ता प्रमाणन पर ध्यान देना सबसे सुरक्षित तरीका है।</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>हेल्थ</category>
                                    

                <link>https://www.nationaljagatvision.com/health/artificial-jewelery-purchased-online-can-become-a-health-hazard-investigation/article-11181</link>
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                <pubDate>Wed, 22 Jul 2026 10:46:11 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[मनीशंकर पांडेय]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>Autoimmune Disease का इलाज संभव है या नहीं? एक्सपर्ट ने बताया कब कंट्रोल होती है बीमारी और क्या है Remission</title>
                                    <description><![CDATA[<p><strong>Autoimmune Diseases: </strong>हमारा इम्यून सिस्टम (प्रतिरक्षा तंत्र) सामान्य परिस्थितियों में शरीर को बैक्टीरिया, वायरस और अन्य हानिकारक तत्वों से बचाने का काम करता है। लेकिन जब यही इम्यून सिस्टम गलती से शरीर की स्वस्थ कोशिकाओं और अंगों को ही दुश्मन समझकर उन पर हमला करने लगे, तो इस स्थिति को ऑटोइम्यून डिजीज कहा जाता है। इस वजह से शरीर के अलग-अलग हिस्से प्रभावित हो सकते हैं। कई लोगों में जोड़ों में दर्द और सूजन, त्वचा संबंधी समस्याएं, थायराइड विकार, आंतों की परेशानी, नसों से जुड़ी दिक्कतें और अन्य अंगों में सूजन जैसी समस्याएं देखने को मिल सकती हैं।</p>
<p><strong>क्या ऑटोइम्यून</strong></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.nationaljagatvision.com/health/is-treatment-of-autoimmune-disease-possible-or-not-expert-told/article-11159"><img src="https://www.nationaljagatvision.com/media/400/2026-07/can-autoimmune-diseases-cured-by-health-care-know-by-expert.webp" alt=""></a><br /><p><strong>Autoimmune Diseases: </strong>हमारा इम्यून सिस्टम (प्रतिरक्षा तंत्र) सामान्य परिस्थितियों में शरीर को बैक्टीरिया, वायरस और अन्य हानिकारक तत्वों से बचाने का काम करता है। लेकिन जब यही इम्यून सिस्टम गलती से शरीर की स्वस्थ कोशिकाओं और अंगों को ही दुश्मन समझकर उन पर हमला करने लगे, तो इस स्थिति को ऑटोइम्यून डिजीज कहा जाता है। इस वजह से शरीर के अलग-अलग हिस्से प्रभावित हो सकते हैं। कई लोगों में जोड़ों में दर्द और सूजन, त्वचा संबंधी समस्याएं, थायराइड विकार, आंतों की परेशानी, नसों से जुड़ी दिक्कतें और अन्य अंगों में सूजन जैसी समस्याएं देखने को मिल सकती हैं।</p>
<p><strong>क्या ऑटोइम्यून बीमारी पूरी तरह ठीक हो सकती है?</strong><br />विशेषज्ञों के अनुसार, यह सबसे आम सवालों में से एक है। फिलहाल ज्यादातर ऑटोइम्यून बीमारियों का स्थायी इलाज (Cure) उपलब्ध नहीं है, लेकिन सही उपचार और जीवनशैली की मदद से इन्हें प्रभावी तरीके से कंट्रोल किया जा सकता है। डॉक्टरों का कहना है कि कई मरीज नियमित दवा, समय पर जांच और स्वस्थ जीवनशैली अपनाकर सामान्य और सक्रिय जीवन जीते हैं। उपचार का मुख्य उद्देश्य बीमारी को खत्म करना नहीं, बल्कि उसके असर को कम करना और शरीर के अंगों को नुकसान से बचाना होता है।</p>
<p><strong>इलाज का मकसद क्या होता है?</strong><br />ऑटोइम्यून बीमारियों के उपचार में डॉक्टर आमतौर पर</p>
<ul>
<li>इम्यून सिस्टम की जरूरत से ज्यादा सक्रियता को नियंत्रित करते हैं।</li>
<li>शरीर में सूजन (Inflammation) कम करने की कोशिश करते हैं।</li>
<li>लक्षणों को नियंत्रित रखते हैं।</li>
<li>प्रभावित अंगों को लंबे समय तक होने वाले नुकसान से बचाने पर ध्यान देते हैं।</li>
</ul>
<p>क्या होती है Remission?</p>
<p>कई मरीजों में इलाज के बाद बीमारी Remission की स्थिति में पहुंच सकती है। इसका मतलब है कि लंबे समय तक लक्षण बहुत कम हो जाते हैं या पूरी तरह दिखाई नहीं देते। हालांकि, Remission का अर्थ यह नहीं है कि बीमारी हमेशा के लिए खत्म हो गई है। कुछ मामलों में यह दोबारा सक्रिय (Flare-up) भी हो सकती है, इसलिए नियमित निगरानी जरूरी रहती है।</p>
<p><strong>बीमारी को कंट्रोल में रखने के लिए क्या करें?</strong><br />विशेषज्ञों का कहना है कि ऑटोइम्यून बीमारी का जल्द पता लगना बेहतर परिणाम देने में मदद कर सकता है। इसके लिए</p>
<ul>
<li>डॉक्टर की सलाह के अनुसार नियमित दवाएं लें।</li>
<li>समय-समय पर फॉलो-अप और जरूरी जांच कराते रहें।</li>
<li>रोजाना हल्की-फुल्की शारीरिक गतिविधि या व्यायाम करें।</li>
<li>पर्याप्त और अच्छी नींद लें।</li>
<li>तनाव कम करने के लिए मेडिटेशन या रिलैक्सेशन तकनीकों का सहारा लें।</li>
<li>संतुलित और पौष्टिक आहार अपनाएं।</li>
</ul>
<p>सही इलाज, नियमित निगरानी और स्वस्थ जीवनशैली के साथ अधिकांश मरीज लंबे समय तक बीमारी को नियंत्रित रख सकते हैं और अच्छी Quality of Life बनाए रख सकते हैं। इसलिए यदि लंबे समय से जोड़ों में दर्द, बार-बार सूजन, त्वचा पर रैश, अत्यधिक थकान या अन्य असामान्य लक्षण बने रहें, तो बिना देरी किए संबंधित विशेषज्ञ से सलाह लेना जरूरी है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>हेल्थ</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 21 Jul 2026 10:29:46 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[मनीशंकर पांडेय]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>बिस्तर पर जाते ही उड़ जाती है नींद? एक्सपर्ट्स की ये आसान ट्रिक्स दिला सकती हैं सुकून भरी नींद</title>
                                    <description><![CDATA[<p><strong>Tips for Better Sleep:</strong> रात में देर तक करवटें बदलना, बार-बार नींद टूटना या घंटों बिस्तर पर लेटे रहने के बाद भी नींद न आना आजकल एक आम समस्या बन गई है। बदलती लाइफस्टाइल, मानसिक तनाव, देर रात तक मोबाइल का इस्तेमाल और अनियमित दिनचर्या इसकी बड़ी वजह मानी जाती है। लगातार नींद पूरी न होने पर अगले दिन थकान, चिड़चिड़ापन, सिरदर्द और काम में ध्यान लगाने में परेशानी हो सकती है। अगर कभी-कभी नींद आने में देरी होती है तो यह सामान्य हो सकता है, लेकिन अगर यह परेशानी बार-बार होने लगे, तो कुछ आसान आदतों में बदलाव और</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.nationaljagatvision.com/health/sleep-goes-away-as-soon-as-you-go-to-bed/article-11133"><img src="https://www.nationaljagatvision.com/media/400/2026-07/sleep-problem.webp" alt=""></a><br /><p><strong>Tips for Better Sleep:</strong> रात में देर तक करवटें बदलना, बार-बार नींद टूटना या घंटों बिस्तर पर लेटे रहने के बाद भी नींद न आना आजकल एक आम समस्या बन गई है। बदलती लाइफस्टाइल, मानसिक तनाव, देर रात तक मोबाइल का इस्तेमाल और अनियमित दिनचर्या इसकी बड़ी वजह मानी जाती है। लगातार नींद पूरी न होने पर अगले दिन थकान, चिड़चिड़ापन, सिरदर्द और काम में ध्यान लगाने में परेशानी हो सकती है। अगर कभी-कभी नींद आने में देरी होती है तो यह सामान्य हो सकता है, लेकिन अगर यह परेशानी बार-बार होने लगे, तो कुछ आसान आदतों में बदलाव और रिलैक्सेशन तकनीकें अच्छी नींद पाने में मदद कर सकती हैं।</p>
<p><strong>जल्दी नींद लाने के लिए अपनाएं ये आसान तरीके</strong><br />सोने से पहले कुछ सरल बदलाव आपकी नींद की गुणवत्ता बेहतर बना सकते हैं।</p>
<ul>
<li>रोजाना एक ही समय पर सोने और जागने की आदत बनाएं, ताकि शरीर की बॉडी क्लॉक (Circadian Rhythm) संतुलित रहे।</li>
<li>सोने से करीब एक घंटे पहले मोबाइल, लैपटॉप और टीवी जैसी स्क्रीन से दूरी बना लें।</li>
<li>कमरे की लाइट हल्की रखें और सोने का माहौल शांत व आरामदायक बनाएं।</li>
<li>बेडरूम का तापमान ऐसा रखें, जिसमें शरीर सहज महसूस करे।</li>
</ul>
<p><strong>4-7-8 ब्रीदिंग तकनीक से मिल सकता है आराम</strong><br />नींद जल्दी लाने के लिए 4-7-8 Breathing Technique भी आजमाई जा सकती है। इसमें</p>
<ul>
<li>4 सेकंड तक नाक से गहरी सांस लें।</li>
<li>7 सेकंड तक सांस रोककर रखें।</li>
<li>फिर 8 सेकंड में धीरे-धीरे मुंह से सांस छोड़ें।</li>
</ul>
<p>यह तकनीक शरीर को रिलैक्स महसूस कराने में मदद कर सकती है, हालांकि हर व्यक्ति में इसका असर अलग-अलग हो सकता है।</p>
<p><strong>मेडिटेशन और रिलैक्सेशन भी हो सकते हैं फायदेमंद</strong><br />सोने से पहले हल्का मेडिटेशन, गहरी सांस लेने का अभ्यास या प्रोग्रेसिव मसल रिलैक्सेशन किया जा सकता है। इस तकनीक में शरीर की अलग-अलग मांसपेशियों को कुछ सेकंड तक हल्का कसकर फिर ढीला छोड़ा जाता है, जिससे तनाव कम महसूस हो सकता है। अगर बिस्तर पर लेटने के करीब 20 मिनट बाद भी नींद न आए, तो उठकर हल्की किताब पढ़ना या शांत गतिविधि करना बेहतर माना जाता है। नींद आने पर दोबारा बिस्तर पर लौटें।</p>
<p><strong>सोने से पहले इन आदतों से बचें</strong><br />अच्छी नींद के लिए कुछ आदतों से दूरी बनाना भी जरूरी है</p>
<ul>
<li>देर शाम या रात में चाय, कॉफी और अन्य कैफीन युक्त पेय लेने से बचें।</li>
<li>सोने से ठीक पहले भारी, तला-भुना या मसालेदार भोजन न करें।</li>
<li>बिस्तर पर लेटकर लंबे समय तक मोबाइल या टीवी देखने की आदत छोड़ें।</li>
<li>सोने से पहले तनावपूर्ण काम या मानसिक दबाव बढ़ाने वाली गतिविधियों से बचें।</li>
<li>रात में सोने से ठीक पहले बहुत भारी एक्सरसाइज करने से भी बचना चाहिए।</li>
</ul>
<p><strong>कब डॉक्टर से मिलना चाहिए?</strong><br />अगर कई सप्ताह तक लगातार नींद आने में परेशानी हो, रात में बार-बार नींद टूटे या नींद की कमी के कारण दिनभर थकान, सुस्ती और कामकाज प्रभावित होने लगे, तो डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है। इसके अलावा, यदि नींद के दौरान तेज खर्राटे, सांस रुकने जैसा महसूस होना, घुटन या अन्य असामान्य लक्षण दिखाई दें, तो यह स्लीप एपनिया जैसी समस्या का संकेत भी हो सकता है। ऐसी स्थिति में स्वयं दवा लेने के बजाय विशेषज्ञ से जांच और उचित उपचार कराना बेहतर होता है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>हेल्थ</category>
                                    

                <link>https://www.nationaljagatvision.com/health/sleep-goes-away-as-soon-as-you-go-to-bed/article-11133</link>
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                <pubDate>Mon, 20 Jul 2026 10:45:20 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[मनीशंकर पांडेय]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>राजधानी के 4 सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में रामभरोसे चल रहीं सर्जरी: ऑपरेशन के दौरान खून की जरूरत पड़े तो रेफर करने के अलावा कोई विकल्प नहीं</title>
                                    <description><![CDATA[<p>रायपुर |राजधानी रायपुर की आबादी जिस तेजी से बढ़ रही है, उस गति से स्वास्थ्य सुविधाओं का विस्तार अब भी अधूरा ही नजर आता है। आज भी शहर के चार प्रमुख सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र बुनियादी सुविधाओं की कमी से जूझ रहे हैं। बिरगांव, गुढ़ियारी, खोखोपारा और आयुर्वेदिक कॉलेज परिसर में स्थित इन केंद्रों पर शहर के करीब छह लाख लोगों की प्राथमिक और आपातकालीन चिकित्सा जरूरतों का पूरा भार है। यहां नियमित रूप से प्रसूति और परिवार नियोजन जैसे ऑपरेशन तो किए जा रहे हैं, लेकिन किसी भी आपात स्थिति से निपटने की जरूरी व्यवस्थाएं पूरी तरह नदारद हैं। इसी</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.nationaljagatvision.com/chhattisgarh/if-blood-is-needed-during-surgery-there-is-no-option/article-11138"><img src="https://www.nationaljagatvision.com/media/400/2026-07/img_20260720_083928.jpg" alt=""></a><br /><p>रायपुर |राजधानी रायपुर की आबादी जिस तेजी से बढ़ रही है, उस गति से स्वास्थ्य सुविधाओं का विस्तार अब भी अधूरा ही नजर आता है। आज भी शहर के चार प्रमुख सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र बुनियादी सुविधाओं की कमी से जूझ रहे हैं। बिरगांव, गुढ़ियारी, खोखोपारा और आयुर्वेदिक कॉलेज परिसर में स्थित इन केंद्रों पर शहर के करीब छह लाख लोगों की प्राथमिक और आपातकालीन चिकित्सा जरूरतों का पूरा भार है। यहां नियमित रूप से प्रसूति और परिवार नियोजन जैसे ऑपरेशन तो किए जा रहे हैं, लेकिन किसी भी आपात स्थिति से निपटने की जरूरी व्यवस्थाएं पूरी तरह नदारद हैं। इसी कारण कई बार सामान्य माने जाने वाले ऑपरेशन भी एक बड़ी चुनौती बन जाते हैं।</p>
<p><strong>रेफर करने की मजबूरी  जान का भी जोखिम</strong></p>
<p>इन स्वास्थ्य केंद्रों में लगातार संस्थागत प्रसव और सर्जरी हो रही हैं। ऐसे में सबसे बड़ी विडंबना यह है कि यदि ऑपरेशन टेबल पर मरीज को अचानक रक्त की आवश्यकता पड़ जाए, तो इन केंद्रों के पास इसे तत्काल उपलब्ध कराने की कोई व्यवस्था नहीं है। ब्लड स्टोरेज की सुविधा न होने के कारण, गंभीर स्थिति में मरीज को मेकाहारा या किसी अन्य बड़े अस्पताल में रेफर करना ही एकमात्र विकल्प बचता है। रेफर करने की इस प्रक्रिया में उपचार में देरी का जोखिम रहता है और मरीज की जान जाने का खतरा काफी बढ़ जाता है।</p>
<p>स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि इन केंद्रों की भूमिका अब केवल ओपीडी तक सीमित नहीं रह गई है। जिस अनुपात में इन केंद्रों पर सर्जरी की संख्या बढ़ी है, उसी अनुपात में संसाधनों को विकसित करना अनिवार्य है। वर्तमान में इन स्वास्थ्य केंद्रों को सुचारू रूप से चलाने के लिए जिन चीजों की सबसे अधिक आवश्यकता है, उनका भारी अभाव है:</p>
<p> <strong>ब्लड स्टोरेज यूनिट:</strong> ऑपरेशन के दौरान अगर अचानक खून की जरूरत पड़े, तो तत्काल रक्त उपलब्ध कराने की व्यवस्था अस्पताल में नहीं है।</p>
<p> <strong>प्रशिक्षित तकनीकी स्टाफ</strong> किसी भी गंभीर और आपातकालीन स्थिति को सुरक्षित ढंग से संभालने के लिए दक्ष कर्मचारियों की तैनाती पूरी नहीं है।</p>
<p> <strong>जीवन रक्षक उपकरण:</strong> आपात स्थिति में मरीज की हालत बिगड़ने पर उसे स्थिर रखने और जान बचाने वाले आधुनिक उपकरण उपलब्ध नहीं हैं।</p>
<p><strong>अनहोनी का इंतजार कर रहा स्वास्थ्य विभाग?</strong></p>
<p>चिकित्सा क्षेत्र के विशेषज्ञों ने यह स्पष्ट किया है कि ब्लड बैंक, प्रशिक्षित स्टाफ और आपातकालीन उपकरण जैसी सुविधाएं अब अस्पतालों के लिए कोई अतिरिक्त व्यवस्था नहीं हैं, बल्कि यह बुनियादी आवश्यकता बन चुकी हैं। स्वास्थ्य विभाग को किसी बड़ी अनहोनी का इंतजार किए बिना इन सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों को जल्द से जल्द सर्वसुविधायुक्त बनाना चाहिए। जब तक इन केंद्रों में आपातकालीन व्यवस्थाएं दुरुस्त नहीं होंगी, तब तक मरीजों को सुरक्षित इलाज का भरोसा नहीं दिया जा सकता और बड़े अस्पतालों पर भी रेफरल मरीजों का अनावश्यक बोझ बढ़ता रहेगा।</p>
<p> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>छत्तीसगढ़</category>
                                            <category>हेल्थ</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 20 Jul 2026 08:39:57 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[मनीशंकर पांडेय]]></dc:creator>
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